6.11.19

'' अक्षरों पर बन्दिशें हैं ''


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है )













'' अक्षरों पर बन्दिशें हैं  ''

          अक्षरों पर बन्दिशें हैं ,
          शब्द पर पहरे ,
          गीत अब किस ठौर ठहरे ?

चुप्पियों का 
एक जंगल है ,
लग रहा 
सब कुछ अमंगल है ,
          सुन न पड़ता कुछ ,
          आवाजें कहीं जाकर 
          गड़ गयी गहरे |
          गीत अब किस ठौर ठहरें ?

घुट रही है 
कण्ठ में वाणी ,
किन्तु फूटेगी 
किसी ज्वालामुखी - सी 
पीर कल्याणी ,
          तब न जन के रहेंगे 
          यों दर्द में डूबे हुए 
          ये जर्द औ ' ख़ामोश चेहरे |
          गीत अब किस ठौर ठहरे ?

अक्षरों पर बन्दिशें हैं 
शब्द पर पहरे |

         - श्रीकृष्ण शर्मा 
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