20.3.20

पवन शर्मा की कहानी - '' प्रिय पाठकों , आपको कैसा लगा ? - ( भाग - 1 )



( प्रस्तुत कहानी – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘ ये शहर है , साहब ’ से ली गई है )



           

                     प्रिय पाठकों , आपको कैसा लगा ?

दरवाजे पर टंगे ताले को देखकर मैं अन्दर दाखिल हो गया और कमरे की लाईट जलाकर बिस्तर पर पसर गया | थकान से शरीर का पोर - पोर  दर्द कर रहा था | ऐसा लग रहा था कि कई दिनों से बीमार हूँ |
          आज तीसरा दिन है - ऑडिट पार्टी जान खाये जा रही है | ऑडिट है कि पूरा होने का नाम नहीं ले रहा है | सुबह दस बजे से शाम छः और सात बजे तक फाइलों और अभिलेख पंजियों से जूझते रहना पड़ता है |  ' बड़े बाबू , ये दिखाओ '  ... ' बड़े बाबू , ये कैसे हुआ ? '  ' बड़े बाबू , इस एमाउन्ट के बिल - व्हाउचर कहाँ हैं ? '  ... ' क्या बात है बड़े बाबू , आज अभी तक चाय - नाश्ता नहीं आया ! '  ... ' बड़े बाबू आप भूल जाते हैं कि मैं विल्स पीता हूँ , कोई दूसरी सिगरेट नहीं ' ... कैसी मीठी - मीठी बातें करते हैं ऑडिटर , किन्तु मन में हमेशा यही चाह रहती है कि उनकी जेब कैसे गर्म हो , सो दिन भर कोई - न - कोई मीनमेख ढूढते रहते हैं | मैंने साहब को पहले ही कह दिया कि उनके मुँह से माँगने पर भी पैसे नहीं देने हैं | भले ही कितनी भी कंडिकाऍ वे तैयार कर लें | अपन सभी को विलोपित करने की कोशिश करेंगे |
          मुझे भूख नहीं है | शाम को पाँच बजे ही तो खाना खाया है अपने अधिकारी और ऑडिट पार्टी के साथ - होटल में | होटल का खाना भी कितना लजीज और जायकेदार होता है | जायका भी बरकरार है |
          जब थोड़ा  समय बीत गया, तब मुझे थकान कम होती महसूस हुई | मैं उठा और बाथरूम में जाकर हाथ - मुँह धोए |  तौलिया से हाथ - मुँह पौंछने के बाद चाय बनाई | चाय पीते -पीते मुझे बच्चों का ध्यान आया | वे अपनी माँ के साथ अपने नाना - नानी के यहाँ गए हैं | आज पूरे बारह दिन हो गए हैं | बच्चों के न रहने पर घर भाँय - भाँय लगता है |  अगले हफ्ते लिवाकर ले आऊँगा - सोचता हूँ मैं |
          आज की डाक में आए पत्रों पर अपनी नजर फेंकी | दो - तीन पत्रों के बीच एक खाकी रंग के लिफाफे पर मेरी नजरें स्थिर हो गई | लिफाफे को खोलकर देखा तो मैं आश्चर्य में पड़ गया | लिफाफे में रखे पाँच सो रुपये के चैक और पत्र ने तो मुझे और भी आश्चर्य में डाल दिया|मैं पत्र पढ़ने लगा ...
          आदरणीय भाई साहब ,
          आपने संकट के जिन क्षणों में अनजान की सहायता कर जो आत्मीयता दिखाई , उसके लिए मैं ह्रदय से आभारी हूँ और जीवन भर रहूँगा |
          पाँच सौ रुपये का चैक भेज रहा हूँ | कृपया स्वीकार कर लें | मुझे प्रसन्नता होगी |
                                                                               आपका
                                                                           सुखदेव शास्त्री 
                                                                                                                      पत्र पढ़ने के बाद मैंने पत्र के साथ रखे चैक को कई बार उलट - पलटकर देखा |
          सुखदेव शास्त्री वही है , जो उस दिन अनजानें में ही मुझे मिला था |उस दिन वह ...



कभी - कभी कुछ बातें अचानक हो जाती हैं | उस दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ था | लंच टाइम में रोज की तरह गणेशी के होटल में चाय पीने के लिए घुसे ही थे कि गणेशी की आवाज सुनाई दी  , '' अब बाबूजी लोग आ गए हैं , तुम उनके सामने अपना दुखड़ा सुनाओ ...शायद किसी का दिल पसीज जाए | ''
          गणेशी के स्वर में व्यंग का पुट था | हम लोग ख़ाली बेंच देखकर बैठ गए | गणेशी ने भट्टी पर चाय चढ़ा दी और इधर - उधर रखे चाय के ख़ाली गिलासों को समेटने लगा | लंच टाइम में गणेशी हमारे बिना बोले ही भट्टी पर चाय चढ़ा देता है |
          '' गणेशी , आज का पेपर दे और पानी पीला | '' गुप्ता ने कहा |
          '' लाया बाबूजी | ''  गणेशी ने कहा और चार - पाँच गिलासों में पानी ले आया , फिर अखबार समेटकर गुप्ता को पकड़ाकर भट्टी की ओर चला गया | गुप्ता अख़बार के पन्ने पलटने लगा |
          इसी लंच टाइम में , इसी होटल में सोमवार से शनिवार तक गणेशी के हाथ की बनी चाय सुड़कते हुए घर की , बाहर की , चुनाव की ,बजट की , महँगाई की , सचिन तेंदुलकर की बैटिंग की , शाहरुख़ खान और माधुरी दीक्षित की चर्चाएँ हम सभी करते और ठहाके लगाते | अकसर हमारे ग्रुप में मैं , दुबे , मिश्रा , गुप्ता और खान होते , जो रोज हि गानेशी के होटल में चाय पीते , पान खाते और जब लंच टाइम ख़त्म होता , तब हम लोग ऑफिस में अपनी - अपनी सीट पर होते |
          गणेशी चाय ले आया |हमें चाय देते हुए गणेशी धीरे से बोला,
  '' बाबूजी ई ससुर का नाती बारह बजे से हमारी जान खा रहा है | ''
          हम सभी की नजरों में एक प्रश्न उभर आया | गणेशी कुछ और कहता , तब तक हाथ की उँगलियों में सिगरेट दबाये एक व्यक्ति आकर खड़ा हो गया | मुश्किल से बत्तीस और पैतीस की उम्र होगी उसकी | चेहरे पर दाढ़ी बढ़ी हुई थी | बाल बिखरे हुए थे | ऐसा लग रहा था कि कई दिनों से नहाया नहीं है |
          '' मैं सुखदेव शास्त्री हूँ  |  आपके  शहर  और  आप  सभी  के लिए बिल्कुल अजनवी हूँ | ''  हम सभी को चुप देखकर बात करने की पहल उसी ने की |
          गुप्ता ने अख़बार पढ़ना बन्द कर एक तरफ रख दिया | हम उसे आश्चर्य से देखने लगे | हमारी समझ में ये नहीं आ रहा था कि वह अपना परिचय क्यों दे रहा है ?
          '' मैं बनारस का रहने वाला हूँ | वहीँ प्राइमरी स्कूल  में टीचर हूँ | मैं और मेरी पत्नी तथा मेरा बच्चा बनारस लौट रहे थे | '' उसने जेब से रूमाल निकाला और चेहरे का पसीना पोंछा , फिर सिगरेट का कश लेकर सिगरेट फेंक दी और हलक से ढेर सारा कसैला धुआँ उगल दिया | मैं , दुबे , मिश्रा , गुप्ता औए खान अपने - अपने हाथ में पकड़े चाय के गिलासों  में से चाय की चुस्कियां लेते जा रहे थे |
          '' आपके शहर में हम लोग मेल से सुबह उतरे थे | यहाँ से बनारस के लिए बस पकड़नी थी | बस की रवानगी का समय बहुत बाक़ी था , सो विचार आया कि स्टेशन पर ही फ्रेश हो लें , उसके बाद बस स्टेण्ड जाएँ | मैं फ्रेश होने चला गया | लौटकर आया तो मेरी पत्नी परेशान थी और रो रही थी | पूछने पर उसने बताया कि वह सामने वाले टी स्टाल पर बच्चे के लिए दूध लेने चली गई थी | मुश्किल से दस - बारह क़दम पर ही रहा होगा टी स्टॉल | इसी बीच कोई अटैची उठाकर ले गया | सामन के नाम पर हम लोग घर से एक ही अटैची लेकर निकले थे | ''  वह ऐसा कह रहा था , जैसे हमें कोई कहानी सुना रहा हो | थोड़ी देर चुप रहने के बाद उसने आगे कहा ,  '' मैं भी परेशान हो गया | कुछ देर तक तो यह समझ में नहीं आया कि क्या किया जाए ? ''
          गुप्ता ने घड़ी देखी | लंच ख़त्म होने में अभी समय था | हम लोगों ने अपनी - अपनी चाय खत्म कर गिलास मेज पर रख दिए | गणेशी आया और गिलास उठा कर ले गया |
          '' शास्त्री जी , आपकी बेगम बहुत लापरवाह हैं | बाहर निकले हैं तो अपने सामान की ओर खास ध्यान रखना चाहिए | ''  खान ने कहा |
          '' होनी है साहब ... उस बिचारी को क्या दोष दिया जाए | ''  उसने कहा |
          '' फिर ? ''  दुबे ने पूछा |
          '' मैंने रेलवे पुलिस में रिपोर्ट की | कुछ पता नहीं चला | मेरा पूरा पैसा अटैची में था ... लगभग सत्रह सौ रुपए ... सब - कुछ गया ... पहनने के कपड़े  भी ... सब उपरवाले की मर्जी है | जो लिखा है , वह तो भुगतना ही पड़ेगा | ''  कहने के बाद वह अपने हाथों की हथेलियाँ रगड़ने लगा |
          अब बात समझ में आने लगी | दुबे और गुप्ता मेरी ओर देखकर मुस्कराये , फिर वहाँ से उठकर ऑफिस की ओर बढ़ लिए | मैं समझ गया कि वे दोनों यहाँ से उठकर क्यों चले गए ? एक प्रकार से ठीक भी है कि वे दोनों यहाँ से चले गए | मुसीबत में फसे इस व्यक्ति की बातों पर एकाएक कैसे विश्वास कर लिया जाए ? मानव की प्रकृति ऐसी होती है कि अनजान और अपरिचित व्यक्ति की बातों पर सहजता से विश्वास नहीं होता | भले ही वह सत्य कह रहा हो | सब - कुछ झूठ ही लगता है |
                                                                         **

इससे आगे का अगले भाग में -

                                                                 - पवन शर्मा
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पवन शर्मा - कवि , कहानीकार , लघुकथाकार 

पता
श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट  विद्यालय ,
जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
फो. नं. - 9425837079 .
ईमेल – pawansharma7079@gmail.com

संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867




    

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