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9.1.22

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का नवगीत - " फ़ेहरिस्त लम्बी अभावों की : आदमी "

 यह नवगीत, श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " एक नदी कोलाहल " ( नवगीत - संग्रह ) से लिया गया है -












फ़ेहरिस्त लम्बी अभावों की : आदमी 


सिर्फ़ एक फ़ेहरिस्त लम्बी 

अब अभावों की ,

बन गया ज्यों बद्ददुआ है 

- आदमी |


अब पहाड़ों - सा खड़ा है 

दर्द सीने पर ,

कर्ज बढ़ता जा रहा 

हर दिन पसीने पर ;

जी रहा है ज़िन्दगी 

अब बस दबावों की ,

रखा काँधे पर जुआ है |

- आदमी |


जानता है 

किन्तु जो मजबूरियाँ ओढ़े ,

यदि न हो 

तो हर जरुरत को सहज छोड़े ;

किन्तु मन - बहलाव को

गाथा भुलावों की ,

सिर्फ दुहराता सुआ है 

- आदमी | **


                   - श्रीकृष्ण शर्मा 

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संकलन - सुनील कुमार शर्मा , फोन नम्बर - 9414771867

 

20.12.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का नवगीत - " फूट रहे कुल्ले "

 यह नवगीत, श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " एक नदी कोलाहाल " ( नवगीत - संग्रह ) से लिया गया है -











फूट रहे कुल्ले 


झूठ नहीं ,

ठूँठ था यहाँ पर 

अब ठूँठ नहीं |


फूट रहे कुल्ले 

ज्यों चन्द्रमा ,

बीहड़ को फोड़ 

उग रहा समा ;


अंधे आतंक से ,

तू टूट नहीं |


मंच के नियामक 

तो चले गये ,

बॉबी से बाहर 

विष - सर्प नये ;


फन पर रख बूट ,

अगर मूँठ नहीं |   **


          - श्रीकृष्ण शर्मा 

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सम्पर्क -  सुनील कुमार शर्मा , फोन नम्बर - 9414771867.

5.12.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का नवगीत - " मैं फिर भी न सपड़ा "

 यह नवगीत, श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " एक नदी कोलाहल ( नवगीत - संग्रह ) से लिया गया है -











मैं फिर भी  न सपड़ा


ठीक बाहर 

याकि मेरे ठीक भीतर 

एक मुर्दा ज़िन्दगी 

औ' शहर उजड़ा |


ओफ,

जब ये धड़कता है दिल 

लगता मांस का एक लोथड़ा है ,

और मैं महसूसता हर पल 

कि आफ़त सा कोई पीछे पड़ा है ;


अदबदा कर भागता मैं 

जान अपनी छोड़ ,

गिरता और पड़ता 

पाँव होते हुए लंगड़ा |


ख्वाब में 

डर से निकलती चीख ,

लगता हो गयी हैं अधमरी साँसें ,

धँसे हैं रक्त - प्यासे ड्रेकुला के दांत ,

खुलते जा रहे हैं देह के गाँसे ;


हो रही इन ठोकरों में 

है कपाल क्रिया ,

मैं फिर भी न सपड़ा | **


                                 - श्रीकृष्ण शर्मा 

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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , फोन नम्बर – 9414771867.


21.11.21

कवि नरेंद्र कुमार आचार्य की कविता - " देश का भविष्य चौराहे पर भीख मांग रहे हैं "

 










देश का भविष्य चौराहे पर भीख मांग रहे हैं



मैं भी गया था शहर 
चौराहे पर चक्कर काट रहा था।
नजर पड़ी मासूम से बच्चों पर।
आज भी बच्चे चौराहे पर भीख मांग रहे है।

कहाँ गया इनका भोलाभालापन ।
क्या नहीं है माता - पिता का जीवन ।
अपने जीवन को चलाने में बच्चे ।
आज भी बच्चे चौराहे पर भीख मांग रहे हैं।

कुछ माता - पिता की करनी रही होगी ।
कुछ नेताओं ने शिक्षा में कमी रखी होगी ।
इन सब की करनी को पूरा करने के लिए ।
आज भी बच्चे चौराहे पर भीख मांग रहे हैं।

क्या कमी छोड़ दी सरकार ने ।
क्या परवरिश नहीं की माता - पिता ने ।
पढ़ना लिखना छोड़कर इस उम्र में ।
आज भी बच्चे चौराहे पर भीख मांग रहे हैं।

खेल समाप्त हो गए हैं इनके लिए।
शिक्षा ही नहीं बनाई है इनके लिए ।
पढ़ना खेलना छोड़कर इस उम्र में।
आज भी बच्चे चौराहे पर भीख मांग रहे हैं।

कहानी सुनाने वाले दादा - दादी नहीं ।
क्या ये मोहब्बत के काबिल नहीं ।
प्यार मोहब्बत से अनजान ये ।
बच्चे चौराहे पर भीख मांग रहे हैं।

भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार हो रहा है।
व्यभिचार ही व्यभिचार फैल रहा है।
कैसे शिक्षित होगा हमारा समाज ।
क्योंकि बच्चे चौराहे पर भीख मांग रहे हैं।

नेता कहते विकास नहीं हो रहा हैं।
देश दिन पर दिन पिछड़ रहा है ।
ए नरेंद्र कैसे बढ़ेगा देश बुलंदियों पर ।
क्योंकि देश का भविष्य तो भीख मांग रहा है।

बच्चे तो बच्चे होते हैं पर दिल के सच्चे होते हैं।
बच्चों का बचपन यूँ  बर्बाद मत कीजिए ।
है आधुनिक युग के शिक्षित दानव ।
एक बार इनको शिक्षित करके तो देखिए । **

                                 - नरेंद्र कुमार आचार्य 

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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , फोन नम्बर – 9414771867.

17.11.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का गीत - " साथ किसका दूँ ? "

 यह गीत , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " बोल मेरे मौन "  ( गीत - संग्रह )  से लिया गया है -











साथ किसका दूँ ?


... और अब मेरे नयन पथरा रहे हैं ||


आँख के आकाश में बस आज केवल ,

मृत्यु के बादल सघन गहरा रहे हैं |

... और अब मेरे नयन पथरा रहे हैं !!


हँस रही मेरे अधर पर रेख नीली ,

आज अंतिम बार मेरी आँख गीली ,

मैं झरूँगा आज पतझर - पात - जैसा ,

इसलिए ही स्यात् मेरी देह पीली ,


रो रहे दुख साथ थे जो एक युग से ,

अब निराश्रित और बेघरबार हो कर ,

अब व्यथा ही रो रही है आठ आँसू ,

मैं जिसे लाता रहा दिन - रात ढो कर ,


साथ किसका दूँ , कहो जब आज मेरे ,

प्राण ही मुझको स्वयं बिसरा रहे हैं ?

... और अब मेरे नयन पथरा रहे हैं ||  **


                                       - श्रीकृष्ण शर्मा 

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 संकलन – सुनील कुमार शर्मा , फोन नम्बर – 9414771867