25.11.19

बाक़ी है


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के काव्य - संग्रह - '' अक्षरों के सेतु '' से लिया गया है )














बाक़ी है 
रात गहरी ,
सर्द सन्नाटा ,
दिशाएँ चुप |

एक ढिबरी जोत 
बाक़ी है 
अँधेरा घुप् 

- श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदाजिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

23.11.19

ज़िन्दगी


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के गीत - संग्रह - '' फागुन के हस्ताक्षर '' से लिया गया ,1963 में रचित गीत )














ज़िन्दगी  ऐसी कि जैसे हो कोई मैला बिछौना ,
या कि चूल्हे पर चढ़ा जैसे कोई फूटा भगौना ;
या किसी ने भीड़ वाले और चलते रास्ते पर -
चाट कर जैसे दिया हो फैंक कोई व्यर्थ दौना |

जिन्दगी ऐसी कि जैसे डबडबाती आँख कोई ,
धूल से जैसे अँटी हो बन्द घर की ताख कोई ;
या किसी मजदूर- बस्ती के धुँए में झींकती - सी -
रोशनी को ज्यों दबोचे हो अँधेरा पाख कोई |

जिन्दगी ऐसी कि जैसे गाँव कोई पत्थरों का ,
या अजूबों के शहर में हो मोहल्ला सिरफिरों का ;
या कि आदमखोर जत्थों से निहत्था जूझता ये -
जंगलों से जा रहा जो काफ़िला कुछ अक्षरों का |

                          - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

20.11.19

मेरी छोटी आँजुरी


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा की ‘ मेरी छोटी आँजुरी ’ ( दोहा – सतसई ) - से लिया गया है )



18.11.19

'' प्यार '' - ( 3 )


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से मुक्तक लिया गया है )






16.11.19

'' कैसा यह दौर ? ''

( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' एक नदी कोलाहल '' से लिया गया है )















'' कैसा यह दौर है ''

पंथ नहीं ,
फिर भी तो 
चलने का अंत नहीं |

पाँवों के नीचे आ 
पगडंडी टूट गई ,
आहट तक नहीं हुई 
ख़ामोशी छूट गयी ;

मन होता 
तोडूँ इस गहरे सन्नाटे को ,
पर मिलता वृंत नहीं |

चल - चलकर आये 
उस ठौर जहाँ -
मरुथल के भ्रम जन्मे ,
कुंठाएँ बंजर की 
रीढ़ तोड़ते अभाव 
सहती काया घर की ;

कैसा यह दौर ?
जहाँ 
जगता भय सभी कहीं |

- श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

15.11.19

श्रीकृष्ण शर्मा का मोनो

                                                             (  श्रीकृष्ण शर्मा का मोनो ) 

13.11.19

'' अवशता ''

( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक नदी कोलाहल '' से लिया गया है )














'' अवशता ''
( ओम प्रभाकर के एक गीत की शीर्ष पंक्तियों से प्रेरित )

क्या करें ,
कहाँ जायें ?

सूरज तो चला गया 
संध्या के संग ,
किसका अब साथ करे ?
दृष्टि यहाँ बैठी 
निस्संग ;

आँखों पर 
अँधियारा कब तक उठायें ?

अनपेक्षित ध्वनियों का 
क्या है अस्तित्व ?
आदमी प्रसुप्त 
... और ...
मृत है अपनत्व ;

ऐसे में 
आस्था को कब तक जगायें ?

                        - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

11.11.19

'' हुए अपरिचित हम ''


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक नदी कोलाहल '' से लिया गया है )














'' हुए अपरिचित हम ''

इस सन्ध्या के तम में 
हुए अपरिचित हम |
अपने लिए निरर्थक ,
अपने ही उपक्रम |

तर्क खड़े हैं तनकर ,
बहसें आग लिये ,
छूँछे शब्द गरजते 
होठों झाग लिये ;

दुर्गन्धित बातों से ,
प्रदूषिता सरगम |

रिश्तों की गरमाहट
महज दिखावा है ,
फूल - हँसी मौसम का 
सिर्फ़ छलावा है ;

अहसासों पर भारी ,
स्वार्थ और दिरहम * |

                       - श्रीकृष्ण शर्मा 
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* दिरहम : संयुक्त अरब अमीरात की मुद्रा


संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

8.11.19

'' करुणा गप है ''


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक नदी कोलाहल '' से लिया गया है )














'' करुणा गप है ''

पिघल रहा है 
दर्द ,
कौन रुमालों लेगा ?

चले गये
सारे हमदर्दी 
आँख चुराकर ,
सम्बन्धों पर 
प्रश्न - चिन्ह अनगिनत 
लगाकर ;

गैर कौन 
जो नेह - छोह को 
भाषा देगा ?

साँसत में है 
साँस 
और गूँगे आश्वासन ,
अन्धी - बधिर सभा है ,
कौन सुनेगा 
रोदन ?

करुणा गप है ,
सच कहना 
क्या चीर बढ़ेगा ?

                       - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

7.11.19

'' प्यार '' - ( 2 )


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से मुक्तक लिया गया है )





संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

6.11.19

'' अक्षरों पर बन्दिशें हैं ''


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है )













'' अक्षरों पर बन्दिशें हैं  ''

          अक्षरों पर बन्दिशें हैं ,
          शब्द पर पहरे ,
          गीत अब किस ठौर ठहरे ?

चुप्पियों का 
एक जंगल है ,
लग रहा 
सब कुछ अमंगल है ,
          सुन न पड़ता कुछ ,
          आवाजें कहीं जाकर 
          गड़ गयी गहरे |
          गीत अब किस ठौर ठहरें ?

घुट रही है 
कण्ठ में वाणी ,
किन्तु फूटेगी 
किसी ज्वालामुखी - सी 
पीर कल्याणी ,
          तब न जन के रहेंगे 
          यों दर्द में डूबे हुए 
          ये जर्द औ ' ख़ामोश चेहरे |
          गीत अब किस ठौर ठहरे ?

अक्षरों पर बन्दिशें हैं 
शब्द पर पहरे |

         - श्रीकृष्ण शर्मा 
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5.11.19

'' पहरे खड़े खबीस ''

( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है )














'' पहरे खड़े खबीस ''

अपनी - तपनी ही अच्छी है ,
बोलो , किसकी बात करें ?

बाहर और कहाँ है धरती ,
जिस पर जाकर पाँव धरें ?
     भली लगे तो बात ना कोई ,
     बुरी लगे तो सब झगरें !!

मुँह देखी कहते तो गादी ,
काहे रहते परे घरें ?
     कह - सुन अपने दुख - सुख बाँटें ,
     राग - द्वेष मां क्यों पजरें ?

पहरे खड़े खबीस - सिरकटे ,
खून पियें औ ' मांस चरें !!
     हर पल यों मरने से बेहतर ,
     इन्हें मार दें , भले मरें !!

              - श्रीकृष्ण शर्मा
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3.11.19

'' स्वर उछाल कर कहें ''


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है )
















'' स्वर उछाल कर कहें ''

मौसम की असामान्य शर्तों से भौचक्के ,
कैसे हम वक्त के प्रवाह में बहें ?

रोज - रोज की वह ही बेमानी दिनचर्या ,
वही - वही जड़े हुए दृश्य और तस्वीरें ,
वही - वही है चुभन करौंदों के काँटों की ,
कमोबेश वही - वही नाजायज जंजीरें ,
          पथरीली भीड़ की निरन्तरता में चुकते ,
          कैसे हम संवादी स्वर उछाल कर कहें ?
          मौसम की असामान्य शर्तों से भौचक्के ,
          कैसे हम वक्त के प्रवाह  में बहें ?

उम्र बढ़ रही जैसे - जैसे इस पोथी की ,
कागज़ के पन्नों का जीवन कम हो रहा ,
कोयलों की अनसूझी औ ' गीली खानों में ,
जल - जल कर मेहनतकश जीवन तम ढो रहा ,
          सूर्यमुखी जीवित क्षण चौरस्ते दफना कर ,
          कैसे हम जश्न के मजाक को सहें ?
          मौसम की असामान्य शर्तों से भौचक्के ,
          कैसे हम वक्त के प्रवाह में बहें ?

                               - श्रीकृष्ण शर्मा
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2.11.19

'' प्यार '' ( 1 )


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है )




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1.11.19

'' लम्बे समय बाद बिटिया को देख कर ''

( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के काव्य - संग्रह - '' अक्षरों के सेतु '' से ली गई 1979 की रचना )
















'' लम्बे समय बाद बिटिया को देख कर ''

एक सहज सुख से आँखे भर आयीं ,
जब लम्बे अरसे बाद 
तू घर आयी |

देखकर तुझे ,
मन 
इतना तन्मय था 
इतना चुप था 
और इतना नम था 
जैसे - सैकड़ों निर्झरों का उद्गम था |

इतने दिनों बाद 
तुझे देखकर लगा , जैसे -
बन गया हो जेठ का आकाश 
अषाढ़ी बादलों का सपना 
अथवा 
आत्मजात दूर्वा से 
हो गयी हो काष्ठ - धरती 
एक जीवित अल्पना |

          - श्रीकृष्ण शर्मा  
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