31.12.19

याद किसी की


कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' बोल मेरे मौन '' से लिया गया है )


याद किसी की 

याद किसी की लेकर जाने 
मन क्यों भारी आज हो उठा ?
उलझ किन्हीं मीठी सुधियों में ,
खुद को ही मैं आज खो उठा !!

भूल गया मैं सब कुछ अपना ,
याद रहा बस केवल तपना ,
तप - तपकर साँसों का घुटना ,
बनकर वाष्प गगन में उठना ,

फिर ठंडी बदर्द कसक का ,
मिलकर चोट मर्म पर करना ,
सहन नहीं कर मेघों - जैसा ,
नयनों का झर - झर झर पड़ना ,

किन्तु सभी कह उठे - ' देखो ,
देखो , पागल आज रो उठा !
याद किसी की लेकर जाने 
मन क्यों भारी आज हो उठा ? ' 

          - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867


29.12.19

पवन शर्मा -''बड़े होकर तुम क्या बनोगे ?''

प्रस्तुत कविता- पवन शर्मा की पुस्तक -'' किसी भी वारदात के बाद '' से ली गई है )


बड़े होकर तुम क्या बनोगे ?

बोलो , बोलो मेरे बच्चे 
बड़े होकर तुम क्या बनोगे ?
इंजीनियर , डॉक्टर , वकील 
इंस्पेक्टर या कलेक्टर ?
मैंने बेटे से पूछा
ये बात सभी पूछते हैं 
जैसे मुझसे मेरे पिताजी ने पूछा था कभी 

बेटा बोला , ' कलेक्टर ! '
हम सभी खिलखिला उठे 
पिता भी खिलखिला उठे होंगे 
मेरे ऐसे ही जबाब पर 

मैं जानता हूँ 
जब बच्चे बड़े होंगे 
तब पायेंगे खुद को 
दाल - रोटी से जूझते हुए 

फिर भी हम 
न जाने क्यों 
बच्चों से पूछते हैं -
' बड़े होकर तुम क्या बनोगे ? '

- पवन शर्मा 
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पवन शर्मा
कवि , लघुकथाकार 











पता
श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट  विद्यालय ,
जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
फो. नं. - 9425837079 .
ईमेल – pawansharma7079@gmail.com

संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

28.12.19

दुपहर सर्द खड़ी


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' एक अक्षर और '' से लिया गया है )


दुपहर सर्द खड़ी 

          बेहद ठण्डा मौसम |

          सुबह शबनमी ,
          दिन है कुहरिल 
          सन्ध्या की चौपालों बैठी 
          रातों की महफ़िल ,
लेकिन रात ,
पुरानी इमली पर भूत का वहम |
          बेहद ठण्डा मौसम  

          धूप पोर भर ,
          तरुण सियाही ,
          दुपहर सर्द खड़ी 
          सूरज की देती नहीं गवाही ,
किरनें भरती
ध्रुव प्रदेश के रिक्त पड़े कौलम |
          बेहद ठण्डा मौसम |

          हवा सुई हो गयी 
          ठिठुर कर ,
          फैल गये हाशिये शीत के 
          सारी काया पर ,
लगता जैसे 
किसी फ्रीज में बन्द रह गये हम |
          बेहद ठण्डा मौसम |

                                 - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867



27.12.19

पवन शर्मा -'' जीवन : एक बिम्ब ''

( प्रस्तुत कविता - '' जीवन एक बिम्ब '' पवन शर्मा की पुस्तक -'' किसी भी वारदात के बाद '' से ली गई है )


जीवन : एक बिम्ब

सुबह
खेलते नन्हे
बच्चे की तरह !
दोपहर / पति - पत्नी के
निश्छल प्यार की तरह !
शाम
लाठी टेक कर
चलते बूढ़े की तरह !
बस
यही जीवन है
सुबह , दोपहर और शाम
की तरह !

                                    - पवन शर्मा
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श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट  विद्यालय ,
जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
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पवन शर्मा - '' तलाश ''

प्रस्तुत कविता - '' तलाश  '' पवन शर्मा की पुस्तक -'' किसी भी वारदात के बाद '' से ली गई है )















तलाश 
तुम 
जीवन का अर्थ 
खोजते हो 
सपनों को 
पालते हो 
भला , कैसे मिले 
जीवन का अर्थ 
पाले हुए सपने 
इन बालू के घरौंदों में 
जहाँ ,
अभावों की नागफनी 
मुस्काती हो 
दिगन्त पर 
हँसते हो 
कष्टों के बगुले  *





    - पवन शर्मा  



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जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
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पवन शर्मा - '' सपनीली इच्छाएँ ''

प्रस्तुत कविता - '' सपनीली इच्छाएँ '' पवन शर्मा की पुस्तक -'' किसी भी वारदात के बाद '' से ली गई है )


सपनीली इच्छाएँ 
हर महीने की पहली तारीख को 
घर भर की आँखों में 
सुनहरी चमक उभर आती है 
मेरी आँखों में भी 
साथ ही 
कई प्रकार की इच्छाएँ 

हर महीने की पहली तारीख को 
दफ्तर से घर लौटते हुए 
हमेशा सोचता हूँ 
लानी है इस माह 
अम्मा की नई साड़ी 
दद्दा की ऐनक 
छोटी बहन के लिए रोल्ड - गोल्ड के कंगन 

और भी तो 
कई - कई सपने देखते हैं हम सब 
वे भी क्या पूरे के पूरे
सच होते हैं 
सपने  तो सपने ही होते हैं 

याथार्थ तो यही है कि
अभावों की चादर 
अनन्त तक फैली हुई है 
मैं आज तक ये नहीं जान पाया ,
आख़िर 
हमारी इच्छाएँ मर क्यों नहीं जाती !

                                          - पवन शर्मा 
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कवि पवन शर्मा 













पता –
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जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
फो. नं. - 9425837079 .
ईमेल – pawansharma7079@gmail.com

संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिला– सवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

पवन शर्मा - '' शहर और जंगल ''

प्रस्तुत कविता - '' शहर और जंगल  '' पवन शर्मा की पुस्तक -'' किसी भी वारदात के बाद '' से ली गई है )











शहर और जंगल

शहर 
तो बस 
नाम के होते हैं शहर 

देखता है शहर नित रोज 
अपने गर्भ में पलते 
राहजनी 
हत्या / बलात्कार 
रंजिश / तनाव / आक्रोश 
साम्प्रदायिक उन्माद और दंगे 
आग और बमों के धमाके 
सड़कों पर जमे खून के कतरे 
लुभाती रूपसियाँ / गगचुम्मी कोठियाँ
चमक - दमक / सिक्कों की खनक 

कितना अजीब लगता है तब ,
जब , नहीं बता पाता शहर 
अपने पड़ोसियों का पता भी 

मैंने इतिहास की पुस्तक में पढ़ा है 
जंगल से गाँव 
गाँव से बना है शहर 
जंगल और शहर में 
अंतर है जमीन - आसमान का 

नहीं करता जंगल 
धर्म / मजहब / सजीव / निर्जीवों  में अंतर
नहीं करता जंगल 
थल / जल / नभ में अंतर
नहीं बहती कोई गरम हवा 

तपी - मनु पुत्रों की धरा है जंगल 
सच ,
बहुत ठंडा होता है जंगल 
सच ,
बहुत अच्छा होता है जंगल 
चलो ,
जंगल चलें !

                - पवन शर्मा 
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पवन शर्मा
( कवि , लघुकथाकार )


पता –
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पवन शर्मा - '' षड़यंत्र ''

प्रस्तुत लघुकथा – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘’ हम जहाँ हैं ‘’ से ली गई है )


    षड्यंत्र

वह देख रहा है | दद्दा को सभी घेरे हुए बैठे हैं | अम्मा , उसकी दोनों बहनें ... सीमा और लता और छोटा भाई ... विनोद | बीच में बैठे दद्दा बतिया रहे हैं | दद्दा अभी - अभी लौटे हैं |
' कितेक के यहाँ गए थे ? ' अम्मा पूछती हैं |
' कईन के यहाँ | ' दद्दा ने बताया |
. कछू जमी ? '
' जमी का ... फोटो ले आया हूँ |' दद्दा ने कहा और बैग में से चार फोटो निकाल कर अम्मा की ओर बढ़ा दीं | अम्मा के पास जाने से पहले सीमा और लता ने फोटो झपट लीं | फोटो देख कर उन दोनों के चेहरे पर प्रसन्नता छा गई | विनोद भी झुककर देखने लगा |
' अम्मा , जे ठीक है |' सीमा बोली |
' नई अम्मा , जे ठीक है |' लता बोली |
वह कुछ नहीं बोला | उसे ये सब तमाशा लग रहा था | अब अम्मा भी फोटो देखने लगीं | दद्दा कह रहे थे , कमीज उतारते हुए , ' मैनें तो हरेक के यहाँ जे कही कि साठ एकड़ खेत है ... ट्रेक्टर चल रओ है ... गाय - बैल - सब - कुछ है , कोई कमी नई है मोए ! बस , मौड़ी भर ठीक होनी चाहिए | और कहो कि मेरो मौड़ा एम.ए.फ़ाइनल में है जे साल ... और मौड़न से सीधो .. कोई ऐब नई है बामे ... चाहे तो चल के देख लेओ |' दद्दा थोड़ी देर रुके , बीडी सुलगाई , फिर बोले , ' जे ऊपर वाली फोटो है न .. जाके बाप ने कहो कि ब्याह में कोई - कसर नई रखूँगो ... आवभगत पूरी ... पच्चीस हजार देवे कूं भी बोलो है | मैं सोच रओ हूँ कि जई के साथ पक्की कर देऊँ | और जे नीचे वाली फोटो है न .. जा के बाप ने बीस तक की बात की  ... | ' दद्दा ने कहा और बीडी में जोर से सुट्टा मारा और हलक से ढेर सारा धुआं उगल दिया | ' अब तो जई के ऊपर है कि जाय कौन - सी मौडी पसंद है |' अम्मा बोली |
वह मन - ही - मन सुलगने लगा |
' काए रे , कौन सी ठीक है ? ... देख ले ... तू भी देख ले ... नई तो बाद में हमें ही दोष दे ... बता दीइये ... परों तक जवाब भेजनो है |' दद्दा बोले |
वह देखता है कि सीमा और लता आपस में धीरे - धीरे कुछ बात कर रहीं हैं ... विनोद भी उनमें ही जा मिला है ... अम्मा भी उठ कर दद्दा के पास जा बैठीं हैं ... उसे लगा ... घर में सभी उसके विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे हैं ... क्या दद्दा ... क्या अम्मा ... क्या सीमा ... क्या लता ... क्या विनोद ... सब |
' मोए इतनी जल्दी कए के लाने बेच रहे हो दद्दा |' बोलते हुए विद्रूपता उसके चेहरे पर तैर आई |

                              - पवन शर्मा 
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पवन शर्मा ( कवि , लघुकथाकार )
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24.12.19

मावट की बारिश होने पर

( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक अक्षर और '' से लिया गया है )













( कहते हैं  ' सावन की झरन , भादौं  की भरन ' , किन्तु भादौं  सूखी गयी | पानी नहीं बरसा | परन्तु वर्ष के अन्तिम दिन 31 दिसम्बर 2000 को रात में अच्छी वर्षा हुई | फलस्वरूप यह रचना लिखी गई )

मावट की बारिश होने पर 

आज हवा कुछ सीली - सी है ,
धरती गीली है ,
लगा 
विदा के वक्त 
वर्षा की आँख पनीली है |
          कुछ दिन पहले 
          जेठ लिये था 
          हाथों जलती हुई लुकाठी ,
                    तार - तार की 
                    छांह गदीली 
                    मार - मार किरनों की साँटी ,
लगा 
रेत से बतियाने में 
भादौं भूली 
चूल्हे रक्खी हुई पतीली है |
          देखा मैने 
          शाम - शाम को 
          आसमान में कुछ कपास थी ,
                    पर उम्मीद न थी 
                    पानी से ,
                    जीवित छन्दों के छपास की ,
सुबह हुई 
साँसें गन्धायीं
लगा तृषित माटी ने 
रात वारुणी पी ली है |

             - श्रीकृष्ण शर्मा 
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 संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867
    







21.12.19

'' अय्यारों की बस्ती में ''

( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक अक्षर और '' से लिया गया है )














अय्यारों की बस्ती में 

हैं बींध रहे दुर्दिन , पर किसको लिखें पाती ?
चौहद्दियों सन्नाटा , व्यूह तिलिस्माती !!
अय्यारों की बस्ती ये ,
सच की शिनाख्त मुश्किल ,
है इनमें कौन दर्दी ,
है इनमें कौन कातिल ?
एक आँख रो रही है , एक आँख मुस्कराती |
चौहद्दियों सन्नाटा , है व्यूह तिलिस्माती | |
इस आग के सफ़र में 
क्या चीखना चिल्लाना ?
बेरहम हवाओं में 
कुछ और सुलग जाना 
रिश्तों की देहरी पर , तामाशायी बाराती |
चौहद्दियों सन्नाटा , है व्यूह तिलिस्माती !!
पहरे पे खड़े अन्धे ,
हैं भाँजते तलवारें ,
राजा के भाग्य में हैं ,
बस खौफ़ , घुटन हारें ,
बंजर उगीं घटनाएँ , जंगल हुए शहराती |
चौहद्दियों सन्नाटा , हैं व्यूह तिलिस्माती !!
है दर्द का समन्दर ,
हर साँस - साँस डूबी ,
फिर भी तो जिये जाती ,
ये ज़िन्दगी अजूबी ,
सौ सांसतों कबीरा की साखियाँ बतियातीं |
चौहद्दियों सन्नाटा , हैं व्यूह तिलिस्माती !!

                       - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867


17.12.19

कहाँ है सूर्यमुखी ?


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के काव्य - संग्रह - '' अक्षरों के सेतु '' में लिखित 1966 की रचना )












कहाँ है सूर्यमुखी ?

हे प्रभु !
कहाँ है सूर्यमुखी 
मेरी आकांक्षाओं का 
वह प्रकाश - पिण्ड कहाँ है 
जिसके अभाव में 
अंधी हैं मेरी आँखें 
बहरे हो गये हैं मेरे कान 
जिससे बिछुड़ कर 
प्रताड़नाओं और अवमाननाओं के तीव्र स्वर में 
मेरी वाणी मूक हो गयी है 
लूले हो गयें हैं हाथ 
और पाँव लंगड़े 
विलगाव होते ही जिससे 

मेरे अदम्य उत्साह 
अपराजेय पौरुष 
और अनंत शक्ति का वह स्त्रोत / जो 
मेरी धमनियों और शिराओं में 
बहता था अजस्त्र गति से 
सूख गया है |

मेरे प्रयत्न 
पीड़ित हैं पक्षाघात से 
और भाग्य  क्षय से ग्रसित 

धूलि - धूसरित है 
रोली मेरे मस्तक की 
काट दिये गए हैं डैने मेरी उडान के 
और मैं 
बंदी हूँ ध्रुव प्रदेश में 
दीर्घकालीन रात्रि का 
दिन - रात के इस जीवन - व्यापी युद्ध में 
क्षत - विक्षत हो चुकी है मेरी जिजीविषा 
चारों ओर शत्रुओं से घिरी |

ज्ञात नहीं है मुझे 
मस्तिष्क है या नहीं 
ह्रदय है या नहीं मेरे पास 
सोच - समझ अनुभूति - संवेदन कहाँ हैं सब ?
शायद एक यंत्र - मात्र रह गया हूँ मैं 
जिसमें एक विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया होती है 
एक विशेष बटन दबाये जाने पर 
मुखापेक्षी हूँ मैं 
किसी साधन का 
पर शीश के ऊपर हैं सप्तर्षि 
जिन्हें नीचे नहीं उतार पा रहा मैं 
लाख सिर पटक कर भी |

ओझल है ध्रुवतारा 
और दिशा - ज्ञान भ्रम में है 
घूम रहे हैं तेजी से अनगिनत नक्षत्र - पिण्ड 
किसी आकर्षण की परिधि में 
पर छिटका हुआ 
गुरुत्वाकर्षण से मैं 
किस अबूझे चक्रवात 
किस अपरिचित धूमकेतु ने जकड़ लिया हूँ |

उठ खड़ी हुई है 
संघर्षों की ऐसी भीड़ 
जो रौंदती चली जायेगी
मेरे सम्पूर्ण व्यक्तित्व को 
और साँसें तोड़ता हुआ वर्तमान 
भविष्य के अंधकार में 
आँखें मींच लेगा |

             - श्रीकृष्ण शर्मा 
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15.12.19

‘ मेरी छोटी आँजुरी ’- 2


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा की ‘ मेरी छोटी आँजुरी ’ ( दोहा – सतसई ) - '' से लिया गया है )



9.12.19

नहीं कुछ होने वाला है

कवि श्रीकृष्ण शर्मा के गीत - संग्रह - '' बोल मेरे मौन '' से लिया गया है -


नहीं कुछ होने वाला 

नहीं , अब रहनुमाओं से नहीं कुछ होने वाला है  ||

कि धोखेबाज - खुदगर्जों के सीने हो गये पत्थर ,
इबादत या सदाओं से नहीं कुछ होने वाला है |
नहीं अब रहनुमाओं से नहीं कुछ होने वाला है ||

मची जद्दोजहद है और अफरा और तफरी है ,
बड़ों को राजपथ , छोटों की गलियों किन्तु सँकरी हैं ;
बड़ों के लिए पौबारह हैं ,चौके  और छक्के हैं ,
कि साधारण जनों को गम हैं , आँसू और धक्के हैं ;

चटख रंग ज़िन्दगी के आज मैले और फीके हैं ,
कि होते नित - नये ईजाद शोषण के तरीके हैं ;

यहाँ से वहाँ तक बहुरूपिये , ठग और हत्यारे ,
नहीं  ख्वाजासराओं से नहीं कुछ होने वाला है |
नहीं , अब रहनुमाओं से नहीं कुछ होने वाला है ||

                              - श्रीकृष्ण शर्मा 
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* हरम का रखवाला हिजड़ा 

संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

7.12.19

मलवे का एक ढेर


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के काव्य - संग्रह - '' अक्षरों के सेतु '' की सन 1973 की रचना है )













मलवे का एक ढेर 

उबड़ - खाबड़ को कुचल कर ,
कहाँ आ गया है -
बढ़ता हुआ शहर ?
- आड़ में ,
- पहाड़ में |

मैनें तो कुछ नहीं किया ,
बैठा ही रहा ,
मगर फ़ासला कट गया है |
कुछ भी तो नहीं कहा ,
पानी भी नहीं पिया ,
मगर राह में आया 
- दरिया हट गया है ,

डट गया है 
कोई कुत्ता 
हड़बड़ा कर सामने ,
जंगल आ गया है 
दूर से आती हुई 
पहाड़ियों का हाथ थामने,
और 
खड़ा है 
कुछ पेड़ों के सहारे |

जमीन से लगीं 
जमुहाती झाड़ियाँ 
मारती हैं खिसिया कर 
चिड़ियों को ढेले,
पगडंडियों को पकड़ कर 
चल रहे हैं खेत 
और 
पथरीली चट्टानों ने 
पीस कर धर दिया है 
रेत |

उकताये हुए 
आसमान से कानाफूसी करते 
सागौन और बरगद 
इकलसुहा इमली के ठूँठ को 
चिढ़ाते हैं मुँह 
कभी - कभी |

विवशता में 
सूखे तालाब की बदनसीबी पर 
झींकती घास ,
सिर उठा - उठा कर 
टोहते धान
पटकते हैं पीठ पर से 
हवा को |

समाधिस्थ है -
पत्थर पर 
उभरा संसार 
अपनी नियति के 
दुर्वह शव को उठाये ,

अर्थहीन इयत्ता के 
अप्रिय प्रश्नों की खरौंच ,
दो टूक उत्तर के लिए 
बार - बार आवाज लगाता
सोच ,

समय से हारा
ज़िन्दगी का यह बिखरा खण्डहर ,
समेटे है -
टूटन - घुटन - उत्पीड़न ,
पत्थरों में लड़खडाता है 
और पत्थरों में 
घुट - घुट कर मर जाता है |

ठण्डाई आकांक्षाओं 
बुझे संतापों 
अपाहिज सौंदर्य
और कठिन संवेदनाओं 
- में से भी कुछ टीसता है |

खीझता है बियाबान 
मनुष्य के अहम् पर ,
स्वयं पर आये 
गुमनाम संकटों की सलीब पर टंगा ,

अपने ही 
रक्त से रंगा हुआ 
यह अकेलेपन का अहसास ,
- नंगा सो रहा है ,
वर्तमान की जांघ पर 
नपुंसक मलवे का एक ढेर |

       - श्रीकृष्ण शर्मा 
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6.12.19

नहीं किये हैं हस्ताक्षर मैंने !

( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के काव्य - संग्रह - '' अक्षरों के सेतु '' से ली गई 1966 में लिखित कविता )
















नहीं किये हैं हस्ताक्षर मैंने 

मैं प्रस्थापित नहीं हुआ 
झूठे विश्वासों पर ,
गवाह है -
यह सन्नाटा ,
घुलता चला जा रहा है जो 
धुँए - सा उत्सवों में |

धुँधलाया नहीं 
मेरा जाग्रत आत्म - बोध 
षड्यंत्रों के संदिग्ध परिवेश में भी ,
मेरी चेतना ने 
कोशिश की है
विभिन्न आयामों और कोणों से 
सुघर - सुडौल चेहरे उकेरने की 
विसंगतियों की पृष्ठभूमि में |

मैं रात से हारा नहीं ,
गवाह हैं -
मुक्त होती दिशाएँ 
धुंध और कुहासे की बाँहों से ,
जो झेल रही हैं अब 
दिन की पहली किरन 
अपने माथे पर |

मैंने 
गला नहीं घोंटा सत्य का 
किसी अवैध संतान की भाँति ,
असमर्थित प्रतिभाओं का 
अनौपचारिक समर्थन किया है मैने ,
ह्रदय के समस्त ममत्व से 
उनके अपेक्षित और तिरस्कृत व्यक्तित्व को 
मैने जलाया है मोमबत्ती जैसा 
और प्रकाशमान बनाया है |
सामाजिकता की 
अनेक प्रताड़नाओं
और लांछनों की भीड़ में 
असमाप्त रही है मेरी एकांतिकता ,
गवाह हैं -
मेरी वे उदात्त आकांक्षाएँ ,
जो जन्मने के पूर्व ही मर गयीं ,
मेरी वे उदास प्रार्थनाएँ
जो अनुत्तरित रह गयीं ,
मेरी वे अकल्पनीय शाश्वत यंत्रणाएँ 
जो जीवित रहेंगी 
अगले क्षण भी |

मैं जानता हूँ -
दुलरायी नहीं जावेंगी मेरी पीड़ाएँ ,
सुरक्षित रखा जायेगा मेरा इतिहास 
संभावना नहीं है मुझे ,

लेकिन 
छटपटा रही है 
मुक्ति पाने को मेरी जो घुटन ,
क्या करूँ में उसके लिए ?
मैं जानता हूँ -
मेरी अभिव्यक्ति की नियति है 
अपरिचय की मृत्यु |

फिर भी 
समर्पित नहीं हुआ मैं 
अस्वाभाविकताओं को ,
मैं विसर्जित नहीं हुआ विफलताओं में ,
गवाह हैं -
मेरे समक्ष रखे 
पश्चातापों के कोरे संधि - पत्र ,
जिन पर 
आज भी नहीं किये हैं हस्ताक्षर मैने !

                     - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

 
   

3.12.19

हर कदम डर और खतरे

( '' हर कदम डर और खतरे '' कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक अक्षर और '' से लिया गया है )













हर कदम डर और खतरे 

गुम हुए हैं वन 
शहर में / और 
शहरों भेड़िये हैं 
          बस्तियों में लक्कड़बग्घे हैं 
          कि करते अपहरण जो ,
          हैं यहाँ पर रीछ 
          नैतिक अतिक्रमण को ,
लोमड़े बनते सँवरते , 
शोहदेपन के लिए हैं |
गुम हुए हैं वन ...
        कबरबिज्जू  बना तस्कर ,
        चुस्त चीता आदमी है ,
        इस दशा में हर सबल 
        बधिया बनेगा लाजिमी है , 
रंगे स्यारों - से कुटिल 
धोखों भरे बहुरूपिये हैं
गुम हुए हैं वन ...
        तने हाथों में लगे हैं 
        सूअरों के तेज चाकू ,
        लिए वहशी हिंस्र भैंसे 
        दिलों में अपने हलाकू ,
हर कदम डर और खतरे ,
मुश्किलों के काफिये हैं 
गुम हुए हैं वन ...

           - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

  

1.12.19

आख़िर फ़र्क क्या पड़ा ?

( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के काव्य - संग्रह - '' अक्षरों के सेतु '' से ली गई 1976 में लिखित काव्य )














आख़िर फ़र्क क्या पड़ा 

ऐसी बेरंग 
और बदमजा 
तो नहीं रही कभी 
आज जैसी ये ज़िन्दगी

कितना बेमानी रहा 
तहखानों से निकल कर 
खुली हवा में आने का अहसास 

पता नहीं 
कब हुआ ये 
कि हमारे आक़ा
जाते - जाते छोड़ गये
अपने औरस पुत्र हमारे बीच 
जो बन बैठे हमारे वैधानिक सरपरस्त 

आख़िर फ़र्क क्या पड़ा ?

जरखरीद गुलाम 
ढोर - डंगर या कैदी 
फ़र्क ही क्या है होने का /
न होने का इनके लिए 

घुटन 
जो भीतर है 
बाहर भी वही तो है 

हक़ है 
लेकिन नहीं है 
सुख - सुविधाएँ भोगने का 
पाक़ - साफ़ लफ़्ज , लेकिन 
उनका ये अर्थ और व्याख्या ?
आख़िर व्याख्याकार तो वे ही हैं ,
जो ढालते हैं -

जुनूनी नारे 
जादुई वक्तव्य 
इन्द्रधनुषी आश्वासन / और 
आने वाले दिनों के सुनहरे सपने 
जो 
पस्तों और खस्ताहालों की बहबूदी 
और मुल्क की सलामती के नाम पर 
कम अक्ल और बुजदिलों को बचाने 
- और तरह सुरक्षित रखते हैं 
अपने आपको 

आज बन गया है 
हमारा सम्पूर्ण तंत्र
झूठ और फ़रेब का अभेध दुर्ग 
- खूंखार भेडियों के लिए 
ठीक वैसा ही जैसे पहले था 

ऐसे में -
पर्तों - दर - पर्तों  और 
तरह - तरह के मुखौटों के पीछे से 
आती आवाज को सुनो 
गौर से सुनो 
और पहचानो 
कि कौन है अपने बीच 
- वह ख़ूनी पिशाच ?
ता कि
मुक्ति पाने के लिए उससे 
बड़ी ही चालाकी और होशियारी से 
पेबस्त कर सको मात्र एक अदद गोली 
उसके सीने में 
- दहशत की | 

                - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867