18.5.20

कवि संजय वर्मा "दृष्टि " की कविता - '' सूरज ''













सूरज

सूरज इतने
प्रचण्ड ना बनो  
मालूम है प्रचण्डता 
सूरज को दीप दिखाना 
जैसी कहावतों से तो लगता
तपिश कम होने की 
मांगे पूरी न होगी कभी 

किन्तु विश्वास है 
इस धरा के लिए 
हे सूरज , ऋतुओं में
ताप को समान रखों  
जिसके बढ़ने से रहवासी  
प्रचंडता से हो रहे दुःखी 
धरा के घट सूख रहे 
तितलियों के  पंख जल रहे 

जल ही जीवन है 
हे सूरज उसे न सोखों 
बिन पानी मृत्यु  दोष  
इंसानों , पशु - पक्षियों,
किट पतंगों का लगेगा  
शायद तुम्हें पता ही होगा
क्योंकि तुम सूरज हो 

प्रदूषण फैलाने के 
पृथ्वी के रहवासी भी 
होंगे भागीदार  
घरों में दुबके हुए
मतलबी इंसानों  को 
बाहर झाकने की
फुर्सत कहाँ
गौरय्या सूखे कंठ लिए
जल के लिए
ची- ची करती रहे 
कौन समझे उसकी बोली 

जल पान रखने का 
धरा सन्देशा
दे रही इंसानों  को 
और कह रही
सूरज से 
जरा अपनी तपिश को 
कम कर लो 
तुम सूरज हो  
धरा को सूखा  
मत बनाओं
क्योंकि हरियाली और जल ही 
तो  मेरी पहचान है **



 - संजय वर्मा " दृष्टि "
       125 शहीद भगत सिंग मार्ग 
       मनावर जिला -धार  (म प्र )
       फोन नं. -  9893070756





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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई

 माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867
                                                         


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