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14.3.20

कल की तरह



















( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक अक्षर और '' से लिया गया है )


कल की तरह 

आज भी 
मन नहीं लगेगा 
कल की तरह |

आज भी 
आकाश नहीं है प्रकृतिस्थ ,
मटमैलापन नत्थी है 
धरती का 
उससे |

सिर पर सवार हवा 
साँस रोक कर
डाल रही है दबाव 
और 
सशंकित कौए
कर रहे हैं काँव काँव 

इस गाँव में 
उराँवों के नहीं हैं 
ओझा या बेगा ! फिर 
आधी रात के निचाट अँधेरे में 
जागेगा जब  ' ड्रेकुला '
ह्रदय के रक्त का प्यासा 
तुम्हारे बिना अकेले मुझसे 
वह कैसे सधेगा 
कल की तरह |

           -  श्रीकृष्ण शर्मा 
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www.shrikrishnasharma.com

 संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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