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19.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 11 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




18.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 10 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




17.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 9 )

 यह दोहा श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




16.6.21

पवन शर्मा की लघुकथा - " मेरे बाद "

 यह लघुकथा पवन शर्मा की पुस्तक - " हम जहाँ हैं " ( लघुकथा - संग्रह ) से ली गई है -





                                                                     मेरे बाद 


जब पिछली बार मिले , तब उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं की , जिससे इस बात का अनुमान लगाया जा सके कि वे कोई मकान खरीदने के चक्कर में हैं |

          ' अब आपको मकान की क्या जरुरत ? '  मैंने पूछा |

          ' क्यों ? '  उन्होंने चश्मे को आँखों पर से उतारकर हाथों में ले लिया |

          ' क्यों क्या ? ... कौन रहेगा उसमें ? ... आप और आपकी धर्मपत्नी ... बस | '

          ' वे हँसे , कह तो ठीक रहे हो पर ... | '

          ' पर क्या ... ? बच्चे तो अलग - अलग जगहों पर नौकरी कर रहे हैं ... वे लोग तो मकान का सुख भोग नहीं पायेंगे | '

          ' जप भी हो , पर मुझे मकान तो खरीदना ही है | '  पैंट की जेब से रुमाल निकालकर उन्होंने चश्में के मोटे- मोटे लैंस को साफ किया और आँखों पर लगा लिया |

          ' कब खरीदना है ? '

          ' बात पक्की हो गई है ... आज रजिस्ट्री हो जाएगी | '  वे थोड़ी देर के लिए रुके और अपने आधे हो गए गंजे सिर पर हाथ फिराते हुए बोले ,  ' अच्छा और बड़ा मकान है ... एक ड्राइंग रूम , चार बैड - रूम , एक किचिन , एक स्टोर - रूम , लैट्रिन . बाथरूम ... खुला और हवादार  ... साढ़े तीन लाख में बात पक्की हुई है | '

          ' पैसों का इंतजाम हो गया ? '

          ' रिटायरमेंट का पूरा पैसा लगा रहा हूँ मकान खरीदने में | '  वे बोले |

          ' पूरा पैसा नहीं लगाना चाहिए आपको ... कुछ बचाकर रखना चाहिए , बल्कि मेरे हिसाब से अब आपको मकान खरीदने की आवश्यकता ही नहीं ... सारी ज़िन्दगी किराये के मकान में ही गुज़ार ली , बची हुई भी किराये के मकान में गुज़ारनी थी | '  मैंने कहा |

          ' तुम सही कहते हो , पर बच्चों की ज़िद के आगे मुझे ये निर्णय लेना पड़ा | '  कहने के बाद वे बाद में अपनी हथेलियाँ रगड़ने लगे |

          उनकी बात सुनकर मैं चुप रहा |

          मैं जानता हूँ कि मैं लड़ाई - झगड़े , कलह - क्लेश की जड़ खरीद रहा हूँ | '

          मैं आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगा |

          ' मेरे और मेरी पत्नी के मरने के बाद इसी मकान के पीछे मेरे बच्चों में आपस में ही खींचा - तानी होगी | '

          मैं फिर भी चुप रहा |

          ' अरे मैं भी कौन - सी बात ले बैठा ... अभी तो मैं ज़िन्दा हूँ ... मेरे मरने के बाद जो भी हो  - मुझे क्या करना करना ! '

          मैं अवाक् उनका मुँह ताकने लगा |  **  

         

                                                           - पवन शर्मा 


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सम्पर्क सूत्र -

श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय

जुन्नारदेव , जिला – छिंदवाड़ा ( मध्यप्रदेश )

फोन नम्बर –   9425837079

Email –    pawansharma7079@gmail.com  


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.

15.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 8 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -