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21.3.20

पवन शर्मा की कहानी - '' प्रिय पाठकों , आपको कैसा लगा ? ''- ( भाग - 2 )



( प्रस्तुत कहानी – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘ ये शहर है , साहब ’ से ली गई है )



              प्रिय पाठकों , आपको कैसा लगा ?


भले ही वह सत्य कह रहा हो | सब - कुछ झूठ ही लगता है |

भाग - 1 से आगे -

          और ऐसी बातें तो शहरों में आम हैं | लोग ऐसे - ऐसे बहाने गढ़ते हैं ...  ऐसे घड़ियाली आसूँ बहाते हैं कि वे सामनेवाले की समस्त संवेदनाएँ अपनी ओर खीचने में सफल हो जाते हैं और उनकी जेब हल्की करके नौ - दो - ग्यारह हो जाते हैं |
          '' मुझ पर विश्वास कीजिए | मेरी सहायता कीजिए | मैं सिर्फ़ आपसे तीन सौ रुपए चाहता हूँ | घर पहुँच कर वापिस कर दूँगा| मैं वचन देता हूँ | ''  सुखदेव शास्त्री ने कहा | 
          उसकी बात सुनकर हम लोग चुप रहे | उसे यूँ ही तीन सौ रुपए देना हममें से किसी के बस की बात नहीं है |और फिर किसी अपरिचित को एक रुपए देने में भी हिचकिचाहट होती है | ये तो तीन सौ माँग रहा है !
          '' लंच टाइम ख़त्म हो रहा है साढ़े चार बजे के बाद मिलना | हम लोग सोचेंगे तुम्हारे लिए | ''  मैनें  उसे टालने वाले अन्दाज में कहा | तब तक वह चला ही जाएगा | हम लोगों के लिए तीन घन्टे थोड़े ही बैठा रहेगा |
          मैं , मिश्रा और खान ऑफिस की ओर बढ़ गए | ऑफिस में आकर मैं  अपने को आवश्यकता से अधिक उलझाये रखना चाहता था ,  ताकि सुखदेव शास्त्री का ध्यान मन में न आए , किन्तु बार - बार उसका पसीने और परेशानी से भरा चेहरा सामने आ जाता | चाहते हुए भी मैं उसके चेहरे को विस्मृत करने में अक्षम पाता | ऐसे समय में आदमी कितना लाचार और विवश हो जाता है ,  इस स्थिति का आभास मुझे सुखदेव शास्त्री से होता है | उसकी बातों पर सहज ही विश्वास नहीं होता,किन्तु कहीं से कभी - कभी मुझे ऐसा अवश्य लगने लगता है कि वह सत्य कह रहा है |
          चपरासी ने आकर कहा , '' साहब बुला रहे हैं | ''
          '' आता हूँ | ''  मैनें कहा |
          चपरासी चला गया | थोड़ी देर बाद मैं उठकर साहब के केबिन में घुस गया |


शाम को लगभग पाँच बजे मैं फिस से बाहर निकला | साइकिल उठाकर ऑफिस के गेट तक आया तो देखा कि सुखदेव शास्त्री गणेशी के होटल में बैठा हुआ है | मुझे देखते ही वह लपकता हुआ मेरे पास आ गया और बोला , '' आपके सभी मित्र चले गए | आप थोड़ी देर बाद निकले ऑफिस से | ''
          '' साहब ने बुला लिया था , सो देरी हो गई | ''  उसे उत्तर देते हुए मुझे झल्लाहट होने लगी | अभी तक बैठा हुआ है मेरे भरोसे , जैसे मैं उसका सगा हूँ और मैं रुपये निकालकर चट से उसकी हथेली पर रख दूँगा |
          मैं साइकिल के हैंडिल को पकड़कर पैदल ही सड़क पर चलने लगा | वह भी मेरे बराबर हो लिया |
          '' तुम अभी तक यहीं बैठे हुए थे ? '' मैने उससे पूछा |
          '' एक बार गया था बस स्टेण्ड तक ... ये सोचकर कि मेरी पत्नी औए बेटा ठीक - ठाक हैं या नहीं ... क्योंकि मेरा बेटा एक बार बिगड़ जाए तो संभलता नहीं है ... वैसे जल्दी बिगड़ता भी नहीं है मेरा बेटा ... ''  वह चलते - चलते बोला |
          उसकी पत्नी और उसका बेटा बस स्टेण्ड पर बैठे हैं , सुनकर मेरा मन फिर शंकित हो उठा | गणेशी के होटल में उसने बताया था कि रेलवे स्टेशन पर यह घटना घटी है , फिर बस स्टेण्ड पर इसकी पत्नी और इसका बेटा कैसे बैठे हैं ?
          मैंने सोचा की बस स्टेण्ड के सामने से ही रोज मुझे घर से ऑफिस और ऑफिस से घर के लिए जाना - आना पड़ता है | चलो देख लूँ कि उसकी पत्नी और उसका बेटा बस स्टेण्ड पर बैठे भी हैं या नहीं ?
          '' मुझे आपसे बहुत आशा है | ''  वह दयनीय स्वर में बोला | मेरे समक्ष असमंजस की स्थिति बन गई | न खाते बन रहा है न उगलते | यदि इसे तीन सौ रूपए देता हूँ तो सम्भव है कि वापिस ही न लौटें ओर नहीं देता हूँ तो मन पर बोझ बना रहेगा कि मुसीबत के मारे एक व्यक्ति की सहायता तक नहीं कर पाया |
          थोड़ी देर बाद बस स्टेण्ड आ गया | एक पान की दुकान के सामने अपनी साइकिल खड़ी कर ताला लगाया | पान की दुकानवाले ने आवाज लगाई, '' बाबूजी , पान तो खा लो | ''
          '' लौटकर खाऊंगा | ''  मैने कहा | इसी पान वाले के यहाँ मैं रोज ऑफिस जाते और घर लौटते पान खाता हूँ | इसीलिए उसने आवाज लगा ली |
          बस स्टेण्ड पर खासी भीड़ थी | कुछ बसें खड़ी हुई थीं , इधर - उधर जानें के लिए | माइक पर यात्रियों के लिए टिकिट लेकर बस में बैठने की तथा अन्य सूचनाएँ जोरों से प्रसारित हो रहीं थीं |
          सुखदेव शास्त्री मुझे एक बुक - स्टॉल के पास ले गया | वहीँ बाजू में फर्श पर उसकी पत्नी बैठी हुई थी | उसकी गोद में लगभग ढाई - तीन वर्ष का बच्चा सोया हुआ था | बच्चे के चेहरे पर रोने के बाद सूख गए आँसुओं की लकीर स्पष्टतः दीख रही थी |
          '' ये मेरी पत्नी और मेरा बेटा है | ''  सुखदेव शास्त्री ने परिचय कराया | उसकी पत्नी के दोनों हाथ आपस में जुड़ गए और एकाएक रुलाई फूट पड़ी | उसे रोता देख सुखदेव शास्त्री ने उसे ढाढस बंधाया ,  '' तुम रोती क्यों हो ? ... उपरवाला है ... वही हमें इस संकट से उबारेगा | '' फिर मेरी ओर देखता हुआ बोला , इसका मन बहुत कमजोर है | जरा - जरा - सी बात पर घबरा जाती है | ''
          '' ये रोते - रोते ही सो गया |बहुत जिद कर रहा था कुछ भी खाने की | कहाँ से खिलाती?''  सुखदेव शास्त्री की पत्नी ने हिचकियों के बीच बताया | 
          सुखदेव शास्त्री कुछ नहीं बोला | कुछ भी न कह पाने की असमर्थता उसके चेहरे पर दिखाई दे रही थी |
          अब मेरे लिए कहीं कोई शक नहीं रह गया | जो भी सुखदेव शास्त्री ने बताया , वह सत्य था | मैंने तुरन्त ही जेब से तीन सौ रुपए निकालकर उसे दे दिए  - ये सोचते हुए कि मैं उसके किसी पूर्वजन्म का कर्ज नहीं चुका पाया हूँ  !
          '' बहुत - बहुत धन्यवाद आपका | ''  रुपये लेते हुए कहते - कहते उसका गला भर आया |
          उसने जेब में रुपये रखे , फिर शर्ट की जेब में से पौकिट डायरी निकालकर मेरा पता लिख लिया |
          '' अच्छा शास्त्रीजी , मैं चलता हूँ | ''  मैनें कहा |
          वह कुछ नहीं बोल पाया |
          मैं घर लौट आया |


घटना को लगभग सात माह बीत गए | मुझे लगने लगा कि सुखदेव शास्त्री मुझे चूना लगा गया , किन्तु आज उसने तीन सौ की जगह पाँच सौ रुपए का चैक भेजा है ... अब तो मैं ही उसका ऋणी हो गया | ... मेरे पास तो उसका पता भी नहीं है ... मैं कैसे चुका पाउँगा उसका ऋण ? ... सोचते - सोचते मुझे अजीब - सा लगने लगा | ... प्रिय पाठकों , आपको कैसा लगा ? *

        - पवन शर्मा 
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पवन शर्मा
कहानीकार , लघुकथाकार , कवि 










पता
श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट  विद्यालय ,
जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
फो. नं. - 9425837079 .
ईमेल – pawansharma7079@gmail.com


संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

       
          

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