29.3.20

तुलसी तुम्हें प्रणाम - ( भाग - 1 )


           ( कवि श्रीकृष्ण शर्मा की दोहा – सतसई - ‘ मेरी छोटी आँजुरी ’ से लिया गया है )





28.3.20

गुरु - महिमा


          ( कवि श्रीकृष्ण शर्मा की दोहा – सतसई - ‘ मेरी छोटी आँजुरी ’ से लिया गया है )




27.3.20

पवन शर्मा की लघुकथा - '' मज़बूरी ''



                        ( प्रस्तुत लघुकथा – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘’ हम जहाँ हैं ‘’ से ली गई है ) 


                           मज़बूरी 


वे दोनों बहुत देर से इस चट्टान पर बैठे थे | मौन ... दोनों में से कोई कुछ नहीं कह रहा था | साँझ ढल रही थी | ढलती धूप जरा हल्की हो गई थी | चट्टान के नाले में घास और वृक्ष के साये अपेक्षाकृत धुँधले होने लगे थे |
          ' यहाँ पर तुम्हें अच्छा लग रहा है ? '  बहुत देर बाद उसने पूछा |
          ' बहुत ... तुम्हारे न रहने पर मैं अपना अकेलापन यहीं गुजरता हूँ | '
          ' कब से ? ... मेरे जाने के पहले से या ... ? '
          उसके इस प्रश्न का उत्तर वह नहीं दे पाया | एक क्षण उसकी ओर घूरने के बाद कंकड़ उठा - उठाकर वह नाले में फेंकने लगा |
          चुब्ब ! - चुब्ब ! चुब्ब ! ...
          ' रज्जन ! ' उसने कहा |
          वह उसके पास सरक आई और उसके कंधे पर हाथ रख दिया,' कई दिन से मैं एक बात पूछना चाहती हूँ | ''
          वह बिल्कुल चुप था | बस , नाले में कंकड़ फेंकते रहा |
          चुब्ब ! चुब्ब ! चुब्ब ! ...
          ' डू यू लव मी ? '
          वह चौंक उठा , उसकी ओर देखा और बोला ,  ' कोई शक है ! '
          ' नहीं ... फिर तुम अपने घर ... मेरे घर पर अपन दोनों की शादी की चर्चा क्यों नहीं करते ? ... कब तक ऐसे ही रहेंगे ? '
          सूरज और भी ढल चुका था |
          ' जब तक मैं बेरोजगार रहूँगा ... तब तक तो नहीं ! '  वह नाले में ककड़ फेंकता रहा | 
          चुब्ब ! चुब्ब ! चुब्ब ! ...

                                                                **** 

                                  - पवन शर्मा 
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पता
श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट  विद्यालय ,
जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
फो. नं. - 9425837079 .
ईमेल – pawansharma7079@gmail.com




संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

25.3.20

कोरोना वाइरस को भगाना है - घर में रह कर क्या करें ?

आप से निवेदन करता हूँ कि हमें घर में रहकर ही कोरोना वाइरस का सामना करना है  |   इस लिए  घर  में रहकर ही हम    '' कवि श्रीकृष्ण शर्मा ''    नामक ब्लॉग से जुड़ें | आप इस ब्लॉग को घर में रहकर पढ़े और पढ़ाएँ -


ऐसा कब तक चलेगा



















( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक अक्षर और '' से लिया गया है )



ऐसा कब तक चलेगा 

ऐसा कब तक चलेगा ?
उफ़ ऐसा कब तक चलेगा ?

बुझती चिनगारी
औ '  कंदारते अक्स ,
कटी जड़ों वाले 
ये रिरियाते शख्स ,
          प्रश्न क्या उछालेंगे ?
          गर्दन झुका लेंगे |
जब कोई तनिक घुड़क देगा |

उफ़ ऐसा कब तक चलेगा ?

बदमिजाज मौसम ,
ये नामुराद दृश्य ,
दुर्घटना वाले पथ ,
अन्धे भविष्य ,
          सपने क्या पालेंगे ?
          चीखें - चिल्ला लेंगे |
जब कोई पहिया कुचलेगा |

उफ़ ऐसा कब तक चलेगा ?

                                 **
            - श्रीकृष्ण शर्मा 
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www.shrikrishnasharma.com

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24.3.20

आह्वान


पवन शर्मा की लघुकथा - '' लंगड़ा ''



                   ( प्रस्तुत लघुकथा – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘’ हम जहाँ हैं ‘’ से ली गई है ) 


                                     लंगड़ा

एकदम  सन्नाटा ... कहीं - कहीं कुत्तों के भौकने से सन्नाटा भंग हो जाता था | जहाँ - जहाँ बिजली के खम्भे थे , वहाँ - वहाँ प्रकाश फैला हुआ था , बाक़ी जगह अँधेरा था | सन्नाटे को भंग करती उसकी बैसाखियाँ और बैसाखियों पर झूलता वह आगे बढ़ रहा था |
          सामने बिजली के खम्भे  के प्रकाश में उसने देखा कोई खड़ा है | मन - ही - मन घबराने लगा | लेकिन बैसाखियों पर झूलता वह आगे बढ़ रहा था | नजदीक आकर देखा , उसी की उम्र का , मैले , कई जगह से फटे कपडे पहने , कोई लड़का है | मन थोडा शांत हो गया उसका |
          ' कहाँ से आ रहा है ? '  नजदीक आने पर लड़के ने उससे पूछा |
          ' स्टेशन से | '
          ' क्या कर रहा था वहाँ अभी तक ? '
          ' कैंटीन में कप - प्लेट धो रहा था | '  निश्चिंतभाव से उसने उत्तर दिया और आगे बढ़ने लगा | लड़का भी उसके बराबर हो लिया |
          ' कितना कमाया है ? '  लड़के ने चलते - चलते अँधेरे में ही पूछ लिया |
          ' सात रुपया ... सुबह से अभी तक के ... काम पूरा लिया | '  उसका चेहरा दयनीय हो उठा |
          ' तू झूठ बोल रहा है | सुबह से अभी तक के कम - से - कम दस का पत्ता होना था | '  सामने बिजली के खम्भे के बल्ब का प्रकाश उन दोनों के ऊपर आने लगा | पीछे उन दोनों की परछाइयाँ काफी बड़ी थीं |
          ' सच में ... सात दिए कैंटीन वाले ने | '  और सहजभाव से उसने हाफ पैंट की जेब में से एक - एक के मुड़े - तुड़े सात नोट दिखाए और बोला ,  ' अम्मा बीमार थी | इस वजह से ही मुझे काम करना पड़ा आज | '
          बिजली के खम्भे के निकट पहुँचकर लड़का बोला ,  ' दिखा ... गिनकर देखता हूँ ... साले काम तो करवाते हैं , लेकिन पैसा पूरा नहीं देते | '
          ' पूरे सात हैं | '  उसने कहा और रुपये लड़के को थमा दिए |
          लड़का रुपयों को गिनने लगा | एक ...और एक नोट उसको पकड़ा दिया | दो ... एक और नोट उसको पकड़ा दिया | तीन ... फिर एक और नोट उसको पकड़ा दिया | चार ... वह हाथ बढ़ा ही रहा था कि लड़का भाग खड़ा हुआ | वह चौंक गया |
          ' ऐ ... ऐ ... मेरे रूपये तो देता जा | '  बैसाखियों के सहारे वह आगे की ओर बढ़ा ... लेकिन लड़का अँधेरे में खो चुका था | विवशता से उसकी आँखों में आँसू आ गए ... फिर एकाएक गुस्से से उसके चेहरे पर तनाव आ गया ,  ' साला ... लंगड़ा ... साला ... दोनों पैर का लंगड़ा ... साला ... | '
                                                                                                **

                                    -पवन शर्मा 
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पवन शर्मा
कहानीकार , लघुकथाकार , कवि 

पता
श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट  विद्यालय ,
जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
फो. नं. - 9425837079 .
ईमेल – pawansharma7079@gmail.com

संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

          

23.3.20

साहित्य समाचार

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साहित्य विरासत

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पाठकों के पत्र

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लेख आकलन

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ब्लॉग में साहित्यकारों की रचनाएँ छपने हेतु -


विडम्बना





















( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक अक्षर और '' में, 1973 में रचित नवगीत )


विडम्बना 

हम छटपटाते रहे 
सुविधाओं के लिए 
किन्तु अभाव हम पर हँसते गये ,
हम कसमसाते रहे स्वतंत्रता के लिए 
किन्तु दबाब हमको कसते गये |

बदसूरत दुर्भाग्य की छाया में 
हमें असफल होना ही था ,
किन्तु अकर्मण्य सिद्ध हुए हम 
समस्याओं के सामने |

और 
समस्याएँ भी एक नहीं 
दो नहीं , एक के बाद एक 
एक के साथ अनेक 
- लम्बा सिलसिला -
इन्टरव्यू के बेमानी बदजायका प्रश्नों - जैसा ,
और 
हमारा धैर्य चुकता गया 
और हमारा माथा झुकता गया |

तभी 
वे आये 
और हमें देखकर 
हमारे चेहरे पर उभरे 
किसी अदृष्ट लेख को पढ़कर 
वे हँसते गये |

और हम 
अपनी ही असमर्थताओं की लज्जा में 
धँसते गये गहरे 
बहुत गहरे 
और 
हमारी यह गहराई ही 
उनकी नीव है ,
जिस पर उनके प्रासाद खड़े हैं ,
और हम आज भी धरती में गड़े हैं |

                                              **

            - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867


22.3.20

जिस पर हो प्रभु की कृपा - ( भाग - 7 )

        ( कवि श्रीकृष्ण शर्मा की दोहा – सतसई - ‘ मेरी छोटी आँजुरी ’ से लिया गया है )


21.3.20

पवन शर्मा की कहानी - '' प्रिय पाठकों , आपको कैसा लगा ? ''- ( भाग - 2 )



( प्रस्तुत कहानी – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘ ये शहर है , साहब ’ से ली गई है )



              प्रिय पाठकों , आपको कैसा लगा ?


भले ही वह सत्य कह रहा हो | सब - कुछ झूठ ही लगता है |

भाग - 1 से आगे -

          और ऐसी बातें तो शहरों में आम हैं | लोग ऐसे - ऐसे बहाने गढ़ते हैं ...  ऐसे घड़ियाली आसूँ बहाते हैं कि वे सामनेवाले की समस्त संवेदनाएँ अपनी ओर खीचने में सफल हो जाते हैं और उनकी जेब हल्की करके नौ - दो - ग्यारह हो जाते हैं |
          '' मुझ पर विश्वास कीजिए | मेरी सहायता कीजिए | मैं सिर्फ़ आपसे तीन सौ रुपए चाहता हूँ | घर पहुँच कर वापिस कर दूँगा| मैं वचन देता हूँ | ''  सुखदेव शास्त्री ने कहा | 
          उसकी बात सुनकर हम लोग चुप रहे | उसे यूँ ही तीन सौ रुपए देना हममें से किसी के बस की बात नहीं है |और फिर किसी अपरिचित को एक रुपए देने में भी हिचकिचाहट होती है | ये तो तीन सौ माँग रहा है !
          '' लंच टाइम ख़त्म हो रहा है साढ़े चार बजे के बाद मिलना | हम लोग सोचेंगे तुम्हारे लिए | ''  मैनें  उसे टालने वाले अन्दाज में कहा | तब तक वह चला ही जाएगा | हम लोगों के लिए तीन घन्टे थोड़े ही बैठा रहेगा |
          मैं , मिश्रा और खान ऑफिस की ओर बढ़ गए | ऑफिस में आकर मैं  अपने को आवश्यकता से अधिक उलझाये रखना चाहता था ,  ताकि सुखदेव शास्त्री का ध्यान मन में न आए , किन्तु बार - बार उसका पसीने और परेशानी से भरा चेहरा सामने आ जाता | चाहते हुए भी मैं उसके चेहरे को विस्मृत करने में अक्षम पाता | ऐसे समय में आदमी कितना लाचार और विवश हो जाता है ,  इस स्थिति का आभास मुझे सुखदेव शास्त्री से होता है | उसकी बातों पर सहज ही विश्वास नहीं होता,किन्तु कहीं से कभी - कभी मुझे ऐसा अवश्य लगने लगता है कि वह सत्य कह रहा है |
          चपरासी ने आकर कहा , '' साहब बुला रहे हैं | ''
          '' आता हूँ | ''  मैनें कहा |
          चपरासी चला गया | थोड़ी देर बाद मैं उठकर साहब के केबिन में घुस गया |


शाम को लगभग पाँच बजे मैं फिस से बाहर निकला | साइकिल उठाकर ऑफिस के गेट तक आया तो देखा कि सुखदेव शास्त्री गणेशी के होटल में बैठा हुआ है | मुझे देखते ही वह लपकता हुआ मेरे पास आ गया और बोला , '' आपके सभी मित्र चले गए | आप थोड़ी देर बाद निकले ऑफिस से | ''
          '' साहब ने बुला लिया था , सो देरी हो गई | ''  उसे उत्तर देते हुए मुझे झल्लाहट होने लगी | अभी तक बैठा हुआ है मेरे भरोसे , जैसे मैं उसका सगा हूँ और मैं रुपये निकालकर चट से उसकी हथेली पर रख दूँगा |
          मैं साइकिल के हैंडिल को पकड़कर पैदल ही सड़क पर चलने लगा | वह भी मेरे बराबर हो लिया |
          '' तुम अभी तक यहीं बैठे हुए थे ? '' मैने उससे पूछा |
          '' एक बार गया था बस स्टेण्ड तक ... ये सोचकर कि मेरी पत्नी औए बेटा ठीक - ठाक हैं या नहीं ... क्योंकि मेरा बेटा एक बार बिगड़ जाए तो संभलता नहीं है ... वैसे जल्दी बिगड़ता भी नहीं है मेरा बेटा ... ''  वह चलते - चलते बोला |
          उसकी पत्नी और उसका बेटा बस स्टेण्ड पर बैठे हैं , सुनकर मेरा मन फिर शंकित हो उठा | गणेशी के होटल में उसने बताया था कि रेलवे स्टेशन पर यह घटना घटी है , फिर बस स्टेण्ड पर इसकी पत्नी और इसका बेटा कैसे बैठे हैं ?
          मैंने सोचा की बस स्टेण्ड के सामने से ही रोज मुझे घर से ऑफिस और ऑफिस से घर के लिए जाना - आना पड़ता है | चलो देख लूँ कि उसकी पत्नी और उसका बेटा बस स्टेण्ड पर बैठे भी हैं या नहीं ?
          '' मुझे आपसे बहुत आशा है | ''  वह दयनीय स्वर में बोला | मेरे समक्ष असमंजस की स्थिति बन गई | न खाते बन रहा है न उगलते | यदि इसे तीन सौ रूपए देता हूँ तो सम्भव है कि वापिस ही न लौटें ओर नहीं देता हूँ तो मन पर बोझ बना रहेगा कि मुसीबत के मारे एक व्यक्ति की सहायता तक नहीं कर पाया |
          थोड़ी देर बाद बस स्टेण्ड आ गया | एक पान की दुकान के सामने अपनी साइकिल खड़ी कर ताला लगाया | पान की दुकानवाले ने आवाज लगाई, '' बाबूजी , पान तो खा लो | ''
          '' लौटकर खाऊंगा | ''  मैने कहा | इसी पान वाले के यहाँ मैं रोज ऑफिस जाते और घर लौटते पान खाता हूँ | इसीलिए उसने आवाज लगा ली |
          बस स्टेण्ड पर खासी भीड़ थी | कुछ बसें खड़ी हुई थीं , इधर - उधर जानें के लिए | माइक पर यात्रियों के लिए टिकिट लेकर बस में बैठने की तथा अन्य सूचनाएँ जोरों से प्रसारित हो रहीं थीं |
          सुखदेव शास्त्री मुझे एक बुक - स्टॉल के पास ले गया | वहीँ बाजू में फर्श पर उसकी पत्नी बैठी हुई थी | उसकी गोद में लगभग ढाई - तीन वर्ष का बच्चा सोया हुआ था | बच्चे के चेहरे पर रोने के बाद सूख गए आँसुओं की लकीर स्पष्टतः दीख रही थी |
          '' ये मेरी पत्नी और मेरा बेटा है | ''  सुखदेव शास्त्री ने परिचय कराया | उसकी पत्नी के दोनों हाथ आपस में जुड़ गए और एकाएक रुलाई फूट पड़ी | उसे रोता देख सुखदेव शास्त्री ने उसे ढाढस बंधाया ,  '' तुम रोती क्यों हो ? ... उपरवाला है ... वही हमें इस संकट से उबारेगा | '' फिर मेरी ओर देखता हुआ बोला , इसका मन बहुत कमजोर है | जरा - जरा - सी बात पर घबरा जाती है | ''
          '' ये रोते - रोते ही सो गया |बहुत जिद कर रहा था कुछ भी खाने की | कहाँ से खिलाती?''  सुखदेव शास्त्री की पत्नी ने हिचकियों के बीच बताया | 
          सुखदेव शास्त्री कुछ नहीं बोला | कुछ भी न कह पाने की असमर्थता उसके चेहरे पर दिखाई दे रही थी |
          अब मेरे लिए कहीं कोई शक नहीं रह गया | जो भी सुखदेव शास्त्री ने बताया , वह सत्य था | मैंने तुरन्त ही जेब से तीन सौ रुपए निकालकर उसे दे दिए  - ये सोचते हुए कि मैं उसके किसी पूर्वजन्म का कर्ज नहीं चुका पाया हूँ  !
          '' बहुत - बहुत धन्यवाद आपका | ''  रुपये लेते हुए कहते - कहते उसका गला भर आया |
          उसने जेब में रुपये रखे , फिर शर्ट की जेब में से पौकिट डायरी निकालकर मेरा पता लिख लिया |
          '' अच्छा शास्त्रीजी , मैं चलता हूँ | ''  मैनें कहा |
          वह कुछ नहीं बोल पाया |
          मैं घर लौट आया |


घटना को लगभग सात माह बीत गए | मुझे लगने लगा कि सुखदेव शास्त्री मुझे चूना लगा गया , किन्तु आज उसने तीन सौ की जगह पाँच सौ रुपए का चैक भेजा है ... अब तो मैं ही उसका ऋणी हो गया | ... मेरे पास तो उसका पता भी नहीं है ... मैं कैसे चुका पाउँगा उसका ऋण ? ... सोचते - सोचते मुझे अजीब - सा लगने लगा | ... प्रिय पाठकों , आपको कैसा लगा ? *

        - पवन शर्मा 
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पवन शर्मा
कहानीकार , लघुकथाकार , कवि 










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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

       
          

20.3.20

पवन शर्मा की कहानी - '' प्रिय पाठकों , आपको कैसा लगा ? - ( भाग - 1 )



( प्रस्तुत कहानी – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘ ये शहर है , साहब ’ से ली गई है )



           

                     प्रिय पाठकों , आपको कैसा लगा ?

दरवाजे पर टंगे ताले को देखकर मैं अन्दर दाखिल हो गया और कमरे की लाईट जलाकर बिस्तर पर पसर गया | थकान से शरीर का पोर - पोर  दर्द कर रहा था | ऐसा लग रहा था कि कई दिनों से बीमार हूँ |
          आज तीसरा दिन है - ऑडिट पार्टी जान खाये जा रही है | ऑडिट है कि पूरा होने का नाम नहीं ले रहा है | सुबह दस बजे से शाम छः और सात बजे तक फाइलों और अभिलेख पंजियों से जूझते रहना पड़ता है |  ' बड़े बाबू , ये दिखाओ '  ... ' बड़े बाबू , ये कैसे हुआ ? '  ' बड़े बाबू , इस एमाउन्ट के बिल - व्हाउचर कहाँ हैं ? '  ... ' क्या बात है बड़े बाबू , आज अभी तक चाय - नाश्ता नहीं आया ! '  ... ' बड़े बाबू आप भूल जाते हैं कि मैं विल्स पीता हूँ , कोई दूसरी सिगरेट नहीं ' ... कैसी मीठी - मीठी बातें करते हैं ऑडिटर , किन्तु मन में हमेशा यही चाह रहती है कि उनकी जेब कैसे गर्म हो , सो दिन भर कोई - न - कोई मीनमेख ढूढते रहते हैं | मैंने साहब को पहले ही कह दिया कि उनके मुँह से माँगने पर भी पैसे नहीं देने हैं | भले ही कितनी भी कंडिकाऍ वे तैयार कर लें | अपन सभी को विलोपित करने की कोशिश करेंगे |
          मुझे भूख नहीं है | शाम को पाँच बजे ही तो खाना खाया है अपने अधिकारी और ऑडिट पार्टी के साथ - होटल में | होटल का खाना भी कितना लजीज और जायकेदार होता है | जायका भी बरकरार है |
          जब थोड़ा  समय बीत गया, तब मुझे थकान कम होती महसूस हुई | मैं उठा और बाथरूम में जाकर हाथ - मुँह धोए |  तौलिया से हाथ - मुँह पौंछने के बाद चाय बनाई | चाय पीते -पीते मुझे बच्चों का ध्यान आया | वे अपनी माँ के साथ अपने नाना - नानी के यहाँ गए हैं | आज पूरे बारह दिन हो गए हैं | बच्चों के न रहने पर घर भाँय - भाँय लगता है |  अगले हफ्ते लिवाकर ले आऊँगा - सोचता हूँ मैं |
          आज की डाक में आए पत्रों पर अपनी नजर फेंकी | दो - तीन पत्रों के बीच एक खाकी रंग के लिफाफे पर मेरी नजरें स्थिर हो गई | लिफाफे को खोलकर देखा तो मैं आश्चर्य में पड़ गया | लिफाफे में रखे पाँच सो रुपये के चैक और पत्र ने तो मुझे और भी आश्चर्य में डाल दिया|मैं पत्र पढ़ने लगा ...
          आदरणीय भाई साहब ,
          आपने संकट के जिन क्षणों में अनजान की सहायता कर जो आत्मीयता दिखाई , उसके लिए मैं ह्रदय से आभारी हूँ और जीवन भर रहूँगा |
          पाँच सौ रुपये का चैक भेज रहा हूँ | कृपया स्वीकार कर लें | मुझे प्रसन्नता होगी |
                                                                               आपका
                                                                           सुखदेव शास्त्री 
                                                                                                                      पत्र पढ़ने के बाद मैंने पत्र के साथ रखे चैक को कई बार उलट - पलटकर देखा |
          सुखदेव शास्त्री वही है , जो उस दिन अनजानें में ही मुझे मिला था |उस दिन वह ...



कभी - कभी कुछ बातें अचानक हो जाती हैं | उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ था | लंच टाइम में रोज की तरह गणेशी के होटल में चाय पीने के लिए घुसे ही थे कि गणेशी की आवाज सुनाई दी  , '' अब बाबूजी लोग आ गए हैं , तुम उनके सामने अपना दुखड़ा सुनाओ ...शायद किसी का दिल पसीज जाए | ''
          गणेशी के स्वर में व्यंग का पुट था | हम लोग ख़ाली बेंच देखकर बैठ गए | गणेशी ने भट्टी पर चाय चढ़ा दी और इधर - उधर रखे चाय के ख़ाली गिलासों को समेटने लगा | लंच टाइम में गणेशी हमारे बिना बोले ही भट्टी पर चाय चढ़ा देता है |
          '' गणेशी , आज का पेपर दे और पानी पीला | '' गुप्ता ने कहा |
          '' लाया बाबूजी | ''  गणेशी ने कहा और चार - पाँच गिलासों में पानी ले आया , फिर अखबार समेटकर गुप्ता को पकड़ाकर भट्टी की ओर चला गया | गुप्ता अख़बार के पन्ने पलटने लगा |
          इसी लंच टाइम में , इसी होटल में सोमवार से शनिवार तक गणेशी के हाथ की बनी चाय सुड़कते हुए घर की , बाहर की , चुनाव की ,बजट की , महँगाई की , सचिन तेंदुलकर की बैटिंग की , शाहरुख़ खान और माधुरी दीक्षित की चर्चाएँ हम सभी करते और ठहाके लगाते | अकसर हमारे ग्रुप में मैं , दुबे , मिश्रा , गुप्ता और खान होते , जो रोज हि गानेशी के होटल में चाय पीते , पान खाते और जब लंच टाइम ख़त्म होता , तब हम लोग ऑफिस में अपनी - अपनी सीट पर होते |
          गणेशी चाय ले आया |हमें चाय देते हुए गणेशी धीरे से बोला,
  '' बाबूजी ई ससुर का नाती बारह बजे से हमारी जान खा रहा है | ''
          हम सभी की नजरों में एक प्रश्न उभर आया | गणेशी कुछ और कहता , तब तक हाथ की उँगलियों में सिगरेट दबाये एक व्यक्ति आकर खड़ा हो गया | मुश्किल से बत्तीस और पैतीस की उम्र होगी उसकी | चेहरे पर दाढ़ी बढ़ी हुई थी | बाल बिखरे हुए थे | ऐसा लग रहा था कि कई दिनों से नहाया नहीं है |
          '' मैं सुखदेव शास्त्री हूँ  |  आपके  शहर  और  आप  सभी  के लिए बिल्कुल अजनवी हूँ | ''  हम सभी को चुप देखकर बात करने की पहल उसी ने की |
          गुप्ता ने अख़बार पढ़ना बन्द कर एक तरफ रख दिया | हम उसे आश्चर्य से देखने लगे | हमारी समझ में ये नहीं आ रहा था कि वह अपना परिचय क्यों दे रहा है ?
          '' मैं बनारस का रहने वाला हूँ | वहीँ प्राइमरी स्कूल  में टीचर हूँ | मैं और मेरी पत्नी तथा मेरा बच्चा बनारस लौट रहे थे | '' उसने जेब से रूमाल निकाला और चेहरे का पसीना पोंछा , फिर सिगरेट का कश लेकर सिगरेट फेंक दी और हलक से ढेर सारा कसैला धुआँ उगल दिया | मैं , दुबे , मिश्रा , गुप्ता औए खान अपने - अपने हाथ में पकड़े चाय के गिलासों  में से चाय की चुस्कियां लेते जा रहे थे |
          '' आपके शहर में हम लोग मेल से सुबह उतरे थे | यहाँ से बनारस के लिए बस पकड़नी थी | बस की रवानगी का समय बहुत बाक़ी था , सो विचार आया कि स्टेशन पर ही फ्रेश हो लें , उसके बाद बस स्टेण्ड जाएँ | मैं फ्रेश होने चला गया | लौटकर आया तो मेरी पत्नी परेशान थी और रो रही थी | पूछने पर उसने बताया कि वह सामने वाले टी स्टाल पर बच्चे के लिए दूध लेने चली गई थी | मुश्किल से दस - बारह क़दम पर ही रहा होगा टी स्टॉल | इसी बीच कोई अटैची उठाकर ले गया | सामन के नाम पर हम लोग घर से एक ही अटैची लेकर निकले थे | ''  वह ऐसा कह रहा था , जैसे हमें कोई कहानी सुना रहा हो | थोड़ी देर चुप रहने के बाद उसने आगे कहा ,  '' मैं भी परेशान हो गया | कुछ देर तक तो यह समझ में नहीं आया कि क्या किया जाए ? ''
          गुप्ता ने घड़ी देखी | लंच ख़त्म होने में अभी समय था | हम लोगों ने अपनी - अपनी चाय खत्म कर गिलास मेज पर रख दिए | गणेशी आया और गिलास उठा कर ले गया |
          '' शास्त्री जी , आपकी बेगम बहुत लापरवाह हैं | बाहर निकले हैं तो अपने सामान की ओर खास ध्यान रखना चाहिए | ''  खान ने कहा |
          '' होनी है साहब ... उस बिचारी को क्या दोष दिया जाए | ''  उसने कहा |
          '' फिर ? ''  दुबे ने पूछा |
          '' मैंने रेलवे पुलिस में रिपोर्ट की | कुछ पता नहीं चला | मेरा पूरा पैसा अटैची में था ... लगभग सत्रह सौ रुपए ... सब - कुछ गया ... पहनने के कपड़े  भी ... सब उपरवाले की मर्जी है | जो लिखा है , वह तो भुगतना ही पड़ेगा | ''  कहने के बाद वह अपने हाथों की हथेलियाँ रगड़ने लगा |
          अब बात समझ में आने लगी | दुबे और गुप्ता मेरी ओर देखकर मुस्कराये , फिर वहाँ से उठकर ऑफिस की ओर बढ़ लिए | मैं समझ गया कि वे दोनों यहाँ से उठकर क्यों चले गए ? एक प्रकार से ठीक भी है कि वे दोनों यहाँ से चले गए | मुसीबत में फसे इस व्यक्ति की बातों पर एकाएक कैसे विश्वास कर लिया जाए ? मानव की प्रकृति ऐसी होती है कि अनजान और अपरिचित व्यक्ति की बातों पर सहजता से विश्वास नहीं होता | भले ही वह सत्य कह रहा हो | सब - कुछ झूठ ही लगता है |
                                                                         **

इससे आगे का अगले भाग में -

                                                                 - पवन शर्मा
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पवन शर्मा - कवि , कहानीकार , लघुकथाकार 

पता
श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट  विद्यालय ,
जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
फो. नं. - 9425837079 .
ईमेल – pawansharma7079@gmail.com

संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867




    

17.3.20

युद्ध हार कर खड़ा













( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक अक्षर और '' से लिया गया है )


युद्ध हार कर खड़ा 

रसा हुई  है अनरस ,
सचमुच 
धरती कितनी परवश ?

हवा हो गई हवा ,
गधे के सिर से जैसे - सींग ,
पेड़ खड़े निर्वाक ,
हाँकते बादल कोरी डींग ,
          किन्तु न सुन पड़ता 
          बूँदों का रसभीना कोरस ,
          युद्ध हार कर मौन खड़ा 
          जैसे उदास पोरस |
सचमुच 
धरती कितनी परवश ?

आँच दे रहा सूर्य 
लपट लिपटी भूमा बेनूर ,
हिया फट रहा , हुआ 
आँजुरी का अमृत काफूर ,
          फाँक रहा है सिर्फ़  ' सहारा '
          मत्स्य - विकल सारस ,
          पोरों से लग कर जैसे 
          गिर गया कहीं पारस 
सचमुच 
धरती कितनी परवश ?
                              **

            - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

15.3.20

जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला - सवाई माधोपुर में सायं कालीन प्रार्थना

जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा 


प्राचार्य - श्री हरीश कुमार खंडवाल 
उप प्राचार्य - श्री चोब सिंह 

जवाहर नवोदय विद्यालय  , जाट  बड़ोदा ( सवाई माधोपुर )  राजस्थान में सायं कालीन प्रार्थना सभा का एक वीडियो -




द्वारा - सुनील कुमार शर्मा ,
पी.जी.टी. ( इतिहास ),
जवाहर नवोदय विद्यालय ,
जाट बड़ोदा , जिला - सवाई माधोपुर ,
राजस्थान .


                                     

सच को कैसे पहचानें

















( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक अक्षर और '' से लिया गया है )


सच को कैसे पहचानें 

चेहरे - चेहरे - चेहरे - चेहरे 
          सच को कैसे पहचानें हम -
जो दफ्न हुआ उसमें गहरे ?
चेहरे - चेहरे - चेहरे - चेहरे ?

कहते भेड़िये न चीते हैं ,
जंगल में बात न डर वाली ,
पर राख , अधजली लकड़ी कुछ ,
टूटी चूड़ी , बोतल खाली ,
          लगता है जश्न मनाने को 
          कुछ आदमखोर यहाँ ठहरे |
कर दिये गये बेदखल लोग 
इन रियासतों - रजवाड़ों से ,
फिर भी बच पाया नहीं गाँव 
हथकंडों से , बटमारों के ,
          लगता कुछ देख न सुन सकते ,
          हैं यहाँ सभी अन्धे - बहरे |

सिरहीन कबन्धों वाले ही 
पहने हैं कवच सुरक्षा का ,
आकार और होगा भी क्या 
अन्धी औ '  छूँछी इच्छा का ?
          जन नहीं , न राष्ट्र , शेष कुर्सी ,
          कुर्सी पर पहरे ही पहरे |

चेहरे - चेहरे - चेहरे - चेहरे 
          सच को कैसे पहचानें हम -
जो दफ्न हुआ उसमें गहरे ?
चेहरे - चेहरे - चेहरे - चेहरे ?
                                    *

            - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

14.3.20

कल की तरह



















( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक अक्षर और '' से लिया गया है )


कल की तरह 

आज भी 
मन नहीं लगेगा 
कल की तरह |

आज भी 
आकाश नहीं है प्रकृतिस्थ ,
मटमैलापन नत्थी है 
धरती का 
उससे |

सिर पर सवार हवा 
साँस रोक कर
डाल रही है दबाव 
और 
सशंकित कौए
कर रहे हैं काँव काँव 

इस गाँव में 
उराँवों के नहीं हैं 
ओझा या बेगा ! फिर 
आधी रात के निचाट अँधेरे में 
जागेगा जब  ' ड्रेकुला '
ह्रदय के रक्त का प्यासा 
तुम्हारे बिना अकेले मुझसे 
वह कैसे सधेगा 
कल की तरह |

           -  श्रीकृष्ण शर्मा 
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www.shrikrishnasharma.com

 संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

13.3.20

पवन शर्मा की कहानी - '' यह सपना ही तो है '' - ( भाग - 2 )



( प्रस्तुत कहानी – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘ ये शहर है , साहब ’ से ली गई है )


                       यह सपना ही तो है

                   भाग ( 2 )

          सहसा आहट होती है | मैं चौंक उठता हूँ | नरेन के दद्दा आ रहे हैं | पास आ कर पौरी में बिछे तख़्त पर बैठ जाते हैं | मैं भी उठ कर बैठ जाता हूँ |
          '' नींद नई आई तुमै ? मैं  सोच रओ थो कि सो गए होगे , तेइके मारे थोड़ी देर बाद आओ मैं | '' वे कहते हैं , फिर पालथी मारकर बैठ जाते हैं |
          '' बहुत कोशिश की पर नहीं आई | ''   मैं कहता हूँ |
          '' काए के लाने ? ''
          '' मालूम नहीं | ''
          '' यहाँ पे तुमै अच्छो नई लग रओ होगो ,  तेइके मारे | ''   वे हँसे |
          '' नहीं - नहीं ... ऐसी बात नहीं है | ''
          '' तभी बिज्जू भी आ जाता है और दद्दा की बगल में बैठ जाता है | मैं देख रहा हूँ कि आज बिज्जू बहुत चुप है | कहता है, ''भैया क्यों नहीं आए ? ''
          मैं चुप रहा | उसने फिर मुँह बनाया |
          '' तुमै आवे में कोई परेशानी तो नई भई ? ''   वे पूछते हैं |
          '' नहीं...पहले भी तो आ चुका हूँ | परेशानी वाली कोई बात ही नहीं | '' मैनें झट से कहा |
          वे कुछ नहीं कहते | थोड़ी देर माहौल शान्त रहता है | रात गहरी होती जाती है | गाँव लगभग सो चुका है | आवारा कुत्ते इधर - उधर दौड़ते हुए भौंक रहे हैं |
          '' पानी पीओगे ? ''   मैनें कहा |
          '' हाँ प्यास तो लगी है |'' कहते हुए वे हँसे , फिर बिज्जू से बोले , '' जा रे , भैया के लाने पानी तो ले आ | ''
          बिज्जू पानी लेने भीतर चला जाता है | भीतर बर्तन धोने की आवाज आ रही थी | शायद नरेन की माँ खाने - पीने के बर्तन साफ़ कर रही थीं |
          '' तुम अकेले काए आए ? ... नरेन काए नई आओ ? ... वो भी आतो तो अच्छो रहतो | ''   वे कहते हैं ,  फिर बीड़ी सुलगा लेते हैं |
          मैं बैठा रहा - चुप | जड़ !
          '' वो तो ठीक - ठाक होगो न ? ''   उन्होंने पूछा |
          मैं बैठा रहा - चुप | जड़ !
          '' आओ काए के लाने नई ? पहले तो हर माह एकाध चक्कर लगा ही जातो थो | ''   वे बुदबुदाते हैं | मैं सुन लेता हूँ | भीतर कुछ दरकने लगता है | मन कमजोर होने लगता है |
          तभी बिज्जू एक गिलास में पानी लेकर आ जाता है |मैं पानी पीता हूँ और गिलास नीचे रख देता हूँ |बिज्जू फिर से दद्दा की बगल में बैठ जाता है |
          '' तुमने वा की राजी - ख़ुशी की बात नई बताई अभी तक | '' उन्होंने कहा |
          मैं बैठा रहा - चुप | जड़ !
          '' अबकी बार भैया को आने दो | बात नहीं करूँगा | कह दुँगा - इत्ते - इत्ते दिन बाद आते हो ! ''   बिज्जू कहता है , रूठा हुआ - सा | बारह - तेरह वर्ष का बच्चा ही तो है ... हे भगवान !
          '' जे आखिरी साल है बा को ... फिर नौकरी लग जावेगी ... कहीं अफसर बन जावेगो वो ... जे ही इच्छा है हमरी | ''   वे कहते हैं , जैसे कोई सपना देख रहे हों |
          मैं बैठा रहा - चुप | जड़ ! 
          '' जे साल वो चुनाव लड़नवालो थो कॉलेज को | का भओ ? '' वे पूछते हैं |
          '' अं ... हाँ ... हाँ ... ''   मैं जैसे किसी सपने से जागता हूँ |
          सहसा  मेरी आँखों में कुछ दृश्य तैर उठते हैं ...
          नरेन चुनाव जीत गया है ... नरेन के गले में फूलों की माला ... रंग ... गुलाल फिजाँ में उड़ रहा है ... रंग ... बिरंगा गुलाल ... हरा ... पीला ... गुलाबी ... ख़ुशी ... उल्लास ... फिर ... तनाव ... आक्रोश ... अश्रुगैस ... लाठी - चार्ज ... नरेन कराहकर गिरता है ... सिर खून से लथपथ ... दम तोड़ता नरेन ... विरोधी पार्टी की चाल कामयाब !...
          '' अच्छा रात भौत हो गई है , सो जाओ | '' वे कह रहे हैं | मैं जैसे फिर किसी सपने से जागता हूँ | वे चले जाते हैं ... बिज्जू पहले ही जा चुका है | 
          रात और भी गहरी हो जाती है | नींद आँखों से कोसों दूर है | बस , अन्तिम निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ मैं | ये विरोधी पार्टी की चाल नहीं , बल्कि प्रिन्सिपल और प्रोफेसरों की चाल थी | उन्हें डर था कि चुनाव जीतने के बाद नरेन कॉलेज मैनेजमेंट की पोल न खोल दे , जिन पर कि नरेन बड़ी आसानी से पहुँच गया था | कितने बड़ा षड्यंत्र ... उफ़ !
          मैं यहाँ क्यों आया हूँ ? क्या यही बताने के लिए कि नरेन अब नहीं रहा ! मैं सोच नहीं पाता कि आख़िर सत्य कैसे बता पाऊँगा नरेन के दद्दा को ! क्या वे सहन कर पायेंगे ? ... और बिज्जू ... !*

                                 - पवन शर्मा 
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पवन शर्मा - कहानीकार , लघुकथाकार , कवि 
 पता
श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट  विद्यालय ,
जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
फो. नं. - 9425837079 .
ईमेल – pawansharma7079@gmail.com

संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867
       
         
     
           
          

12.3.20

पवन शर्मा की कहानी - '' यह सपना ही तो है '' - ( भाग - 1 )

( प्रस्तुत कहानी – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘ ये शहर है , साहब ’ से ली गई है )



                           यह सपना ही तो है

खाना खाकर मैं पौरी में बिछी चारपाई पर आ कर लेट गया | भीतर नरेन के दद्दा खाना खाने की वजह से रुक गए थे |नरेन का छोटा भाई बिज्जू भी | नहीं तो मेरे आने के बाद दोनों ने एक पल के लिए भी मुझे अकेला नहीं छोड़ा | खूब बतियाते रहे थे - घर की , बाहर की , नरेन की | लेटे - लेटे मैं सोचता हूँ - मैं पहले भी आ चुका हूँ यहाँ , नरेन के साथ | तब अचानक आना हुआ था मेरा | शहर के दमघोटूं वातावरण से उबरकर मैं गाँव के शुद्ध और स्वच्छ वातावरण में कुछ दिन के लिए आया था | उस समय नरेन के घरवालों ने मन जीत लिया था मेरा | ऊपर से बिज्जू की बातें ... खूब घूमा - फिरा था गाँव में ... अमराई , खेत , पोखर , नहर सभी जगह | एक हफ्ता कैसे बीत गया था , पता ही नहीं चला था | जब लौटा था , तब गाँव की अनेक यादें थी मेरे साथ |
          हो जाता है ... सब - कुछ ... अपने आप ही ... कुछ सोचो ... होता कुछ है ... मैं यादों को जितना भुलाने की कोशिश कर रहा हूँ , उतना ही पीछा कर रही हैं |
          मुझे हॉस्टल के वो दिन याद आ रहे हैं , जब मैं और नरेन हॉस्टल की  छत पर सर्दियों की सुबह में कुनमुनाती धूप का आनन्द उठाते हुए पढ़ा करते थे | गप्पें होती थीं , बहस हुआ करती थीं , धींगामुश्ती और मटरगश्ती भी | स्कॉलर होल्डर नरेन के साथ एक बात जुडी थी कि वह जल्दी ही भड़क जाता था | गर्म और तेज - मिजाजी नरेन याद आता है उस घटना से , जब बी.एस - सी. फ़ाइनल में एडमीशन फ़ीस में से क्लर्क ने दो रुपये वापिस करने में आनाकानी की थी , तब उसने लड़ - झगड़कर अपने दो रूपये वापिस लिए थे |
          एम.एस - सी. फाइनल में कॉलेज के वो शुरू के दिन थे | गर्ल्स हॉस्टल में रहकर पढ़ रही छात्रा वेणी मुखर्जी ने आत्महत्या कर ली | आत्महत्या करने के कारण का पता नहीं चला | बात आई - गई हो गई | किन्तु ,एक दिन सौमित्र दौड़ता हुआ आया और नरेन के कान में फुसफुसाकर बोला , '' गुरु , कुछ मालूम चला ? ''
          '' यही ... यही कि ...'' सौमित्र के मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी | मैं भी उन लोगों के नजदीक आ गया |
          '' क्या बात है ... " ? बताता क्यों नहीं ? ''  नरेन धीमी आवाज में चीख़ - सा पड़ा |
          '' यही कि वेणी मुखर्जी ने सुसाइट नहीं की | उसका मर्डर किया गया है गुरु | ''
          '' मर्डर ! '' नरेन के मुँह से अस्फुट स्वर निकला , '' किसने किया ? ''
          '' एम.एल.ए. के सपूत ने | ''
          '' प्रकाश ने ? ''
          '' हाँ गुरु ... सबूत भी मिल चुके हैं वेणी मुखर्जी के रूम से ... रेप करने के बाद उसने सबूत मिटाने की भरपूर कोशिश की ... प्रिन्सिपल के कहने पर पुलिस केस को दबा रही है |'' कहते - कहते औमित्र हाँफने लगा |
          मैं और सौमित्र देख रहे थे कि नरेन का चेहरा बनने - बिगड़ने लगा | सहसा वह चीख़ पड़ा ,  '' आज के बाद पन्द्रह दिन तक कोई क्लास नहीं लगेगी ... खासकर साइन्स फेकल्टी तो नहीं ... जाकर कह दो साइन्स फेकल्टी वालों से ... ''
          '' गुरु ... ''  सौमित्र उसे रोकना चाह रहा था , पर वह किसी छूटे हुए तीर की तरह वहाँ से जा चुका था |
          फिर ...
          एक हफ्ते तक सांइस फेकल्टी ने अपनी - अपनी कक्षाओं का बहिष्कार किया था | साइंस फेकल्टी का साथ देने के लिए आर्ट्स और कॉमर्स फेकल्टी वाले भी अपनी - अपनी कक्षाओं का बहिष्कार करने लगे -
          ' एम.एल.ए. के सपूत को कॉलेज से बर्खास्त करो | '
          ' प्रकाश को अरेस्ट करो | '
          ' वेणी मुखर्जी के साथ हुए अन्याय को न्याय दिलाया जाए | ' ऐसे ही बैनर कॉलेज की हर दीवार पर चिपके हुए थे |
          उस दिन उसे प्रिन्सिपल ने अपने चैम्बर में बुलाया था | मैं बाहर ही खड़ा था | पन्द्रह - बीस मिनट बाद जब वह चैम्बर से बाहर निकला , तब एक अपमान उसके चेहरे पर मैंने स्पष्ट रूप से देखा था | वह मुझे साथ लिए हॉस्टल के कमरे में कैद हो गया |
          '' साला बुड्डा कहता है - ये कॉलेज बड़े और धनी लोगों के बल पर और उनके डोनेशन पर चल रहा है | एम.एल.ए. भी उन्हीं में से एक प्रतिष्ठित मेम्बर है ! किसी भी प्राइवेट कॉलेज में इनकी दखल मायने रखती है ... तो क्या उसका लड़का किसी के साथ भी ! ... उसकी बेटी के साथ ये सब होता तब ... कहता है  - ये हंगामा शांत करवा दो , नहीं तो टर्मिनेट कर दूँगा ... करके तो देखे | ''  मैं देख रहा था कि वह न जाने क्या - क्या बडबडा रहा था ... अस्फुट स्वर निकल रहे थे उसके मुँह से |
          फिर दो दिन नहीं बीते कि नरेन ने एक और हँगामा खड़ा कर दिया | प्रिन्सिपल के चैम्बर के बाहर खड़ा नरेन प्रिन्सिपल से न जाने किस - किस फण्ड का हिसाब माँग रहा था | मेरी समझ में नहीं आया था उस समय | बहुत देर तक बहस चलती रही थी | बीच - बीच में प्रिन्सिपल के चेहरे पर उभरी परेशानी स्पष्ट रूप से मैने देखी  थी | बाद में पता चला कि बहुत से ऐसे फण्ड हैं , जिनमे से काफी राशि प्रिन्सिपल हजम कर चुका है | दूसरों को इसकी भनक तक नहीं है | मैं सोचता हूँ कि नरेन को कहाँ से और कैसे पता चला ?
          सोचता हूँ तो सोचता ही रह जाता हूँ |
          उस दिन नरेन ने कॉलेज के छात्र संघ के चुनाव में अध्यक्ष पद  के लिए फॉर्म भरा था | मैनें देखा था - कुछ प्रतिष्ठित प्रोफ़ेसर उसको फॉर्म भरने से मना कर रहे थे , लेकिन उन सब की इच्छा के विरुद्ध उसने फॉर्म भरा था | फॉर्म जमा करते समय प्रिन्सिपल और प्रोफ़ेसर के बीच परेशानी और बेचैनी मैनें उनके चेहरों पर स्पष्टतः देखी थी , फिर ...
          फिर ...
          सहसा आहट होती है | मैं चौंक उठता हूँ | ...

  इसके आगे का अगले भाग में -   
                                  - पवन शर्मा 
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पवन शर्मा - कवि , कहानीकार , लघुकथाकार 

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ईमेल – pawansharma7079@gmail.com



संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867