27.2.20

मन पठार हुए
















( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक नदी कोलाहल '' से लिया गया है )

मन पठार हुए

भीड़ है 
पर 
गीत एकाकी |

हैं खड़ी बहसें 
उठाये हाथ ,
तर्क घेरे हैं 
सभी फुटपाथ ;

मंच पर 
वक्तव्य बाक़ी |

मन पठार हुए 
न झरते आह ,
बुझी आँखें 
अब न छूती दाह ;

निरर्थक 
गंध काया की |

  - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867
  

26.2.20

पवन शर्मा की कहानी - '' दावानल '' - ( भाग - 3 )

( प्रस्तुत कहानी – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘ ये शहर है , साहब ’ से ली गई है )


                                दावानल

पिछले भाग के अंश 

खड़ेरा देव को खुश करने के लिए माहुल के पत्तों से बनी पुड्की में महुए की कच्ची दारु पी रहे हैं और मादल की थाप पर करमा कर रहे हैं |....

                                                शेष भाग - ( 3 )

आज गोंडी मोहल्ले के लोग खड़ेरा देव से अपने मनोहर को माँग रहे हैं ... जो दो दिन से घर नहीं लौटा है |
          मैं देखता हूँ कि मनोहर का बप्पा और उसकी माँ दोनों पैरों को मोड़कर पेट में दबाये उकडूं होकर बैठे हैं | मनोहर के माँ की चेहरे की झुर्रियों के बीच आँसुओं की सूखी लकीरें दिख रही हैं |
          मै उठ जाता हूँ और जाने की तैयारी करता हूँ | मुझे खड़ा देख मनोहर का बप्पा और उसकी माँ मेरे पास आ जाते हैं , ''    जाओगे मास्साब? ''  
          '' समय बहुत हो रहा है ... जाऊँगा | '' मैनें कहा |
          खड़ेरा देव को प्रसन्न करते गोंडी मोहल्ले के लोग करमा बन्द कर देते हैं | अपनी परम्परा के अनुसार सभी सिर झुकाकर अभिवादन करते  हैं | 
          '' मंगलू और दसनू को आपके साथ भेज देते हैं|'' एक वृद्ध ने कहा |
          '' नहीं - नहीं ... मैं चला जाऊँगा ...  आप  परेशान  न हों '' मैनें कहा | 
          कई लोगों ने एक साथ कहा , '' सँभलकर जाना मास्साब | " 
          मैं मुस्कराया | मैं उनकी चिन्ता को समझता हूँ |
          पगडण्डी पर चलते हुए मैंने कंधे पर टंगे झोले में से टॉर्च निकाल ली | 
          गोंडी मोहल्ले के  लोग फिर से मादल की थाप पर करमा करने लगे | अच्छा है कि चाँदनी रात है , सो रात में भी पगडण्डी धुँधली - धुँधली दिख रही है , किन्तु रात की भयावहता मन में समाई हुई है |
          पगडण्डी नाले में जाकर समाप्त हुई |
          मैं नाला पार करने ही वाला था कि टॉर्च की रोशनी के दायरे में नाले के दाईं ओर झाड़ियों में कुछ अटका हुआ - सा दिखाई दिया | मैनें टॉर्च की रोशनी पूरी तरह से झाड़ियों की तरफ की |
          ' मनोहर ! '  बेसाख्ता मेरे मुँह से घुटी - घुटी चीख़ निकल पड़ी |
          खून से सना मृत मनोहर ! पेट की आँते बाहर निकली हुई | "
          मादल की थाप पर खड़ेरा देव को मानते गोड़ी मोहल्ले के लोगों की धीमी - धीमी ध्वनि अब भी सुनाई दे रही है |
          भय की तेज लहर शरीर में उतरने लगी | अचानक मैं वहाँ से भाग खड़ा हुआ | घर आकर लोटाभर पानी पिया , फिर खाट पर पसर गया | शरीर पसीना - पसीना था |
          सरपंची मोहल्ला गहरी नींद में डूबा हुआ है | चारों ओर सन्नाटा फैला हुआ है | कभी - कभी इधर - उधर कुत्ते भौंक उठते हैं | रात के सन्नाटे में उनके भौकने की आवाज और भी भयावह लग रही है | झींगुरों की आवाज से सन्नाटा और भी गाढ़ा हो रहा है |
          मनोहर ने विरोध किया और मारा गया | मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ कि नाले के पास झाड़ियों में उलझी मैनें उसी की क्षत - विक्षत लाश देखी है | 
          लेकिन इतना  घिनौना कृत्य कौन कर सकता है ? ... क्या काशीराम ? ... भूपतसिंह ? ... या फिर कम्पाउंडर ? ... मैंने अनुमान लगाया कि इस कृत्य में सम्भवतः मिश्राजी भी शामिल हो सकते हैं ! क्योंकि इनके अवैध धंधों में मनोहर ही तो फाँस बना हुआ था |
          गला शुष्क होने लगा | उठकर पानी पीया और फिर खाट पर आकर लेट गया |
          मेरे भीतर बेचैनी बढ़ती जा रही है | बार - बार मनोहर की लाश आँखों के सामने आ जाती है |
          थोड़ी देर बाद केशव की परछी में तीन - चार लोग इकट्ठे हुए | परछी में अँधेरा था | केशव ने परछी की लाईट न जलाकर ढिबरी जलाई | ढिबरी की लौ हवा में इधर - उधर हिलने  लगी , जिससे ढिबरी का मद्धिम प्रकाश भी इधर - उधर हिलाने लगा | सभी ने एक - दूसरे के चेहरों को गौर से देखा | उनके चेहरे पर एक विचित्र प्रकार की चमक थी | किसी ने धीमे - से कुछ कहा और थोड़ी देर बाद केशव को छोड़ बाक़ी लोग चले गए | केशव ने ढिबरी बुझा दी , फिर से घुप अँधेरा हो गया |
          मैनें रात में एक सपना देखा ...
          सपने में मनोहर एक भेड़िये से जूझ रहा है ... हू ... हू ... हू करता भेड़िया ... अपने नुकीले दांत चमकाता भेड़िया ... अपने शिकार पर झपटता भेड़िया ... मनोहर ने अपनी टंगिया से उस भेड़िये की गर्दन पर पूरी ताकत से वार किया ... भेड़िये का सिर धड से अलग ... सिर झाड़ियों में जाकर गिरा ... आश्चर्य ... भेड़िये का सिर और धड अलग होते ही चारों दिशाओं से असंख्य भेड़िये आ गए ... बीच में घिरा मनोहर ... अपनी टंगिया भांजता मनोहर ... हू ... हू ... हू की आवाज से जंगल काँपने लगा ... जंगल ... भेड़ियों का जंगल !
          घबराहट के मारे नींद खुल गई | गला शुष्क था | शरीर पसीने से नहाया हुआ था | उठकर पानी पीया , फिर से खाट पर पसर गया | बहुत देर तक नींद नहीं आई |
          मैनें निश्चय किया कि मनोहर की आग मुझे अपने भीतर जलानी है | *

                 - पवन शर्मा 
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 पता
श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट  विद्यालय ,
जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
फो. नं. - 9425837079 .
ईमेल – pawansharma7079@gmail.com

 संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867
   
            

24.2.20

पवन शर्मा की कहानी - '' दावानल '' - ( भाग - 2 )



( प्रस्तुत कहानी – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘ ये शहर है , साहब ’ से ली गई है )


                                 दावानल 


   कुछ और जानते हैं इनके बारे में ? '' मनोहर ने मेरे  चेहरे पर अपनी नजरें जमा दीं |
          '' क्या ? ''  
   भाग - ( 1 ) से आगे -

          एकाएक उसके चेहरे पर तल्खी उभर आई ,  '' ये साले जंगली जानवरों की खालें भी शहर ले जा कर बेचते हैं | गुल्ली , चिरौंजी का दो नम्बर का भी धन्धा करते हैं | ''
          '' क्या कह रहा है ? ''
          '' बिल्कुल सही | ''
          मैं चुप था | मुझसे कुछ कहते नहीं बना |
          '' अब आप ही बताओ कि मैं क्या करूँ ? '' उसने पूछा |
          '' मिश्राजी से जा कर कह | '' मैनें सलाह दी |
          '' कुछ नहीं होगा | ''
          '' क्यों ? ''
          '' उसको भी हिस्सा मिलता है | ''
          '' तू झूठ बोल रहा है | ''
          '' सही बोल रहा हूँ | विश्वास न हो तो उसी से पुछ लो | '' उसने कहा |
          '' तो तू अपने तरीके से उन्हें रोक | ''
          कैसे ... ? मैं अकेला क्या कर सकता हूँ ? '' उसके चेहरे पर प्रश्न टंग गया |
          '' अपने जैसे,अपने मोहल्ले के कुछ लोगों को अपने साथ लेकर | '' मैनें मनोहर को विरोध करने का पहला सबक सिखाया |
          हफ्तेभर बाद तहसील से दो सिपाही आए | उन्होंने मनोहर को घर से बाहर परछी में खिंचा और जमीन पर पटककर डंडों से बेदम होने तक पीटा ,  '' साले ... नेतागिरी करने लगा ... ''
          मनोहर के विरोध का नतीजा |
          पूरा गोंडी मोहल्ला दांतों के बीच उँगली दबाए मनोहर की चीखें सुन रहा था , किन्तु किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि मनोहर पर डंडे बरसाते दोनों सिपाहियों को रोक सके |
          अँधेरा घिरते ही मैं मनोहर के घर गया | मुझे देख उसका बप्पा और उसकी माँ रो पड़े ,  '' तुम्हीं ने उकसाया था उसे , अब देख लो , जालिमों ने जान भर नहीं निकाली है , बाक़ी सब ... ''
          मैं भीतर तक सिकुड़ गया |
          पूरा गोंडी मोहल्ला दहशतजदा था | किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि कटते हुए जंगलों को रोक सके | साँभर , चीतलों को मारकर उनकी खालों को बेचने से रोक सके | गुल्ली,चिरौंजी का अवैध व्यापार रोक सके | गोंडी मोहल्ले के लोगों का खुलेआम शोषण रोक सके | खुली चेतावनी दी गई थी कि जो भी टाँग अड़ाएगा , बेमौत मारा जाएगा |
          इसके बाद मनोहर का स्वभाव बदल गया | वह दुगनी ताकत से उन लोगों का विरोध करने लगा | गोंडी मोहल्ले के लोगों के दिलो -दिमाग में उसने आग भर दी | पूरा गोंडी मोहल्ला एक हो गया | सरपंची मोहल्ले के चेहरे पर चिन्ता उपजने लगी | पहले नाले से गाँव दो धडों में बटा था , अब मन से बंट गया |
          '' मास्साब , आजकल गोंडी मोहल्ला बहुत जाने लगे हो | क्या
किसी आदिवासिन से दिल लग गया है | '' ऐसी ही कोई शाम थी | हल्का अँधेरा हो चुका था | मनोहर के घर से लौटते हुए मुझे हँसी के साथ आवाज सुनाई दी | दिल में नश्तर चुभने जैसी हँसी !
          मैं मुड़ा | भूपतसिंह औए कंपाऊंडर थे |
          '' मनोहर की बहन भी पटाखा है साली ... शायद इसी लिए
मास्साब जाते हैं | ''   ये कम्पाउंडर की आवाज थी |
          '' चुप रहो ! ''   बेसाख्ता मैं चीख़ पड़ा |
          '' चिल्ला मत मास्टर ! ''  भूपतसिंह भी चीखा ,  '' तू वहाँ हमारे खिलाफ लोगों को भड़काने जाता है ... बन्द कर दे अपनी हरकत ... नहीं तो साले ... '' भूपतसिंह ने कहा | बात मेरे कलेजे को चीर गई | किसी ने जीवन में पहली बार इस तरह से बात की थी |मेरे चेहरे पर अपमान चस्पा हो गया |
          मुझे सारी रात नींद नहीं आई| खाट पर करवटें बदलता रहा| तरह - तरह के ख्याल आते रहे |  सुबह  होते -  होते मैनें तय कर लिया कि मैं फारेस्ट रेंजर मिश्राजी से भूपतसिंह की शिकायत करूँगा |
          सुबह लगभग  नौ  बजे मैं  मिश्राजी के घर गया  |  मिश्राजी ने आदरभाव से मुझे बिठाया और भीतर चाय का आदेश दे दिया | शाम वाली घटना मैंने उन्हें बताई तो वे चिन्तित स्वर में बोले ,  '' कम पढ़े - लिखे लोग हैं मास्साब ! किससे कैसी बात की जाए, वो लोग नहीं जानते | मैं भूपतसिंह को समझा दूँगा कि आइन्दा ऐसा  अशिष्ट बर्ताव न करे | ''
          कहने के बाद मिश्राजी ने जेब में से विल्स का पैकिट निकाला और एक सिगरेट सुलगा ली |
          चाय आ गई |
          मिश्राजी ने कहा , '' चाय लीजिए | ''
          हम लोग चाय पीने लगे | चाय पीते - पीते मिश्राजी बोले ,  '' मेरी एक सलाह मानेंगे ? ''
          '' बोलिए | ''
          '' आप इन लोगों के बीच में कतई न पड़ें | आप , मैं , भूपतसिंह , काशीनाथ , कम्पाउंडर सभी सरकारी आदमी हैं | ये लोग जो करते हैं , करने दें ! आप सब देखिए , पर अपनी आँखें बन्द रखिए - गांधीजी के बन्दर की तरह ... हैं ... हैं ... हैं ... '' मिश्राजी हँसे |
          मैं अवाक् रह गया | मनोहर की बात सत्य लगने लगी कि मिश्राजी को भी हिस्सा मिलता है | मिश्राजी ने सिगरेट का कश खिंचा और धुआँ उगल दिया |मैंने देखा कि सिगरेट के धूएँ के उस पार बैठे मिश्राजी का चेहरा काशीनाथ , भूपतसिंह और कम्पाउंडर के चेहरों जैसा ही था |
          मैं घर लौट आया | घर के बाहर परछी में केशव सरपंच बैठा हुआ था | मुझे देख उसके चेहरे पर अजीब - सी मुस्कराहट तिर आई | मैं आहत हो उठा |
          '' आओ मास्साब बैठो | '' केशव ने मुझसे कहा |
          मैं स्टूल खींचकर बैठ गया |
          '' मिल आए रेंजर से ! क्या कहा उसने ? '' केशव ने बिना किसी भूमिका के कहा |
          मुझे आश्चर्य हुआ की केशव को कैसे मालूम है कि मैं मिश्राजी के पास गया था और क्यों गया था ?
          '' क्या कहेगा ... कल जो भूपतसिंह और कम्पाउंडर ने कहा , वही आज उसने कहा | '' कहने के बाद में विचलित होने लगा |
          '' रेंजर ठीक कहता है | गोंडी मोहल्ले वालों के पीछे आप दुश्मनी क्यों मोल ले रहे हैं ! ये साला मनोहर ... ढोर ... गँवार ... कुछ दिन पहले मुँह नहीं खोल पाता था और आज देखो तो ... '' एकाएक केशव की आवाज तेज हो गई ,  '' साला हर बात पर सीना तानकर खड़ा हो जाता है ... आपने ही उसे शह दी है | ''
          मैं चुप था | मेरे मन में चिनगारी फूटने लगी | केशव की बातों में भी मिश्राजी , भूपतसिंह और कम्पाउंडर की बातों  जैसी बू आ रही थी |
          '' इन सब बातों से तुम्हें परेशान नहीं होना चाहिए | '' मेरे भीतर आग सुलगने लगी |
          '' सबसे अधिक परेशानी तो मुझे ही है | ''
          '' क्यों ? '' विस्मय से मेरा मुँह खुला रह गया | 
          केशव हँसा ,  '' बहुत भोले हो मास्साब ... मनोहर का असर गोंडी मोहल्ले के लोगों पर इतना जम गया है कि वो जैसा कहता है , सब वही करते हैं | ''
          '' तो क्या ... '' केशव मेरे नजदीक खिसक आया और फुसफुसाते हुए बोला , '' वह मेरे लिए खतरा बन गया है | हो सकता है कि अगले चुनाव में वही सरपंच बन जाए ! ''
          मेरे भीतर सुलगती आग ठण्डी पड़ने लगी |
          रात के अँधेरे में लकड़ियों में फँसे हए कपडे मेंआग भुकभुका उठी | अँधेरा ख़त्म नहीं होता, पीला पड़ जाता है | पीली रोशनी गोंडी मोहल्ले के लोगों के पसीने से भीगती काली - काली देहों पर पड़ती है , जो खड़ेरा देव को खुश करने के लिए माहुल के पत्तों से बनी पुड्की में महुए की कच्ची दारु पी रहे हैं और मादल की थाप पर करमा कर रहे हैं |

                                         ( आगे का अगले भाग में )   

                              - पवन शर्मा 
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पवन शर्मा ( कवि , लघुकथाकार , कहानीकार )
        पता

श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट  विद्यालय ,
जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
फो. नं. - 9425837079 .
ईमेल – pawansharma7079@gmail.com


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 संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867


23.2.20

पवन शर्मा की कहानी - '' दावानल '' - ( भाग - 1 )



( प्रस्तुत कहानी – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘ ये शहर है , साहब ’ से ली गई है )


                                दावानल

सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि मैं समझ ही नहीं पाया |
          नियुक्ति - पत्र मिलते ही मैं तीसरे दिन शहर छोड़ छोटे - से गाँव में आ गया - मास्टरी के लिए | मित्रों ने सलाह दी , क्या करेगा गाँव में रह कर ... गाँव के लोग गाँव छोड़कर शहर की ओर भाग रहे हैं और तू है कि शहर छोड़ गाँव भाग रहा है , भविष्य चौपट हो जायेगा ... आदि - आदि |
          घर के लोगों में भी यही प्रतिक्रियाएँ थीं मेरे लिए | पर मैं अपनी जिद पर अड़ा रहा |
          शुरू - शुरू में मुझे गाँव का माहौल रास नहीं आया , किन्तु जैसे - जैसे गाँव के लोगों से परिचय का दायरा बढ़ा , वैसे - वैसे गाँव और गाँव के लोग मेरे मन में समाते गए | गाँव का कोई बच्चा हो या बुजुर्ग , सभी के लिए मैं  ' मास्साब '  हो गया ... एक अपनत्व भरा सम्बोधन |
          गाँव की बसाहट बहुत सरल थी |
          गाँव के बीच में एक नाला था , जो गाँव को सरपंची मोहल्ला और गोंडी मोहल्ला में बाँटता था |
          सरपंची मोहल्ले में केशव सरपंच का मकान था , इसलिए इस मोहल्ले का नाम सरपंची मोहल्ला पड़ा | इसी मोहल्ले में फॉरेस्ट रेंजर मिश्राजी , फारेस्टर काशीराम , फारेस्ट गार्ड भूपतसिंग अपने - अपने परिवार के साथ सरकारी क्वाटरों में रहते थे |गाँव के सरकारी अस्पताल का कम्पाउंडर तथा नर्स भी इसी मोहल्ले में रहते थे | इस तरफ से ही तहसील के लिए पक्की सड़क जाती थी | इसी तरफ दो - तीन होटल भी थे | इसी तरफ सप्ताह में एक दिन  '  हाट '  भी लगती थी |
          पहले , दिन में तीन सरकारी बसें चलती थीं | अब प्राइवेट टैक्सियाँ भी चलने लगी हैं |
          पहले हफ़्तों - हफ़्तों पुलिस का एक भी सिपाही नजर नहीं आता था , किन्तु अब रोज ही तहसील से आया एकाध सिपाही दिनभर मटरगश्ती करता या महुए की कच्ची दारु चढ़ाए जेब गर्म करने के लिए मुर्गा फँसता नजर आ जाता था |
          सरपंच के बाजूवाले कमरे में मैं रहता था |
          सरपंच ने अपने मकान के सामने वाले कमरे में किराने वाली दुकान डाल रखी थी | शहर से सामान लाता और गाँव के लोगों को ड्योढ़े - दूने दामों पर बेचता |
          दूसरी तरफ गोंडी मोहल्ला में निम्न तबके के लोग रहते हैं , जिसके कारण सरपंची मोहल्ले के लोग उसे गाँव का उपेक्षित भाग मानते हैं |
          इस मोहल्ले में घर जरा दूर - दूर कच्ची मिट्टी के बने थे | घरों की छाजन देशी खपरों की थी | हर घर के सामने परछी बनी होती | परछी के  सामने भुट्टे रखने का  'जैरा '  होता | ढोर - डंगरों का स्थान घर के पीछे होता और वहीँ उनके खाने - पीने के लिए लकड़ी का नाद - डोंगा होता | घरों के पीछे ही लोगों के खेत थे |   
          इस मोहल्ले की औरतें और लड़कियाँ अपनी सुन्दरता बढ़ाने के लिए माथे , कनपटी तथा बाँह पर गोदना गुद्वातीं  और हँसली , कर्णफूल , छन्नी , तोड़ा , उमेठा आदि विशेष पर्वों पर पहनतीं |
          इस मोहल्ले के दूसरी तरफ जंगल - ही - जंगल था | साल , सागौन , बीजा , महुआ , तेंदू आदि के पेड़ों से अटा जंगल | जंगल के और आगे ऊँची पहाड़ी |
          इसी गोड़ी मोहल्ले में मनोहर रहता |
          मनोहर मेरी कहानी का नायक है | अन्य गँवई युवकों की तरह नहीं है मेरी कहानी का नायक | वह अक्सर मुझसे मिलता रहता है | मेरे घर भी आता रहता है |
          '' मास्साब मुझे भी आपके जैसे बनना है ... बताओ , मुझे क्या करना पड़ेगा ? ''  एक दिन मनोहर ने कहा | मैं चौंक गया | 
          '' कम - से - कम बारहवीं पास होना जरुरी है , उसके बाद ही बन सकेगा | ''  मैं हँसा, फिर उलाहना दिया उसे , '' बारहवीं तो पास कर नहीं पाया | सपना देखता है मेरे जैसे बनने का | ''
          सुनकर वह चुप रह गया |
          '' फिर कैसे बनूँगा ? ''  थोड़ी देर चुप रहने के बाद उसने पूछा |
          '' खूब मेहनत करो ... पढ़ो - लिखो | ''  मैने उसे समझाया |
          वह फिर चुप रहा - जैसे कुछ सोच रहा है |
          '' मजदूरी करूँ या पढाई करूँ - ये बात समझ में नहीं आती | ''  उसने कहा |
          अबकी बार मैं चुप था |
          कुछ दिन बाद मुझे ख़बर लगी कि मनोहर ने फारेस्ट गार्ड भूपतसिंह तथा कम्पाउंडर को अपने दो - तीन साथियों के साथ मिलकर मारा है | दोनों को काफी चोंट आईं हैं | 
          '' तूने क्यों मारा उनको ? ''  जब वह मिला , तब मैनें  पूछा |
          वह चुप रहकर हाथों की उँगलियाँ चटकता रहा |
          '' बताता क्यों नहीं ? ''  मैं खीझ उठा |
          '' उन्होंने किसना की बहन को कुछ कहा था | '' वह बोला |
          '' क्या कहा था ? ''
          '' कहा ही नहीं , बल्कि हाथ भी पकड़ लिया था | ''  वह लम्बी - लम्बी साँस लेने लगा , '' वह हाथ छुड़ाकर नहीं भागती तो ... ''  मनोहर ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी और अपने दोनों हाथों की हथेलियाँ आपस में रगड़ने लगा |
          '' उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट तो नहीं की ? '' मैंने पूछा |
          '' कैसे करेंगे ... गलती तो उन्हीं की थी | ''
          हम दोनों के बीच थोड़ी देर के लिए ख़ामोशी पसर गई |
          '' मैं महसूस कर रहा हूँ कि तेरे भीतर का गुस्सा बहुत तेज है | ''  मैनें पसरी हुई ख़ामोशी तोड़ी |
          '' तो क्या करूँ ? ''
          '' उस पर काबू रखना सीख | ''
          '' कैसे रखूँ | ''  वह बिफरने लगा , '' खून खौलता है मेरा , जब हमारे मोहल्ले के मजदूरों को  मजूरी बीस की जगह दस मिलती है | ''
          मैं सकते में आ गया |
          '' हमारे मोहल्ले के लोग न हों तो सालों का काम भी नहीं चल सकता | '' वह उठता हुआ बोला ,  '' अब आप ही बताओ , ये जुलुम है कि नहीं ? ''
          मैं निरुत्तर था |
          थोड़ी देर बाद वह चला गया |
          मैने महसूस किया कि मनोहर बेहद तुनकमिजाज , ठिठ , जिद्दी , जरा - जरा - सी बात पर भड़क उठनेवाला , बात - बात पर मरने - मारने पर उतारू हो जानेवाला है | यह उसके लिए अत्यन्त खतरनाक है |
          एक दिन वह सुबह - सुबह आ धमका | मैं स्कूल जाने की तैयारी कर रहा था |
          '' अरे ! कैसे आया ? '' मुझे आश्चर्य हुआ |
          '' आप कहते हैं कि गुस्से पर काबू रखना सीख , पर कैसे रखूँ ? ... बताओ ? ''   उसकी आवाज तेज थी |
          '' क्या हुआ ? ''
          '' होगा क्या ... वे लोग जंगल - के - जंगल काट रहे हैं | साल , सागौन , सब - कुछ | ''
          कौन लोग ? '' पूछते हुए मेरे माथे पर बल पड़ गए |
          '' वही साले भूपतसिंह , काशीनाथ और उसके आदमी | ''
          '' क्यों ? ''
          '' शहर ले जाकर बेचते हैं | '' वह हाँफने लगा |
          '' सचमुच , चिन्तावाली बात है | '' मैंने कहा |
          कुछ और जानते हैं इनके बारे में ? '' मनोहर ने मेरे  चेहरे पर अपनी नजरें जमा दीं |
          '' क्या ? ''  
                    ( आगे अगले भाग में )

                      - पवन शर्मा


             *****                          *****                              *****                  *****



पवन शर्मा ( कवि , लघुकथाकार , कहानीकार )

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22.2.20

जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला - सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) में चिन्तन दिवस का कार्यक्रम

जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला - सवाई माधोपुर ( राजस्थान )
जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिला-सवाईमाधोपुर(राजस्थान) में चिन्तन दिवस का कार्यक्रम -
प्राचार्य - श्री हरीश कुमार खंडवाल 
उप प्राचार्य - श्री चोब सिंह 
                           

दिनांक 22/02/2020 को विद्यालय में चिन्तन दिवस मनाया गया | मंच संचालन श्री के. एम.पराते , संगीत शिक्षक द्वारा किया गया - 
श्री के.एम.पराते ( म्यूजिक टीचर )

इस कार्यक्रम का प्रारम्भ श्री पराते जी द्वारा स्काउट की शपथ दिलवा कर हुआ | इसके पश्चात कक्षा - 9 वीं  के छात्र ( स्काउट )  मा. दयाकृष्ण  शर्मा ने अपने विचार व्यक्त किए | इस अवसर का चित्र -

मा. दयाकृष्ण शर्मा 
 मा, दयाकृष्ण शर्मा ने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा कि लार्ड बेडेन पावेल स्काउटिंग के जन्मदाता थे | इनके जन्म दिवस को चिन्तन दिवस के रूप में पूरा विश्व मानते आ रहा है |  बेडेन पावेल इंग्लेंड के निवासी थे | इनका पूरा नाम राबर्ट स्टीफेंसन स्मिथ बेडेन पावेल था | इनका जन्म 22 फरवरी 1857 को लंदन में हुआ था | इनके पिता का नाम हरबर्ट जोर्ज बेडेन पावेल था | माता का नाम हेनरेटाग्रेस स्मिथ था | इनकी शिक्षा लंदन में ही हुई थी | बाद में ये सेना में भर्ती हो गए | ये केवल 19 वर्ष के थे तब इन्हें सेना में लेफ्टिनेंट बनाकर भारत भेजा गया | कुछ समय बाद ये वापिस इंग्लेंड चले गए |
सन 1900 में दक्षिण अफ्रीका के '' बोर युद्ध '' के समय इन्हें छोटे - छोटे बालकों की असीम शक्ति , कर्तव्य - परायणता , कार्य - निष्ठ आदि गुणों का परिचय मिला | इससे लार्ड पावेल को विश्वास हो गया कि बालक युद्ध व शांति काल में विश्व को कितना लाभ पहुँचा सकते हैं | अपने इस विश्वास को रचनात्मक रूप देने के लिए इन्होने सन 1907 में  '' ब्राउन सी ''  नामक टापू पर मात्र 20 इलाकों का अपना प्रथम शिविर लगाया | इसकी सफलता से प्रेरित होकर बेडेन पावेल ने इस दिशा में और अधिक उत्साह से काम करना शुरू कर दिया |
 सन  1908 में उन्होंने स्काउटिंग की आधार पुस्तक  '' स्काउटिंग फॉर वोयज ''  लिखी | तदुपरांत स्काउटिंग सारे विश्व में फैलने लगी | सेना से अवकाश लेने के बाद लार्ड पावेल इस आन्दोलन के प्रचार - प्रसार में जुट गए |  सन 1921 में इन्होनें भारत में स्काउट की स्थापना की | सन 08 जनवरी 1941 को इन्होने कीनिया ( अफ्रीका ) में देह त्याग दी | 
विद्यालय के कंपाउंडर श्री बाबूलाल मीणा जी ने अपने विचार इस अवसर पर मंच से कहा -

श्री बाबूलाल मीणा 
 श्री बाबूलाल मीणा जी ने अपने विचार रखते हुए कहा की वैश्विक परिदृश्य एवं खानपान की बदलती आदतों के कारण खतरे सामने आ रहे हैं | इन खतरों में से एक निरन्तर नए रूप में आती virul flus नामक संक्रमित बीमारी है , जिसके फैलने की रफ़्तार बहुत तेज है | इसी कड़ी में गत कुछ दिनों में एक नया नाम निकलकर सामने आया है जिसे कोरोना नाम दिया गया है | यह विषाणु का समूह है जिसमे छोटे - छोटे बहुत से वायरस होते हैं | इसकी शुरुआत चीन के वुहान शहर से हुई है | वुहान शहर जहाँ यह बीमारी का रूप धारण कर चुका है | लगभग 2100 से ज्यादा मौत हो चुकी है | अब तक 25 देशों में यह अपना प्रभाव दिखा चुका है | 
इसकी उत्पत्ति का स्रोत अभी तक ज्ञात नहीं हो सका है | अलग - अलग मत के अनुसार उत्पत्ति का कारण समुद्री खाद्य के रूप में सामने आया | 
कोरोना एक बड़ा और गम्भीर खतरा -
कोरोना पहली बार 2003 में चीन ( sars ) एवं 2012 में अफ्रीका ( mers ) के रूप में पैदा होकर विश्व में अपना प्रभाव दिखा चुका है |कोरोना के बारे में सबसे गम्भीर चुनौती यह है कि यह अपना रूप परिवर्तित करता रहता है | जो कि इसके vaccine तैयार करने के काम को और भी मुश्किल कर देता है | इसके संक्रमण की रफ़्तार बहुत तेज है | 
भारत पर कोरोना का प्रभाव -
हालाकि इसकी उत्पत्ति वाला देश चीन है , परन्तु आज के परिदृश्य में आपस में global connectivity के कारण यह खतरा अन्य देशों में भी मंडरा रहा है | इसे गंभीरता से लेते हुए इसको रोकने के इंतजाम आवश्यक हैं ,जैसे - airport पर चैक पॉइंट बनाना , सरकारी व प्राइवेट news चैनल व अख़बारों से कोरोना के बारे में जागृति फैलाना , संक्रमण से गंम्भीर मरीजों के लिए वार्ड स्थापित करना | इस कड़ी में इस विषय के बारे में j.n.v. में जागरूकता फैलाने की जिम्मेदारी प्राचार्य के माध्यम से j.n.v. medical nurse staff एवं सदन प्रभारियों  , सदन के विद्यार्थियों के माध्यम से जागृति लाने की जिम्मेदारी दी गई है , ताकि विद्यार्थी अपने गाँव , समाज , परिवार में सूचना या जागृति ला सके | 
लक्षण -
इसके लक्षण सामान्य flu जैसे हैं | यह स्वसन तंत्र को प्रभावित करता है | इस लक्षण में नाक का बहना , तेज बुखार , श्वास लेने में तकलीफ , फेफडों में सूजन एवं गम्भीर केस में निमोनियाँ इत्यादि है |
उपचार या बचाब -
चूँकि इसकी अब तक कोई दवाई या vaccine नहीं बन पाई है | अतः बचाव ही उपचार है |  संक्रमित व्यक्ति से दूरी , छींकते - खाँसते समय टिशु पेपर या कपडा उपयोग करना , बार - बार हाथ धोना , माँस - अंडे इत्यादि अच्छी तरह पका कर खाना ,  भीड़ - भाड़ वाले स्थानों पर जाने से बचना | अधिक दिन तक यह लक्षणनजर आने पर डॉ.के नियमित सम्पर्क में रहें | 
इस प्रकार श्री बाबूलाल जी मीणा ने स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी सभी को मंच से बताई | 
इसके पश्चात् प्राचार्य श्री हरीश कुमार खंडवाल जी ने सभी को सम्बोधित किया -
प्राचार्य श्री हरीश कुमार खंडवाल 
प्राचार्य सर ने अपने सम्बोधन में सभी को बेडेन पावेल द्वारा स्थापित स्काउट के महत्व को बताया | कहा कि हमेशा अपने आस - पास सफाई रखनी चाहिए , यही स्वस्थ्यता की निशानी है | हमें खाने - पीने में हमेशा ध्यान रखना चाहिए | मेस ओर घर की खाद्य बस्तुओं के अलावा बाजार की खाद्य बस्तुएं स्वास्थ्य के लिए हमेशा हानिकारक होती हैं | आप का तन साफ़ होगा , आप स्वस्थ्य रहेंगे तो आप की पढाई अच्छी होगी और इस समय आपका स्वस्थ्य रहना बहुत आवश्यक है क्योकि परीक्षा नजदीक है |
इसके बाद स्काउट - गाइड ने साफ़ - सफाई का अभियान किया |
इस प्रकार यह कार्यक्रम समाप्त हुआ |

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द्वारा -
सुनील कुमार शर्मा ,
पी.जी.टी. ( इतिहास ) ,
जवाहर नवोदय विद्यालय ,
जाट बड़ोदा , जिला - सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) .