7.12.19

मलवे का एक ढेर


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के काव्य - संग्रह - '' अक्षरों के सेतु '' की सन 1973 की रचना है )













मलवे का एक ढेर 

उबड़ - खाबड़ को कुचल कर ,
कहाँ आ गया है -
बढ़ता हुआ शहर ?
- आड़ में ,
- पहाड़ में |

मैनें तो कुछ नहीं किया ,
बैठा ही रहा ,
मगर फ़ासला कट गया है |
कुछ भी तो नहीं कहा ,
पानी भी नहीं पिया ,
मगर राह में आया 
- दरिया हट गया है ,

डट गया है 
कोई कुत्ता 
हड़बड़ा कर सामने ,
जंगल आ गया है 
दूर से आती हुई 
पहाड़ियों का हाथ थामने,
और 
खड़ा है 
कुछ पेड़ों के सहारे |

जमीन से लगीं 
जमुहाती झाड़ियाँ 
मारती हैं खिसिया कर 
चिड़ियों को ढेले,
पगडंडियों को पकड़ कर 
चल रहे हैं खेत 
और 
पथरीली चट्टानों ने 
पीस कर धर दिया है 
रेत |

उकताये हुए 
आसमान से कानाफूसी करते 
सागौन और बरगद 
इकलसुहा इमली के ठूँठ को 
चिढ़ाते हैं मुँह 
कभी - कभी |

विवशता में 
सूखे तालाब की बदनसीबी पर 
झींकती घास ,
सिर उठा - उठा कर 
टोहते धान
पटकते हैं पीठ पर से 
हवा को |

समाधिस्थ है -
पत्थर पर 
उभरा संसार 
अपनी नियति के 
दुर्वह शव को उठाये ,

अर्थहीन इयत्ता के 
अप्रिय प्रश्नों की खरौंच ,
दो टूक उत्तर के लिए 
बार - बार आवाज लगाता
सोच ,

समय से हारा
ज़िन्दगी का यह बिखरा खण्डहर ,
समेटे है -
टूटन - घुटन - उत्पीड़न ,
पत्थरों में लड़खडाता है 
और पत्थरों में 
घुट - घुट कर मर जाता है |

ठण्डाई आकांक्षाओं 
बुझे संतापों 
अपाहिज सौंदर्य
और कठिन संवेदनाओं 
- में से भी कुछ टीसता है |

खीझता है बियाबान 
मनुष्य के अहम् पर ,
स्वयं पर आये 
गुमनाम संकटों की सलीब पर टंगा ,

अपने ही 
रक्त से रंगा हुआ 
यह अकेलेपन का अहसास ,
- नंगा सो रहा है ,
वर्तमान की जांघ पर 
नपुंसक मलवे का एक ढेर |

       - श्रीकृष्ण शर्मा 
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www.shrikrishnasharma.com
संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867  

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