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5.11.19

'' पहरे खड़े खबीस ''

( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है )














'' पहरे खड़े खबीस ''

अपनी - तपनी ही अच्छी है ,
बोलो , किसकी बात करें ?

बाहर और कहाँ है धरती ,
जिस पर जाकर पाँव धरें ?
     भली लगे तो बात ना कोई ,
     बुरी लगे तो सब झगरें !!

मुँह देखी कहते तो गादी ,
काहे रहते परे घरें ?
     कह - सुन अपने दुख - सुख बाँटें ,
     राग - द्वेष मां क्यों पजरें ?

पहरे खड़े खबीस - सिरकटे ,
खून पियें औ ' मांस चरें !!
     हर पल यों मरने से बेहतर ,
     इन्हें मार दें , भले मरें !!

              - श्रीकृष्ण शर्मा
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