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17.5.21

पवन शर्मा की कविता - " अब नहीं रहा वो समय "

 यह कविता , पवन शर्मा की पुस्तक - " किसी भी वारदात के बाद " ( कविता - संग्रह ) से लिया गया है -











अब नहीं रहा वो समय 


अब नहीं रहा वो समय 

कि किराने की दुकान तक 

आटा - नोन - तेल लेने 

दरवाजे पर सांकल चढ़ा कर ही 

निकल जायें

कोई घात लगा कर देख रहा है 


अब नहीं रहा 

वो समय 

जब हँसकर प्रेम से 

सुख - दुःख के दो बोल 

अपनी पड़ोसन से 

बोल लें 

किसी की आँखों में सवाल उग रहे हैं 


अब नहीं रहा 

वो समय 

जब नाइट शो देखकर 

उसी पिक्चर के गीत गुनगुनाते 

रिक्शे पर बैठे 

घर लौट आये 

रिक्शे वाले की जेब में 

चाकू हो सकता है 


समय नहीं रहा अब ऐसा कि

किसी स्कूटर से चोट खाये 

सड़क पर पड़े 

रक्त - रंजित वृद्ध को 

अस्पताल पहुँचा दें 


और कुछ उर्वर बना लें 

मृत होती अपनी संवेदना को 


और ऐसा भी नहीं कि

पहली तारीख को 

पैंट की जेब में 

महीने की तनख्वाह रख 

दफ्तर से घर तक 

सुरक्षित लौट आयें 


यह समय 

समय को कैसे जीता जाए

यह सोचने का है |  **


                         -पवन शर्मा 

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पता -

श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय

जुन्नारदेव , जिला – छिंदवाड़ा ( मध्यप्रदेश )

फोन नम्बर –   9425837079

Email –    pawansharma7079@gmail.com   


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.


16.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग - 22 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




15.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग - 21 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




14.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का गीत - " मेरी ग़लती थी ! "

 यह गीत , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " बोल मेरे मौन " ( गीत - संग्रह ) से लिया गया है -















मेरी ग़लती थी ! 


शायद मेरी ही ग़लती थी ||


घिरी हुई थी जब कि यामिनी ,

सोच रहा था मैं विहान की ,

आज शिशिर का प्रात आ गया ,

पर ख़ामोशी सूनसान थी ;


इससे तो वह रात भली थी ,

रजत चाँदनी जब बहती थी ,

जब पखवाड़े बाद चाँद से ,

मिलने की आशा रहती थी ;


थे जब मन के पास सितारे ,

सपने थे आँखों के द्वारे ,


आज तरसता हूँ मैं जिसको ,

वही मुझे पहले खलती थी |


शायद मेरी ही ग़लती थी ||  **


                          - श्रीकृष्ण शर्मा 


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.

13.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग - 20 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




12.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग - 19 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




11.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग - 18 )

 यह दोहा , कवि श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




10.5.21

पवन शर्मा की लघुकथा - " स्थायी तल्खी "

 यह लघुकथा , पवन शर्मा की पुस्तक - " मेरी चुनिन्दा लघुकथाएँ " ( लघुकथा - संग्रह ) से लिया गया है -





स्थाई तल्खी 


“ आज मि.बर्मन आनेवाले हैं | तुम और दफे की तरह बाहर नहीं निकल जाना|” घर में घुसती हुई रमा कहती है |

          मि. पाण्डेय कुछ नहीं कहते | रमा की तरफ देखने के बाद मुँह दूसरी ओर कर लेते हैं – सड़क की ओरवाली खिड़की की तरफ , “ तुम्हीं ने कहा होगा उससे आने के लिए | ”

          “ वो मेरे बाँस हैं | इधर किसी के यहाँ आनेवाले हैं , सो कह दिया कि घर आना | ”

          “ बाँस हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि ... | ”

          “ तुम्हें क्या मालूम | काम तो मैं ही करती हूँ उनके अण्डर | ”

          मि. पाण्डेय खिड़की की सलाखों पर हाथ टिकाकर बाहर देखने लगते हैं | एक अजीब – सी बेचैनी मन में होने लगती है उनके | रमा की कमाई पर पलते हुए मि. पाण्डेय की स्थिति दयनीय है |

          अचानक बाहरवाले कमरे से चीखने–चिल्लाने की आवाजें आने लगती हैं | रमा आवेश में बाहर निकलती है |

          राकेश ने छुटकी के बाल हाथों में पकड़ रखे हैं |

       रमा चीखती है ,  “ ये सब क्या हो रहा है ? ”

          “ सबसे पहले इससे ये पूछो कि आज कॉलेज के बहाने ये कहाँ घूम रही थी ? ”  राकेश तेज आवाज में बोला ,  “ दो बार देख चुका हूँ उस लड़के के साथ – आज टॉकीज में | ”

          “ तुझे क्या करना ...| ”  छुटकी भी तेज आवाज में बोली |

          “ जा मर ! ”  चीखते हुए राकेश ने हाथ में पकड़े छुटकी के बाल झटके से छोड़ दिए | छुटकी भीतरवाले कमरे में भाग जाती है |

          मि. पाण्डेय खिड़की की सलाखों को छोड़ कमरे की दीवारों को ध्यान से देखने लगते हैं | यह बैठने का कमरा है – जिसमें सोफे , कुर्सियाँ , मेज , अलमारी , किताबें हैं | यह कमरा एक समय साफ – सुथरा था , पर कई वर्षों की आर्थिक कठिनाइयों से अब सब पर धूल की तरह जम गई है | दीवारें मटमैली हो गई हैं |

          मि. पाण्डेय सोचते हैं – पत्नी कमाती है ... वे उसके ऑफिस के पुरुष मित्रों को भी जानते हैं ... सब जानते हैं ... कह नहीं पाते ... | रमा की ही तर्ज पर अब छुटकी चलने लगी है ... राकेश छुटकी को रोकना चाहता है ... पर राकेश की एक नहीं चलती ... क्योंकि पूरे दिन बेकार बैठा वह फिल्मी पत्रिकाओं से हीरोइनों के चित्र काटता रहता है ... सभी एक – दूसरे से कटे हुए हैं ... एक – दूसरे से बात करना पसन्द नहीं करते ... घर की हवा तक में उस स्थायी तल्खी की गन्ध है , जो चारों के मन में भरी हुई है | वे महसूस करते हैं कि ऊब , घुटन , आक्रोश , विद्रूपता , दम घोंटनेवाली मनहूसियत – जो मरघट में होती है , इस घर में है |  **     

                            - पवन शर्मा 


पता -

श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय

जुन्नारदेव , जिला – छिंदवाड़ा ( मध्यप्रदेश )

फोन नम्बर –   9425837079

Email –    pawansharma7079@gmail.com   


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.


9.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग - 17 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक  " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




8.5.21

कवि संगीत कुमार वर्णबाल की कविता - " तम का बादल "

 














तम का बादल 


कैसा तम का बादल छा गया
मानव जीवन बदहाल हुआ
आँंखो से अश्क बह रहा
अधरों का मुस्कान गुम हुआ
खुशियाँ न जाने कहाॅं छुप गई
कैसा तम का बादल छा गया

मानव में न अब मानवता रहा
कालाबाजारी सब कर रहा
एक दूसरे पर दोषारोपण कर रहा
अपना राजनीति चमका रहा
कैसा तम का बादल छा गया

दवा,ऑक्सीजन सब आ रहा
न जाने रास्ते में कहां गुम हो रहा
रोगी को कुछ न मिल रहा
एकाई को दहाई में बदल रहा
कैसा तम का बादल छा गया

विपदा में भी शैतान सब लूट रहा
अमीर गरीब सब परेशान हो रहा
सुविधा न लोगों को मिल रहा
अभाव से सब मर रहा
कैसा तम का बादल छा गया

समय बहुत खराब है
खुद सब को संभलना होगा
द्वेष को त्याजना  होगा
मानवता का अलख जगाना होगा
कैसा तम का बादल छा गया

बीमारी न पहचान कर आती है
न जात धर्म से  है मतलब इसको
स्नेह एक दूसरे से बनाये रखना
मानवता का प्रेम जगाये रखना

कैसा तम का बादल छा गया
मानव जीवन बदहाल हुआ   **


             - संगीत कुमार वर्णबाल 
                     जबलपुर

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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.

7.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का गीत - " कहाँ खुशबू - सी गयी वह ? "

 यह गीत , कवि श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " बोल मेरे मौन " ( गीत - संग्रह ) से लिया गया है -















कहाँ खुशबू - सी गयी वह ?



अब न बाकी भरम कोई !!


बन्धु , यह स्वीकारने में ,

है न मुझको शरम कोई !

अब न बाकी भरम कोई !!


थी घटा या थी झड़ी वह ?

या कि थी बरखा खड़ी वह ?

फूल - सी सुंदर - सुकोमल ,

मधुऋतों ने थी गढ़ी वह ?


किन्तु विद्युत् - सी जगाकर 

स्वप्न जागृति में दिखाकर 

और मुझको जड़ बनाकर 


कहाँ खुशबू - सी गयी वह ,

जानता क्या मरम कोई ?

अब न बाकी भरम कोई !!  ** 


                       - श्रीकृष्ण शर्मा 


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.


6.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग - 16 )

 यह दोहा , कवि श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




5.5.21

डॉ0 योगेन्द्र गोस्वामी - " आस्थाओं का हिमवान " ( भाग - 8 )

 इसे कवि श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है | यह इस पुस्तक की भूमिका है -


मेरी छोटी आँजुरी 


आस्थाओं का हिमवान 

भूमिका ( भाग - 8 )


भाग - 7 का अंश -

...चिथड़े – चिथड़े हो चुका , बदलो सभी प्रबन्ध |

  संविधान में हैं लगे , जगह – जगह पैबन्द || ... 


भाग - 8 


               कागज पर जंगल खड़े , कितना बड़ा कमाल |

               स्याही में लहरा रहे खेत खींचते ताल ||

अन्त में एक उदाहरण और –

               घर में बैठी मुश्किलें , दुख अभाव औ’ भूख |

               आजादी की राह में , हुई कहाँ पर चूक ||

          ‘ मेरी छोटी आँजुरी ’ का एक – एक दोहा देश की एक – एक नयी से नयी समस्या की ओर हमारा ध्यान खींचता है | अतः एक भी पक्ष उपेक्षणीय नहीं है , यहाँ उन सब को मूल पाठ में पढ़ने के लिए ही प्रकाशित किया गया है | यदपि ये सभी प्रश्न ऐसे हैं , जो विवेकशील व्यक्तियों के सामने प्रतिदिन उपस्थित होते हैं , उन्हें साहित्य में सामने लाकर कविवर शर्मा जी ने युग का इतिहास रच दिया है | बुराई बुराई है , अच्छाई अच्छाई | इतिहासकार को कोई हक़ नहीं कि वह उसके साथ मनमानी और छेड़छाड़ करे जैसा कि हम आजकल देख पाते हैं | इतिहास के प्रश्नों को लेकर जिस प्रकार की राजनितिक उठा – पटक आज हो रही है , उससे श्रीकृष्ण शर्मा आहत हैं | पढ़े – लिखे लोगों के बुद्धि – विवेक पर भी प्रश्न उठाये गये हैं | हम शिक्षा देकर नयी पीढ़ी को गुमराह करने पर आमादा हैं –

               अच्छा हो या हो बुरा , राजनीति का रास |

               घटित हुआ जो कुछ उसी का लेखा इतिहास ||

               इस मुर्दा इतिहास को , कुछ कहते हैं झूठ |

               आपस में फैला रहा , घृणा द्वेष औ’ फूट ||

               मन में घोले हैं जहर , होठों मगर मिठास |

               ऐसे लोगों ने किया , दूषित सब इतिहास ||

               दो कौमों के बीच में , सुलगाता है आग |

               भूलो इस इतिहास को , छिड़ा हुआ है राग ||

          कविवर शर्मा जी सफलता और असफलता के प्रति सार्थक दृष्टिपात करते हए अनुभव का निचोड़ कहते हैं –

               मत तू मन में गर्व कर , मत कर व्यर्थ विषाद |

               तू तो पथ की धूल है , कौन रखेगा याद ||

               असफलता पर क्यों भला , मचता है यों शोर |

               मोती लेकर क्या सभी , आते गोताखोर ||

          कवि की इन पंक्तियों को पढ़कर अंग्रेज कवि मिल्टन का स्मरण हो आना स्वाभाविक है | वह महत्वाकांक्षी था किन्तु यह निर्णय नहीं कर पाता था कि क्या रचूँ , जो मेरी कृति अमर हो जाये | वह सफल न हो सका किन्तु एक हादसे ने उसके जीवन को नयी दिशा प्रदान की | वह अपनी आँखें खो बैठा | अंधेपन ने उसमें ‘ पैराडाईज लॉस्ट ’ लिखने की प्रेरणा जगाई और वह काव्य जगत में अमर कृति देने में सफल हुआ | उसकी काव्य पंक्ति प्रसिद्ध है कि जो प्रतीक्षा करता है , वह भी सेवा करता है | महत्व सफलता या असफलता का न होकर कर्मनिष्ठा का होता है |

          ‘ मेरी छोटी आँजुरी ’ दोहों की नयी श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण कड़ी सिद्ध होगी | आगरा की वैष्णव संस्कृति की छाप कवि और उसकी कविता पर पूरी तरह विद्यमान है | एक ओर शौर्य और दूसरी ओर दैन्य इस भूमि की मिट्टी की विशेषताएँ हैं | कविवर शर्मा जी उत्तराखण्ड की शस्यश्यामलता और सौम्य शांतता के सच्चे उत्तराधिकारी हैं | भाषा के तेवर ग्रंथ के गहन अध्ययन , नेकनीयती और स्वच्छ जीवन मूल्यों को वहन करने में सक्षम है | शब्द संपदा शर्मा जी के गंगा – यमुनी संस्कारों से स्नात है , अतः उल्लास , उमंग और लालित्य का वरण करने वाला उनका यह काव्य रसिकों के मन को रस में सराबोर कर जीवन को सुखों से भर देगा | आने वाली पीढ़ियाँ हिन्दी को समझें , पढ़ें और यदि उसके गौरव को आज की पीढ़ी सहेज कर रख सकी तो भविष्य निश्चित ही उज्जवल होगा , ऐसा विश्वास है | परमात्मा के विश्वासी कवि अपनी इस कृति से अपार यश प्राप्त करेगा , इसमें संदेह नहीं है | सार्थक सामजिक ललित व्यंजनापूर्ण आदर्श और यथार्थ का परिपाक प्रस्तुत करने के लिये कवि को बधाई देना हमारा परम कर्तव्य है |

इत्यलम | **

                               

                        - डॉ0 योगेन्द्र गोस्वामी

                             ‘ आनन्द वृन्दावन ’

                          बी – 166 , सूर्यनगर ,

                             गाजियाबाद – 201011  


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.

                      

4.5.21

डॉ0 योगेन्द्र गोस्वामी - " आस्थाओं का हिमवान " ( भाग - 7 )

 इसे कवि श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है | यह पुस्तक की भूमिका है -


मेरी छोटी आँजुरी 


आस्थाओं का हिमवान 

भूमिका ( भाग - 7 )


भाग - 6 का अंश -

... कभी संघर्षों की छाया में कुरुक्षेत्र का स्मरण आता है तो कभी विजयपर्व पर रची गयी

 दीपमालिका का सुकुमार सौंदर्य | अंधकार और प्रकाश का सनातन संघर्ष नये रूपों में इस

 काव्य में संकलित किया गया है धृष्ट या अशिष्ट बलात्कारी आचरणों के लिए उसकी

 भर्त्सना भी की गयी हे | ...


भाग - 7 

 

... तिमिर की धृष्टता और सिन्धु का आर्तनाद दृष्टव्य है और बूढ़े पहाड़ का चुपचाप देखना उसकी विवशता ही है –

          मर्यादा की सब परिधि , तिमिर गया है लाँघ |

          घेर घार कर चाँदनी की उघाड़ दी जाँघ ||

          आर्तनाद सुन सिन्धु का , खाती लहर पछाड़ |

          मूक स्तब्ध सा देखता , बूढ़ा अचल पहाड़ ||

     दीपपर्व का एक रूप – इस में संघर्ष और जिजीविषा विद्यमान है –

          इस गहरे तम – तोम को , गयी अमावस लीप |

          किन्तु दीवाली सज रही शत – शत ज्योतित दीप ||

          सूर्य चन्द्रमा हारकर , छोड़ गये मैदान |

          काल रात्रि से युद्धरत , पर नन्हा दिनमान ||

          दीपक के वर्णन में व्यंजनाएँ उभरती है –

          प्राण गलाकर साँस का , निशि भर रहा समीप |

          सुबह हुई तो मनुज ने , बुझा दिया वह दीप ||

          निशि के श्यामल अंग पर , डाल प्रकाश दुकूल |

          जूड़े में खोंसे दिये ने बाती के फूल ||

     सतसई का दूसरा पक्ष यथार्थ जीवन का दुर्दर्ष रूप है | कवि ने युग यथार्थ को सामने रखकर एक चित्रशाला सजायी है | युग का सजीव इतिहास ही यहाँ अंकित है | कवि की कल्पना चतुर्दिक फैले घटना प्रसंगों को निरुपित करती है | अनेक समस्याएँ हैं , जिनकी जड़े गहरी हैं | चाहे घर – घाट की हों , चाहे व्यापार और राजनीति की , चतुर खलनायकी में सिद्धहस्त लोगों के हाथ में समय की बागडोर आ गयी है और वे इस देश की प्रजा को जैसे चाहें नाच नचाते रहते हैं | आम आदमी की लाचारी है कि वह भूख , दरिद्रता , लूट और शोषण से त्रस्त बना रहे और कुछ न कर सके | वातावरण अत्यन्त जटिल और विषाक्त है | कवि श्रीकृष्ण शर्मा जी ने अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं किंकर्तव्यविमूड़ता की स्थिति है | एक से एक उद्धरणीय प्रसंग यहाँ उपस्थित हैं | इस प्राचीन आदर्शवादी देश का मनोबल जीर्ण – शीर्ण अवस्था में पहुँच चुका है , जीवन की राह कठिनाइयों से भरी हुई है | समाज – सेवा , धार्मिक अनुष्ठान , स्वास्थ्य , शुचिता – स्वच्छता आदि के लिए बड़े – बड़े प्रकल्प बनते हैं पर सभी कागजों पर ही बनकर रह जाते हैं | सर्वत्र धोखाधड़ी और पाखण्ड का साम्राज्य है | संसद हो या न्याय का मंदिर खुलेआम लूट , भ्रष्टाचार और तानाशाही , हिंसा और आतंक से ग्रस्त प्रजातंत्र का मज़ाक बनाने में संलग्न हैं –

          अर्ध्दशती में हो गया , अभिशापित परिवेश |

          त्रस्त – पस्त – सन्तप्त जन , दुख दारिद्रय व क्लेश ||

          फुर्र हो गये स्वप्न सब , जीना हुआ मुहाल |

          चौतरफा हैं भेड़िये औ’ खून के दलाल ||

          झुकी रीढ़ चश्मा चढ़ा , बोझ किताबी ओट |

          उफ़ बच्चों को बन गया , शाप ज्ञान विस्फोट ||

          किस्से गुड़िया , लुकछिपी , पन्नी , तितली , फूल |

          बस्ते के बोझा तले , गया बचपना भूल ||

          लोकतंत्र में भी हमें , नहीं मिल रही राह |

          हर नेता उभरा यहाँ , बनकर तानाशाह ||

          इन्द्रप्रस्थ दिल्ली बनी , कौरव सत्ताधीश |

          पाण्डव निर्वासित मगर , दल्लों को बख्शीश ||

          जले गरीबी मोम सी , महंगाई सी आग |

          खेल रही सत्ता मगर , सुख सुविधा से फाग ||

          घूस दलाली तस्करी , घोटालों का राज |

          मुश्किल हुआ गरीब को , मिलना रोटीदाल ||

                           00

          त्यागी बलिदानी गड़े , बने नींव की ईंट |

          उनके ऊपर हैं खड़े , आप स्वारथी ठीठ ||

          उत्तर देगा कौन अब , प्रश्न खड़े बेहाल |

          विक्रम नेता बन गया , टंगा ठगा बेताल ||

          जो धन – बल के सामने , करता तिकड़ी नाच |

          वही न्याय जन के लिए , अंधा क्रूर पिशाच ||

          भ्रष्ट , धृष्ट निष्कृष्ट औ’ लोलुप तथा लबार |

          बने आज भी देश में , हैं झंडाबरदार ||

          चिथड़े – चिथड़े हो चुका , बदलो सभी प्रबन्ध |

          संविधान में हैं लगे , जगह – जगह पैबन्द || **

 

                                              ( शेष भाग – 8 में )


                                                        - डॉ0 योगेन्द्र गोस्वामी  


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867


3.5.21

डॉ 0 योगेन्द्र गोस्वामी - " आस्थाओं का हिमवान " ( भाग - 6 )

 इसे कवि श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया है | यह पुस्तक की भूमिका है -


मेरी छोटी आँजुरी 


आस्थाओं का हिमवान 

( भूमिका )   भाग - 6 


भाग - 5 का अंश 


... कवि ने जो भला – बुरा सहा वह उसका भाग्य था , अब उसकी कविता यदि आपको भी भीतर तक हिला दे और विकम्पित करके छोड़ दे तो आप अपनी अवस्था का विचार अवश्य रखें क्योंकि तन और मन से पुख्ता होना अच्छी कविता को झेलने की अनिवार्य शर्त है | ...


भाग - 6 


...सतसईकार ने जैसे सांस्कृतिक महत्व के तपःपूत मनीषियों की परम्परा के के बीच सामाजिक गरिमा की खोज की है , वैसे ही उसके द्वरा प्रकृति को देखकर सृष्टि के अंतरंग रहस्यों से पर्दा हटाया गया है | प्राकृतिक विभव से मण्डित ऋतु – सौन्दर्य पर कवि ने उल्लास और उमंग की रंगोलियाँ रची हैं , वैसे ही हास – परिहास , उत्साह और ऊब जैसे भावों का सजीव चित्रण कर कल्पना और यथार्थ की धूप – छाँह जैसी कलाचेतना का परिचय दिया है | अंधकार और प्रकाश दोनों के सनातन संघर्ष के प्रकृति प्रदत्त रंग संकेत नयी – नयी छवियाँ प्रस्तुत करते हैं , तो यह भी देखा जाना चाहिए कि मानव कभी हार न मानकर अपनी आतंरिक उर्जा से सतत चुनौती देता और समस्त विपरीतताओं के बीच अपना प्रगति – पथ प्रशस्थ करता रहा है | ग्रीष्मकाल की क्रूर तेवर दिखाने वाली धूप हो या अमावस की भयावह रात मनुष्य ने अपने उल्लास को कभी हारने या पस्त होने नहीं दिया | बिम्बों का सहारा कवि को ऐसे सजीव मानवीकृत रूप खड़े करने में सहायक बना है , जिससे कृति में नयापन आ गया है | धूप का उदाहरण देखें – धूप शिक्षिका बनी ग्रीष्म में कर्तव्यनिष्ठ कठोरता का परिचय दे रही है – ऐसे ही दृश्य – श्रव्य बिम्ब इस काव्य की गरिमा को बढ़ाते देखे जा सकते हैं –

          अनुशासन प्रिय शिक्षिका , धूप रही है डांट |

          तन से कपड़े उतरवा , मार रही है सॉंट ||

          धूप भीलनी चुन रही , झरबेरी से बेर |

          नहीं शिशिर के आगमन में अब कोई देर ||

          धूप जुगाली कर रही , पीपल की छाँव ||

                          00

          धरती पर दिन भर लिखा , सूरज ने जो लेख |

          बाँच न पाये खग उसे , करते साँझ परेख ||

          धूप अँधेरे में गयी , दिन की लिखी किताब |

          दिन भर किरनें धूप का करती रहीं हिसाब ||

          वर्षा वर्णन में रंग और गंध के दृश्य – श्रव्य बिम्बों का प्रयोग वर्षा के वातावरण की दृष्टि में सहायक है |कल्पना के साथ संवेदन के संश्लिष्ट चित्रण से यह वर्णन मोहक बन गया है – भावाक्षिप्त दशा के कुछ चित्र देखें –

          बूंदों के संग उठ रही , सौंधी  सौंधी गंध |

          धरती अब रचने लगी , हरियाली के छन्द ||

          फीका फीका चंद्रमा , बादल तेरह तीन |

          ख़ामोशी की गोद में , रात बड़ी गमगीन ||

          बरस रही है आँख से , उमड़ घुमड़ कर पीर |

          धरती तपती देखकर , बादल हुए अधीर ||

          सागर उड़ता व्योम में , पकड हवा की बाँह |

          तपती धरती पर हुई , अब बदरौटी छाँह ||

          वर्षा ने आकर यहाँ , बिछा दिया कालीन |

          दादुर बैठे पीटते , ध्यानमग्न हो टीन ||

          मखमल से काटी गयीं , बहूटियों की देह |

          खद्योतों की देह में , है विद्युत् का गेह ||

          दिल धक् – धक् – धक् कर रहा , कौंधा लपका देख |

          तड़ित तड़प कर ठोंकती , संज्ञा के तन मेख ||

          मानव की चिर सहचरी प्रकृति कवियों के लिए समाद्रित रही है | यह विषय जितना ही पुराना हो चुका है , उतना नवीन भी है | भारत की प्राकृतिक शोभा जितनी वैविध्यपूर्ण है , उतनी ही संस्कारक्षम भी | भारतीय आम आदमी आज भी अपने प्राकृतिक परिवेश से चलित होता है और कैसी भी बिषम परिस्थिति हो अपनी प्रकृतिजन्य संस्कारशीलता का त्याग नहीं करता | सुदूर ग्रामांचलों के लोग शहरी बनकर भी अपने गाँव और जंगलों में , पर्वतों और सागर से अलग कहाँ हो पाते हैं | मेघदूत की भूमि का संस्कार कविवर शर्माजी की प्रकृति सम्पन्न कविता का गौरव है | कवि प्रकृति की भंगिमाओं को तटस्थ वयां करना चाहते हुए भी बारम्बार मानवीय सुख – दुख से ऊपर नहीं उठ पाता | उनके द्वारा रचित दोहावली धारा प्रवाह नये – नये रूपों में प्रकृति का मूल्यांकन करती चलती है | कभी संघर्षों की छाया में कुरुक्षेत्र का स्मरण आता है तो कभी विजयपर्व पर रची गयी दीपमालिका का सुकुमार सौंदर्य | अंधकार और प्रकाश का सनातन संघर्ष नये रूपों में इस काव्य में संकलित किया गया है धृष्ट या अशिष्ट बलात्कारी आचरणों के लिए उसकी भर्त्सना भी की गयी हे | **

                                             ( आगे का भाग , भाग – 7 में )   


                         - डॉ0 योगेन्द्र गोस्वामी  


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.