15.8.20

कवि संगीत सारंग की कविता - '' नमन है वीर जवानो को ''











नमन है वीर जवानों को 

नमन है वीर जवानों को 
जो देश के ख़ातिर दिये बलिदान 
दुश्मनों के दाँत खट्टे कर
परतंत्रता की जंज़ीर से
स्वतंत्रता दिलाने में दिये अमिट योगदान 
नमन है वीर जवानों को

स्वतंत्रता की लड़ाई में आये कितने वीर जवान 
देश के ख़ातिर लड़ने को हुए तैयार 
स्वाधीनता दिलाने में रहा अमूल्य योगदान 
राष्ट्र नायक बन किये राष्ट्र का कल्याण
नमन है वीर जवानो को 

बापू, सुभाष का है योगदान 
भगत, खुदीराम ने दिया बलिदान 
अंग्रेजों के छक्के छुड़ा कर
आगे आये भारत माँ के वीर जवान 
नमन है वीर जवानो को

स्वतंत्र भारत बन जग में छा गया 
अपने भारत का संविधान बना 
तिरंगा धरती पर लहरा गया 
दुनिया का सबसे बड़ा गणतंत्र बना 
नमन है वीर जवानो को 
जो देश के ख़ातिर दिये बलिदान **



स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

 - संगीत सारंग 








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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन 

नम्बर– 09414771867

सुनील कुमार शर्मा की ओर से - '' स्वतंत्रता दिवस की बधाई ''




कवि श्रीकृष्ण शर्मा का नवगीत - '' स्वतंत्रता का सूर्य ''


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक अक्षर और '' से लिया गया है )











स्वतंत्रता का सूर्य


फिर पन्द्रह अगस्त आया है |


राख चढ़े अंगारों को फिर हवा लगी है ,
मन के कोने में सोयी फिर ख़ुशी जगी है ,
फिर सपनों से गोद भरी है आज नींद की ,
रमजानों के बाद ख़ुशी है आज ईद की ,
तम पर उजियारे का सागर लहराया है |
फिर पन्द्रह अगस्त आया है |


हरियाली के इस बादल वाले महीने में ,
इस बूँदों वाले फूलों वाले महीने में ,
तीज सनूने राखी और भुजरियों वाले ,
मलहारों के इस झूले वाले महीने में
स्वतंत्रता का जज्बा अब फिर अंगड़ाया है |
फिर पन्द्रह अगस्त आया है |


सत्तावन की वह चिनगारी संघर्षों में ,
यह वह सपना है जो सत्य हुआ अब जाकर ,
आग बनी आरती शहीदों की बलि पाकर ,
उसी रक्त से यह प्रभात भी अरुणाया है |
फिर पन्द्रह अगस्त आया है | **


 - श्रीकृष्ण शर्मा 








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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन 

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14.8.20

अयाज़ खान की कविता - '' अव्यक्त ''















अव्यक्त 

सोकर उठे हैं ख़्वाब
छूकर गया है स्पर्श
देख रहा है मंज़र
बोल रही है ख़ामोशी।

निकल पड़ी हैं मंज़िलें
पिघल रही है चाँदनी
ठहर गया है समय
झुक गयी हैं पलकें।

बाट जोह रहा पंथ
जाग रही है नींद
प्यासा है पोखर
सजने लगे बाज़ार
सोकर उठे हैं ख़्वाब... **




  - अयाज़ खान 
114 सग्गम
एमपी वार्ड 11
जुन्नारदेव 480551
ज़िला छिन्दवाड़ा
मध्य प्रदेश







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13.8.20

अयाज़ खान की कविता - '' झूला ''







कवि अयाज़ खान 

















झूला 

किसी पुराने, मज़बूत टायर में रस्सी बाँधकर
बना लिया गया झूला
घर के सभी बच्चे बारी-बारी झूला झूलते
वह अपने कमरे में लेटी
झूला झूलते बच्चों को देखते रहती
किलकारियों से उसका कमरा गूँजने लगता।

पिछले कई दिनों से झूला ख़ाली था
बच्चे कहीं चले गये थे
वह बच्चों का इंतेज़ार करती रही
इस तरह कई साल गुज़र गये
फिर झूले को निकाल लिया गया।

बच्चों की चीख़-पुकार से उसकी नींद टूटी
सभी बच्चे झूला झूल रहे थे शायद
वह आहिस्ता-आहिस्ता झूले के पास पहुँची
लेकिन झूला अपनी जगह पे नहीं था
उसने गली के बच्चों का शोर सुना था
या वह नींद से जागी थी।

उसने खिड़की से झाँककर देखा-
गली में बच्चे कंचे खेल रहे थे
एक पेड़ पे टायर का झूला बँधा था
परिन्दे झूले पे बैठते, आपस में बतियाते
और एक बार फिर उड़ जाते। **


- अयाज़ ख़ान
114 सग्गम
एमपी वार्ड 11
जुन्नारदेव 480551
ज़िला छिन्दवाड़ा
मध्य प्रदेश


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12.8.20

कवि अयाज़ खान की कविता - '' महुआ का पेड़ ''













महुआ का पेड़ 

सावन में मन बादल हुआ
और तन महुआ का पेड़।
पत्तियाँ तोड़ने पेड़ पर चढ़ा हूँ
महुआ के रंग-सा हरा हूँ
मन बादल, तन महुआ
सावन की फुहार में भीगता हूँ
जैसे भीगता है पेड़ महुआ का।
सावन में महुआ के पेड़ पे चढ़ा हूँ
और पहुँच गया हूँ बादलों के बीच
ऐसा लग रहा है जैसे
मैं पिछले जन्म में पेड़ था महुआ का।
बिजली संग कौंधता है पेड़ महुआ का
तन-मन में, रोम-रोम में
महुआ के पेड़ को छूने का अहसास
किसी मूर्ति के आलिंगन जैसा था।
महुआ का पेड़ होता है क्यूँ इतना नशीला
अब समझ में आ गया।
धूप तपने से कोटर के पानी से
उठने लगा धुआँ
धुएँ के संग उड़ता हुआ मैं।
बारिश में खड़ा है ठूँठ महुआ का
ठूँठ किनारे की चट्टान जैसा हूँ। **


   - अयाज़ खान 
114 सग्गम
एमपी वार्ड 11
जुन्नारदेव 480551
ज़िला- छिन्दवाड़ा
मध्य प्रदेश







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11.8.20

कवि अयाज़ खान की कविता - '' चायवाला ''












चायवाला 


चायवाला लड़का अख़बार से था बेख़बर
उसे तो सिर्फ़ चाय बेचने से मतलब था।

भूख और ग़रीबी उसे विरासत में मिली थी
कहीं से भी वह स्कूल वाला लड़का नहीं लगा
चायवाला, अख़बार वाले लड़के से अनजान था
चायवाले के हिस्से में
खड़े रहने के लिये ज़मीन नहीं थी
इसलिये घूम-घूम कर वह बेच रहा था चाय
कल फिर नज़र आएगा चायवाला। 

चाय के साथ कविता दे गया चायवाला
जैसे चाय के प्याले में चाय का पौधा। **



 - अयाज़ खान 
एमपी वार्ड 11
जुन्नारदेव 480551
ज़िला- छिन्दवाड़ा
मध्य प्रदेश








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अयाज़ खान की कविता - '' चूमना चाहता हूँ ''












चूमना चाहता हूँ


धूप में पिघलता पत्रहीन पीपल का पेड़
किसी निर्वाक पहाड़ की भाँति खड़ा
उसकी कोमल, स्निग्ध कोंपलयुक्त शाखाएँ
उड़ते पंछियों को छूना चाहती थी जैसे
पत्रहीन पीपल को देखने का अहसास
कुछ ऐसा था जैसे किसी छोटी पुस्तक के भीतर
सहेजकर रखी गयी हो विद्या पेड़ की पत्तियाँ
ब्रेल लिपि की तरह उभरा था पीपल का पेड़
आसमान के कैनवास पे
जैसे किसी बच्चे को गोद में लिये
उसका माथा चूमता हूँ
कुछ ऐसे ही चूमना चाहता हूँ उस पेड़ को
बच्ची की तरह अपनी बाँहें फैलाए
बुला रहा है वह पीपल का पेड़। **


  - अयाज़ खान 
114 सग्गम
एमपी वार्ड 11
जुन्नारदेव 480551
ज़िला- छिन्दवाड़ा
मध्य प्रदेश





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कवि अयाज़ खान की कविता - '' चाय में ज़हर ''













चाय में ज़हर 


टूटा-फूटा छाता लिये बारिश में भीगता हूँ
जैसे कटा-फटा आसमान।

बचपन की पुरानी तंग गलियों से गुज़रता हूँ
जैसे घिसी हुई चप्पल।

साँसों का आरोह-अवरोह होता है
अधकटी गर्दन से।

चुनावी शोर में कानों पे हाथ रखता हूँ
जैसे पत्थर की मूर्ति।

पिघलता हूँ जैसे मोम, मुड़ता हूँ जैसे सड़क
अपना दिल हाथ में थामे घूमता हूँ।

सिर पे कफ़न बाँधे घर से निकलता हूँ
अपने टूटे दिल की ख़ाक़ छानता फिरता हूँ।

ज़िन्दा रहने के लिये लिखता हूँ
जैसे ज़हर भरा चाय का प्याला। **


 अयाज़ ख़ान
114 सग्गम
एमपी वार्ड 11
जुन्नारदेव 480551
ज़िला छिन्दवाड़ा
मध्य प्रदेश







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कवि अयाज़ खान की कविता - '' कवितांकुर ''














कवितांकुर


मन अंकित
तन पुलकित
पत्ता-पत्ता, चप्पा-चप्पा आनन्दित
दिल का हर कोना प्रफुल्लित।

सृजन के धरातल पर
कविता का बीज हुआ अंकुरित
तिमिर हरण को देखो क्षितिज पर
सूर्य हुआ उदित।

कण-कण गर्वित
तृण-तृण हर्षित
प्रकाश निर्झरित
हृदय मुदित
शब्द-शब्द सुरभित
कविताएँ विकसित।

मन झंकृत
तन पुलकित
अब कवितांकुर होगा पल्लवित
पुष्पित ! **


   -  अयाज़ खान 
           अयाज़ ख़ान
            114 सग्गम
            एमपी वार्ड 11
            जुन्नारदेव 480551
           ज़िला- छिन्दवाड़ा
           मध्य प्रदेश






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कवि अयाज़ ख़ान की कविता - '' औरत ''
















औरत 
औरत एक अधजली पाण्डुलिपि है
मर्द एक टूटा हुआ क़लम
गुफ़ा युग के अँधेरे में
किन्नर की तालियाँ गूँजती हैं
लेकिन उस किन्नर ने
भगवान के हत्यारों के देश में
जन्म लिया है।

औरत के मायने है- वस्तु या मवेशी
जितना दिल चाहे रखो
जैसा दिल चाहे इस्तेमाल करो
औरत मर्द का लिबास है
जब दिल चाहे पहनो
मैला हुआ तो उतार फेंको।
औरत की बेबसी देखकर
बेड़ियाँ सिसक पड़ी
औरत ख़ुदा का तोहफ़ा है
पैग़म्बर को भी औरत ने
जन्म दिया है
लेकिन आज भी औरत को
ज़िन्दा जलाया जा रहा है।

फूल जैसी औरत के साथ
ज़्यादती करने वाला मर्द
देशद्रोही नहीं तो फिर क्या है?
औरत एक ज्वलंत प्रश्नचिन्ह है।

क़ुरआन की बहुत-सी आयतों में
औरत के बारे में अज़ीम बातें लिखी है
औरत का नाम क़ुरआन की आयत
पे रखा जाता है
औरत घर की जन्नत होती है
लेकिन आज भी औरत को
अत्याचार की सूली पर
चढ़ाया जा रहा है।
किसी जर्जर क़ुरआन की
ख़ुश्बू है औरत।

कुसंस्कृति के मरूस्थल में
औरत एक शीतल नदी है
नदी, जिसकी पूजा की जाती है
और जिसे पचासों मीटर
चुनरी ओढ़ायी जाती है
दूसरी तरफ़ औरत की चुनरी को
तार-तार किया जाता है
दरिन्दों की तरह
औरत को औरत नहीं बल्कि
कुछ और बनाया जा रहा है।

अन्याय करना गुनाह है
अन्याय सहकर ख़ामोश रहना
उससे भी बड़ा गुनाह
औरत अब यह बात
अच्छी तरह समझ चुकी है।
औरत कोई ग़ज़ल नहीं
एक ललकार है, एक चीख़ है
सुलगती धूप में खड़ी पहाड़ी का
दूसरा नाम औरत है।

कविताओं की तरह
दुर्लभ हो रही है औरत
क्योंकि औरत एक अधजली पाण्डुलिपि है
औरत एक अधजली पाण्डुलिपि है। **


   - अयाज़ ख़ान
        मकान संख्या ११४
               सग्गम मस्ज़िद के पास
               महाराणा प्रताप वार्ड
               क्रमांक ११
               जुन्नारदेव ४८०५५१
               ज़िला छिन्दवाड़ा
               मध्य प्रदेश
               ९०९८९०९१५८




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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन 

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