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20.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का नवगीत - " वैशाख "

 यह नवगीत , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " अँधेरा बढ़ रहा है " ( नवगीत - संग्रह ) से लिया गया है -















वैशाख 


खो गया है सब कुछ ,

समय की अतल गहराइयों में |

          टिकती नहीं है  ताज़गी ,

          निरर्थक अँगड़ाइयों में |

हवा के हमराह 

तीतरपाँखी मेघ ,

आकाश की आँखें नहीं ढँकते |

प्रत्यंचा - सी तनी

गद्दर काया तलैया की ,

झुर्रियों के सरीसृप  डंसते |

          यहाँ - वहाँ 

          कहीं - नहीं 

          अता - पता वसन्त का |

मोहक गीत सरसों के 

खेत नहीं रचता |

          ... और 

          ढाक तीन पात ,

          जल - जल कर हुआ खाक |

अन्त नहीं 

लेकिन वैशाख का ,

रात - दिन बजती 

पीपल की शहनाइयों में |  **


                        - श्रीकृष्ण शर्मा 


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.

 

19.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 11 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




18.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 10 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




17.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 9 )

 यह दोहा श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




16.6.21

पवन शर्मा की लघुकथा - " मेरे बाद "

 यह लघुकथा पवन शर्मा की पुस्तक - " हम जहाँ हैं " ( लघुकथा - संग्रह ) से ली गई है -





                                                                     मेरे बाद 


जब पिछली बार मिले , तब उन्होंने ऐसी कोई बात नहीं की , जिससे इस बात का अनुमान लगाया जा सके कि वे कोई मकान खरीदने के चक्कर में हैं |

          ' अब आपको मकान की क्या जरुरत ? '  मैंने पूछा |

          ' क्यों ? '  उन्होंने चश्मे को आँखों पर से उतारकर हाथों में ले लिया |

          ' क्यों क्या ? ... कौन रहेगा उसमें ? ... आप और आपकी धर्मपत्नी ... बस | '

          ' वे हँसे , कह तो ठीक रहे हो पर ... | '

          ' पर क्या ... ? बच्चे तो अलग - अलग जगहों पर नौकरी कर रहे हैं ... वे लोग तो मकान का सुख भोग नहीं पायेंगे | '

          ' जप भी हो , पर मुझे मकान तो खरीदना ही है | '  पैंट की जेब से रुमाल निकालकर उन्होंने चश्में के मोटे- मोटे लैंस को साफ किया और आँखों पर लगा लिया |

          ' कब खरीदना है ? '

          ' बात पक्की हो गई है ... आज रजिस्ट्री हो जाएगी | '  वे थोड़ी देर के लिए रुके और अपने आधे हो गए गंजे सिर पर हाथ फिराते हुए बोले ,  ' अच्छा और बड़ा मकान है ... एक ड्राइंग रूम , चार बैड - रूम , एक किचिन , एक स्टोर - रूम , लैट्रिन . बाथरूम ... खुला और हवादार  ... साढ़े तीन लाख में बात पक्की हुई है | '

          ' पैसों का इंतजाम हो गया ? '

          ' रिटायरमेंट का पूरा पैसा लगा रहा हूँ मकान खरीदने में | '  वे बोले |

          ' पूरा पैसा नहीं लगाना चाहिए आपको ... कुछ बचाकर रखना चाहिए , बल्कि मेरे हिसाब से अब आपको मकान खरीदने की आवश्यकता ही नहीं ... सारी ज़िन्दगी किराये के मकान में ही गुज़ार ली , बची हुई भी किराये के मकान में गुज़ारनी थी | '  मैंने कहा |

          ' तुम सही कहते हो , पर बच्चों की ज़िद के आगे मुझे ये निर्णय लेना पड़ा | '  कहने के बाद वे बाद में अपनी हथेलियाँ रगड़ने लगे |

          उनकी बात सुनकर मैं चुप रहा |

          मैं जानता हूँ कि मैं लड़ाई - झगड़े , कलह - क्लेश की जड़ खरीद रहा हूँ | '

          मैं आश्चर्य से उनकी ओर देखने लगा |

          ' मेरे और मेरी पत्नी के मरने के बाद इसी मकान के पीछे मेरे बच्चों में आपस में ही खींचा - तानी होगी | '

          मैं फिर भी चुप रहा |

          ' अरे मैं भी कौन - सी बात ले बैठा ... अभी तो मैं ज़िन्दा हूँ ... मेरे मरने के बाद जो भी हो  - मुझे क्या करना करना ! '

          मैं अवाक् उनका मुँह ताकने लगा |  **  

         

                                                           - पवन शर्मा 


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सम्पर्क सूत्र -

श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय

जुन्नारदेव , जिला – छिंदवाड़ा ( मध्यप्रदेश )

फोन नम्बर –   9425837079

Email –    pawansharma7079@gmail.com  


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.

15.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 8 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




14.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का मुक्तक - " प्यार के शैदाई "

 यह मुक्तक , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " चाँद झील में " से लिया गया है -




13.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 7 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




12.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का नवगीत - " पतझर " ( दो )

 यह नवगीत , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " अँधेरा बढ़ रहा है " ( नवगीत - संग्रह ) से लिया गया है -















पतझर    ( दो )


          तरु से उतर 

          धरा पर भागे ,

                    अनगिनती पत्ते |


अवसर पा 

सिर पर आ बैठे ,

हरियाली को 

रहे समेंटे 

          सुविधा पाने 

          में थे आगे ,

                    अनगिनती पत्ते |


जिधर हवा 

अस्तित्व उधर था ,

मुख में बसा 

शंख का स्वर था ,

          फिर भी रहे 

          किन्तु हतभागे ,

                    अनगिनती पत्ते |


          तरु से उतर 

          धरा पर भागे ,

                    अनगिनती पत्ते |   **


                                 - श्रीकृष्ण शर्मा 


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.

11.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 6 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




10.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 5 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




9.6.21

कवि नरेंद्र आचार्य की कविता - " मैं आम आदमी बनकर जीना चाहता हूँ "

 










मैं आम आदमी बनकर जीना चाहता हूँ 


मैं   आम   आदमी ,  आम   आदमी   ही   रहना   चाहता    हूँ ।

नहीं बनना खास मुझे, आम आदमी बनकर जीना चाहता हूँ ।


अक्सर खास आदमी बनकर लोग, आम आदमी को भूल जाते हैं ।

औरों  को  तो  छोड़ो   खुद  लोग ,  पुरानी  पहचान  भूल  जाते  हैं ।


मैं  आम  आदमी,  आम  आदमी  ही  रहना  चाहता  हूँ ।


पंख  क्या  मिले  उड़ने  को ,  लोगों   ने   अपनों   से   आँखें   फेर  ली ।

खून के रिश्तों को छोड़कर, लोगों ने शानो-शौकत से मोहब्बत कर ली ।


मैं  आम  आदमी ,  आम  आदमी  ही  रहना  चाहता  हूँ ।


आदमी खास बनकर, माँ - बाप भाई - बहन को भूल बैठा ।

खासियत के चक्कर  में , खुद  अपनी  औकात  भूल  बैठा ।


मैं  आम  आदमी ,  आम  आदमी  ही  रहना  चाहता  हूँ ।


खासियत   तो   सिर्फ   चार   दिन   की   चाँदनी   है ।

बाकी तो जहाँ में ,  आम आदमी बनकर ही जीना है ।


मैं    आम   आदमी ,  आम   आदमी   ही   रहना   चाहता   हूँ।

नहीं बनना खास मुझे, आम आदमी बनकर जीना चाहता हूँ।  **



                                                            - नरेंद्र आचार्य 

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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.


8.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 4 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




6.6.21

कवि चमन' भारतीय की कविता - " चल अकेला चल "

 














चल अकेला चल

चल पड़ा हूँ यूँ ही अकेला उन अनजानी राहों पर,
सब कुछ पीछे छूट गया, साथ नहीं कुछ इन राहों पर।

ले जायेगा कहाँ मुक़द्दर, अब न पीछे हटने की ठानी है,
कुछ तो उजाला करेंगे, बरसों से पड़ी इन सुनी राहों पर।

सोचा था बहुत कुछ, पर कुछ भी न मिल पाया,
'चमन'  खाये हैं धोखे बहुत, उन जानी पहचानी राहों पर। **

                                     -  चमन' भारतीय

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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.

5.6.21

कवि मुकेश गोगडे की कविता - " अदृश्य दुश्मन "

















अदृश्य दुश्मन


धरा से अम्बर तक मौत का अम्बार लगा है।
बदन को छुपाऊँ तो छुपाऊँ कहाँ।
अदृश्य दुश्मन के खेमें में आ गया हूँ मैं।
बचकर अब जाऊँ तो जाऊँ कहाँ।।
                   
तकलीफ़ होती है यूँ जिंदगी को देखकर।
ज़मीर अपना सुलाऊँ तो सुलाऊँ कहाँ।
कोरोना बाँह फैलाये खड़ा है हर राह में।
उल्टे कदम अब जाऊँ तो जाऊँ कहाँ।।

तबियत बिगड़ी ,मौत का अंदेशा हो गया।
दवा ख़ौफ की कराऊँ तो कराऊँ कहाँ।
सितमगर का डर सताने लगा है अब मुझे।
कर्म अपने धुलाऊँ तो धुलाऊँ कहाँ।।  **

                                  -  मुकेश गोगडे

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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.

4.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का नवगीत - " पतझर " ( एक )

 यह नवगीत , श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - " अँधेरा बढ़ रहा है " से लिया गया है -












पतझर ( एक )


झर रहे हैं पात पेड़ों से |

आह ,

चलना भी कठिन 

          हो गया मेड़ों से |

झर रहे हैं पात पेड़ों से |


ज़िन्दगी 

ठूँठों - सरीखी ,

ठौर और कुठौर दीखी ,

खण्डहरों में आ गये हम ,

          निकल खेड़ों से |

झर रहे हैं पात पेड़ों से |


रात औ' दिन 

जागते ये ,

खड़खड़ाते भागते ये ,

हम बहुत उकता गये 

          इनके बखेड़ों से |

झर रहे हैं पात पेड़ों से |  **


                            - श्रीकृष्ण शर्मा 


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.


3.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 2 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है - 




2.6.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " भव्य - यशस्वी शिखर थे " ( भाग - 1 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक -   " मेरी छोटी आँजुरी "   ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -






1.6.21

कवि नरेंद्र कुमार आचार्य की कविता - " अगर पिता ना होता तो क्या होता ? "

 









अगर पिता ना होता तो क्या होता ?


अगर पिता ना होता तो क्या होता ? 
ना तुम होते और ना मैं होता ।
पिता विहिन होकर संसार में जीता ।
बिना पिता के शिक्षा कहा से पाता।

पिता धूप में छांव है।
पिता आसमान सा गंभीर है ।
पिता से ही हमारा अस्तित्व है।
पिता रोजी है रोटी है।

पिता धैर्यवान सहनशील है ।
पिता हर युग में महान है ।
पिता मान है अभिमान है ।
पिता से ही हमारी शान है।

पालन पोषण हमारा कौन करता ? 
कमा कमा कर हमें कौन खिलाता ? 
आगे बढ़ने की हिम्मत कौन बढ़ाता ? 
अच्छे बुरे का ज्ञान कौन कराता ? 

निराशा में आशा का दीप कौन जलाता ? 
पिता के बिना हमें कौन अपना नाम देता ? 
पिता के बिना कौन हमें अपनाता ? 
बिना पिता के नाजायज कहलाता ? 

अंगुली पकड़ कर चलना कौन सिखाता? 
गिरने पर हमें कौन उठाता ? 
हमसे आस उम्मीद कौन लगाता ? 
कौन हमें डांटता फटकारता ? 

पिता पालनकरता हमारा जीवनदाता ।
बिन पिता के आवारा समझा जाता ।
बिन पिता के लगाम कौन लगाता ? 
प्यार दुलार हमें कौन करता ? 

पिता परिवार का मुखिया कहलाता ।
पिता ही सबकी जरुरत पूरी करता ।
सुख दुःख में सबको हौसला देता ।
हर मुसीबत को अपने पर झेल जाता ।

पिता मौन होते हुए भी शब्द है ।
पिता गंभीर होते हुए भी भाव है ।
पिता शून्य होते हुए भी सम्पूर्ण है ।
पिता से ही हमारी उत्पत्ति है ।

पिता तेज धूप में शीतलता ।
पिता का कोई शानी नहीं होता ।
पिता में समुद्र सा विशाल ह्रदय ।
पिता है मूर्ति करुणा मय ।

पिता हर घाव का मरहम है ।
पिता हर बीमारी की दवा है ।
पिता से हम मन मौजी हैं ।
पिता पतझड़ में भी बहार है ।

पिता जीवन का हर रहस्य बताता ।
अपना जीवन अभाव में है बिताता ।
अपने परिवार की जरूरत पूरी करता ।
पिता दिनभर मेहनत मजदूरी करता ।

क्या हम अपनी माँ के नाम से जाने जाते ?
क्या हमें पिता कभी नसीब ना होते ? 
अगर पिता ना होता तो ये सारा संसार ना होता ।
ये धरती चांद सूरज भी ना होता ।

मिला है पिता तो करलो सेवा ।
जन्नत में अपनी जगह बना लो ।
अपनी मुक्ति का मार्ग सवारो ।
वरना इस संसार में भटकते रहो।
अगर पिता ना होता तो क्या होता ?................
                  

                   

       - नरेंद्र कुमार आचार्य
 

                साखना टोंक 

                    मोबाइल नंबर  -  9784801714






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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.

31.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग - 30 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




30.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग - 29 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




29.5.21

कवि नरेंद्र कुमार आचार्य की कविता - " मैं कली हूँ "

 









मैं कली हूँ 

मैं कली हूँ 

मैं कली हूँ बगिया की 

मुझे फूल बन जाने दो |

अभी तो ली है अंगड़ाई

मुझे खिल जाने दो |

मत तोड़ो अभी मुझे 

ऐ चमन वालों |

अभी तो खिली हूँ मैं 

मुझे एक बार महक जाने दो | **


                  - नरेंद्र कुमार आचार्य 

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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.


28.5.21

कवि संगीत कुमार वर्णबाल की कविता - " बच्चों का प्यारा आम "

 















बच्चों का प्यारा आम
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सुन्दर आम फलों का राजा
खट्टा - मीठा खूब भाता
हरा - पीला खूब है जँचता
बच्चों का ये प्यारा आम

फलों का इसे कहते राजा
पौष्टिकता से भरा परा
सुगंध से मन भर जाता
खाने को मन ललचाता

आम के सामने सब फीका
मिठाई मधुर सब बेकार
कोई न चाहता उसे
आम पर सब दौड़ लगाता

आम है फलों का राजा **


        - संगीत कुमार  वर्णबाल 

            जबलपुर

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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.

27.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग -28 )

 यह दोहा , कवि श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




26.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग - 27 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




25.5.21

लघुकथाकार पवन शर्मा की लघुकथा - " उनके बीच "

 यह लघुकथा , पवन शर्मा की पुस्तक - " हम जहाँ हैं " ( लघुकथा - संग्रह ) से ली गई है -




उनके बीच 



' गाँव क्यों छोड़ दिया था ? '

          ' क्या रखा था गाँव में ? ' अम्मा के गुजर जाने के बाद मकान ... खेत ... ट्यूबवेल सब - कुछ बैंक की नौकरी लगते ही बेच दिया | '

          ' अम्मा कब गुजरीं ? '

          ' तुम्हारे जाने के साल भर बाद ही | '  वह थोड़ी देर के लिए रुका ,  ' तुम्हें पत्र भी तो लिखा था | '

          ' मुझे नहीं मिला था ... सचमुच | '

          थोड़ी देर दोनों चुपचाप चलते रहे |

          ' इतने बड़े शहर में तुम कैसे रह पाती हो  ...पता नहीं , किसके सहारे | '

          ' प्रतीक के सहारे | '

          ' प्रतीक ? '

          ' मेरा बच्चा | '

          कहाँ है ? '

          ' बोर्डिंग में डाल दिया है | वहाँ उसकी देखभाल अच्छी तरह होती है | सन्डे को देख आती हूँ | '

          ' कितना कठोर ह्रदय है तुम्हारा ! '

          इतने व्यस्त मार्ग में उन्हें जैसे किसी दूसरे की ख़बर तक न थी | सड़क के किनारे खड़ी हाथ ठिलिया में भुने हुए चने देखकर वह बोला , ' चने खाओगी ? ' 

          ' ले लो | ' उसने कहा | 

          वह दो रूपये के चने खरीदता है |

          ' लो खाओ | ' उसकी ओर चने बढ़ाते हुए वह बोला |

          ' तुम्हारी आदत अभी तक नहीं बदली | ' कहने के बाद उसके चेहरे पर हल्की मुस्कराहट तिर आई , फिर चने लेकर एक - एक दाना खाने लगी |

          दोनों चने खाते हुए धीरे - धीरे चलने लगे |

          ' यहाँ कब ट्रांसफर हुआ तुम्हारा ? '

          ' पिछले माह | '

          ' फिर शिफ्ट कहाँ हो गए ? '

          ' कल्याण में | '

          ' रोज अप - डाउन करते हो चर्चगेट तक ? '

          ' करना ही पड़ता है | '

          थोड़ी दूर दोनों शांत चलते हैं |

          ' तुम्हें देखकर मैं हैरान हो गई थी | '

          ' भूत नज़र आया मैं | ' कहकर वह हँसता है |

          ' इतने वर्षों बाद , लगभग अठारह वर्ष बाद तुम्हें देखा है न ... इसलिए | ' थोड़ी देर रूककर उसने फिर कहा , ' तुम्हारे कनखियों के बाल भी सफ़ेद हो गये हैं - पहचानना जरा मुश्किल हो गया था | '

          ' चार वर्ष साथ रहने के बाद भी , मैं तुम्हें देखते ही पहचान गया था | '

          ' तुम्हारे साथ बिताए चार वर्ष ही बेहद कष्टप्रद हैं मेरे लिए - आज भी |'

          ' क्यों ? '

          उन दिनों को भूल नहीं पा रही मैं | '

          चने खाते और बातें करते दोनों पैदल चले जा रहे थे | सड़क के किनारे बिजली के खम्भों पर लगे हैलोजन लैम्प जल उठे थे |

          ' तुम्हारे भीतर का अहं मुझसे जीत गया था | तुम्हारी उच्चाकांक्षाऍ जीत गईं थीं |तभी तो तुम मुझसे सहजता के साथ अलग होकर सतीश के पास चली गईं थीं | '

          ' उलाहना दे रहे हो मुझे | '

          ' कुछ भी समझ लो | हम - तुम एक साथ नहीं रह पाए | हमारे बीच रोज - रोज की कलह ... उफ़ ! '

          वह चुप रही | कुछ झेलती रही | 

          ' अच्छा हुआ कि तुम मुझे छोड़कर चली आईं | मैं तो तुम्हें कुछ भी नहीं दे सका | उस वक्त एक प्राइमरी स्कूल का मास्टर तुम्हें दे भी क्या सकता था ? '

          ' प्लीज राकेश | '

          ' तुम्हारा जाना ही मेरे लिए दृढ़संकल्प जैसा था | तभी तो मैं बैंक में प्रोंबेशनरी ऑफिसर के लिए सिलेक्ट हो सका | '

          दोनों चलते हुए रुक गए |

          ' एक बात पूछूँ ? '

          ' पूछो | '

          ' मैं यह नहीं पूछूँगा कि सतीश ने तुम्हें क्यों छोड़ दिया , किन्तु इतना अवश्य पूछूँगा कि आखिर तुम्हें मिला क्या ? अठारह वर्ष के एकाकी जीवन में मैं आज तक यह नहीं समझ पाया काँति , कि मेरा प्रेम तुम्हें बाँधकर क्यों नहीं रख पाया ! '

          वह फफक कर रो पड़ी |

          ' अब चलूँगा ... तुम्हारे साथ बिताए आज के तीन - साढ़े तीन घंटे मेरे लिए कीमती हैं | '

          वह अब भी फफक - फफक कर रो रही थी |  ***


                                                   - पवन शर्मा      


 पता -

श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय

जुन्नारदेव , जिला – छिंदवाड़ा ( मध्यप्रदेश )

फोन नम्बर –   9425837079

Email –    pawansharma7079@gmail.com  


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 संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.

  

              

24.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग - 26 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




23.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग - 25 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




22.5.21

कवि नरेंद्र कुमार आचार्य की कविता - " किताबें हमेशा रहेगी "

 









किताबें हमेशा रहेगी


इन्टरनेट का ज्ञान आज है कल नहीं रहेगा । 

अन्तरिक्ष का ज्ञान आज है कल नहीं रहेगा ।

लौटकर आना पड़ेगा एक बार फिर सोचकर देखो ।

किताबों का ज्ञान आज है कल भी रहेगा ।


हवा का ज्ञान हवा में समाप्त हो जाएगा ।

भविष्य में किसी के काम नहीं आएगा ।

कल आज और कल भी रहेगा ज्ञान ।

लिखावट का ज्ञान हमेशा अमर रहेगा ।


ना इन्टरनेट की ना मोबाइल की जरुरत है ।

ना लाईट ना ही तार की जरूरत है ।

देखो पलटकर इतिहास के पन्नों को ।

सिर्फ कागज और कलम की जरूरत है ।


एक दिन तकनीकी युग समाप्त हो जाएगा ।

फिर हवा का ज्ञान तू कहाँ से लाएगा ।

सनातन व शाश्वत सत्य है दुनियाँ में ।

किताबों का लिखा हमेशा रहेगा ।


ना गुगल होगा ना ही यूट्यूब होगा ।

ना वाट्सएप ना ही फेसबुक होगा ।

सब समाप्त हो जाएगा एक दिन ।

सिर्फ किताबें और उसका ज्ञान होगा ।  **


                              - नरेंद्र कुमार आचार्य 

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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.


21.5.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का दोहा - " होरी - सा जीवन गया " ( भाग - 24 )

 यह दोहा , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है -




20.5.21

कवि नरेन्द्र कुमार आचार्य की कविता - " एक नई सुबह "

 











कोरोना तू आया और चला भी जाएगा ।

अपनों से बिछड़ने का गम दे जाएगा ।

दहशत व मायूसी का साया है ।

कुछ समय बाद सब बदल जाएगा ।


कोरोना तेरे आने से एक बात सीखी है ।

ये जिंदगानी पल - दो पल की है ।

फिर घमंड कैसा इस शरीर पर ।

बोल भलाई ही साथ जानी है ।


ये तेरा ये मेरा सब यहीं रह जाएगा ।

धन - दौलत कुछ भी साथ नहीं जाएगा ।

छोड़ कर इस मोह माया को प्यारे ।

सिर्फ अच्छे कर्म ही साथ ले जाएगा ।


ना कोरोना होगा ना कोई दहशत होगी ।

सिर्फ अपनों का प्यार व मोहब्बत होगी ।

रख हिम्मत हौसला अपने पर ऐ दोस्त ।

फिर आशाओं से भरी एक नई सुबह होगी ।  **

                            



                                                                  

 - नरेंद्र कुमार आचार्य 
    साखना , टोंक ( राजस्थान )
   मोबाइल नंबर - 9784801714 






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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.