12.3.20

पवन शर्मा की कहानी - '' यह सपना ही तो है '' - ( भाग - 1 )

( प्रस्तुत कहानी – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘ ये शहर है , साहब ’ से ली गई है )



                           यह सपना ही तो है

खाना खाकर मैं पौरी में बिछी चारपाई पर आ कर लेट गया | भीतर नरेन के दद्दा खाना खाने की वजह से रुक गए थे |नरेन का छोटा भाई बिज्जू भी | नहीं तो मेरे आने के बाद दोनों ने एक पल के लिए भी मुझे अकेला नहीं छोड़ा | खूब बतियाते रहे थे - घर की , बाहर की , नरेन की | लेटे - लेटे मैं सोचता हूँ - मैं पहले भी आ चुका हूँ यहाँ , नरेन के साथ | तब अचानक आना हुआ था मेरा | शहर के दमघोटूं वातावरण से उबरकर मैं गाँव के शुद्ध और स्वच्छ वातावरण में कुछ दिन के लिए आया था | उस समय नरेन के घरवालों ने मन जीत लिया था मेरा | ऊपर से बिज्जू की बातें ... खूब घूमा - फिरा था गाँव में ... अमराई , खेत , पोखर , नहर सभी जगह | एक हफ्ता कैसे बीत गया था , पता ही नहीं चला था | जब लौटा था , तब गाँव की अनेक यादें थी मेरे साथ |
          हो जाता है ... सब - कुछ ... अपने आप ही ... कुछ सोचो ... होता कुछ है ... मैं यादों को जितना भुलाने की कोशिश कर रहा हूँ , उतना ही पीछा कर रही हैं |
          मुझे हॉस्टल के वो दिन याद आ रहे हैं , जब मैं और नरेन हॉस्टल की  छत पर सर्दियों की सुबह में कुनमुनाती धूप का आनन्द उठाते हुए पढ़ा करते थे | गप्पें होती थीं , बहस हुआ करती थीं , धींगामुश्ती और मटरगश्ती भी | स्कॉलर होल्डर नरेन के साथ एक बात जुडी थी कि वह जल्दी ही भड़क जाता था | गर्म और तेज - मिजाजी नरेन याद आता है उस घटना से , जब बी.एस - सी. फ़ाइनल में एडमीशन फ़ीस में से क्लर्क ने दो रुपये वापिस करने में आनाकानी की थी , तब उसने लड़ - झगड़कर अपने दो रूपये वापिस लिए थे |
          एम.एस - सी. फाइनल में कॉलेज के वो शुरू के दिन थे | गर्ल्स हॉस्टल में रहकर पढ़ रही छात्रा वेणी मुखर्जी ने आत्महत्या कर ली | आत्महत्या करने के कारण का पता नहीं चला | बात आई - गई हो गई | किन्तु ,एक दिन सौमित्र दौड़ता हुआ आया और नरेन के कान में फुसफुसाकर बोला , '' गुरु , कुछ मालूम चला ? ''
          '' यही ... यही कि ...'' सौमित्र के मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी | मैं भी उन लोगों के नजदीक आ गया |
          '' क्या बात है ... " ? बताता क्यों नहीं ? ''  नरेन धीमी आवाज में चीख़ - सा पड़ा |
          '' यही कि वेणी मुखर्जी ने सुसाइट नहीं की | उसका मर्डर किया गया है गुरु | ''
          '' मर्डर ! '' नरेन के मुँह से अस्फुट स्वर निकला , '' किसने किया ? ''
          '' एम.एल.ए. के सपूत ने | ''
          '' प्रकाश ने ? ''
          '' हाँ गुरु ... सबूत भी मिल चुके हैं वेणी मुखर्जी के रूम से ... रेप करने के बाद उसने सबूत मिटाने की भरपूर कोशिश की ... प्रिन्सिपल के कहने पर पुलिस केस को दबा रही है |'' कहते - कहते औमित्र हाँफने लगा |
          मैं और सौमित्र देख रहे थे कि नरेन का चेहरा बनने - बिगड़ने लगा | सहसा वह चीख़ पड़ा ,  '' आज के बाद पन्द्रह दिन तक कोई क्लास नहीं लगेगी ... खासकर साइन्स फेकल्टी तो नहीं ... जाकर कह दो साइन्स फेकल्टी वालों से ... ''
          '' गुरु ... ''  सौमित्र उसे रोकना चाह रहा था , पर वह किसी छूटे हुए तीर की तरह वहाँ से जा चुका था |
          फिर ...
          एक हफ्ते तक सांइस फेकल्टी ने अपनी - अपनी कक्षाओं का बहिष्कार किया था | साइंस फेकल्टी का साथ देने के लिए आर्ट्स और कॉमर्स फेकल्टी वाले भी अपनी - अपनी कक्षाओं का बहिष्कार करने लगे -
          ' एम.एल.ए. के सपूत को कॉलेज से बर्खास्त करो | '
          ' प्रकाश को अरेस्ट करो | '
          ' वेणी मुखर्जी के साथ हुए अन्याय को न्याय दिलाया जाए | ' ऐसे ही बैनर कॉलेज की हर दीवार पर चिपके हुए थे |
          उस दिन उसे प्रिन्सिपल ने अपने चैम्बर में बुलाया था | मैं बाहर ही खड़ा था | पन्द्रह - बीस मिनट बाद जब वह चैम्बर से बाहर निकला , तब एक अपमान उसके चेहरे पर मैंने स्पष्ट रूप से देखा था | वह मुझे साथ लिए हॉस्टल के कमरे में कैद हो गया |
          '' साला बुड्डा कहता है - ये कॉलेज बड़े और धनी लोगों के बल पर और उनके डोनेशन पर चल रहा है | एम.एल.ए. भी उन्हीं में से एक प्रतिष्ठित मेम्बर है ! किसी भी प्राइवेट कॉलेज में इनकी दखल मायने रखती है ... तो क्या उसका लड़का किसी के साथ भी ! ... उसकी बेटी के साथ ये सब होता तब ... कहता है  - ये हंगामा शांत करवा दो , नहीं तो टर्मिनेट कर दूँगा ... करके तो देखे | ''  मैं देख रहा था कि वह न जाने क्या - क्या बडबडा रहा था ... अस्फुट स्वर निकल रहे थे उसके मुँह से |
          फिर दो दिन नहीं बीते कि नरेन ने एक और हँगामा खड़ा कर दिया | प्रिन्सिपल के चैम्बर के बाहर खड़ा नरेन प्रिन्सिपल से न जाने किस - किस फण्ड का हिसाब माँग रहा था | मेरी समझ में नहीं आया था उस समय | बहुत देर तक बहस चलती रही थी | बीच - बीच में प्रिन्सिपल के चेहरे पर उभरी परेशानी स्पष्ट रूप से मैने देखी  थी | बाद में पता चला कि बहुत से ऐसे फण्ड हैं , जिनमे से काफी राशि प्रिन्सिपल हजम कर चुका है | दूसरों को इसकी भनक तक नहीं है | मैं सोचता हूँ कि नरेन को कहाँ से और कैसे पता चला ?
          सोचता हूँ तो सोचता ही रह जाता हूँ |
          उस दिन नरेन ने कॉलेज के छात्र संघ के चुनाव में अध्यक्ष पद  के लिए फॉर्म भरा था | मैनें देखा था - कुछ प्रतिष्ठित प्रोफ़ेसर उसको फॉर्म भरने से मना कर रहे थे , लेकिन उन सब की इच्छा के विरुद्ध उसने फॉर्म भरा था | फॉर्म जमा करते समय प्रिन्सिपल और प्रोफ़ेसर के बीच परेशानी और बेचैनी मैनें उनके चेहरों पर स्पष्टतः देखी थी , फिर ...
          फिर ...
          सहसा आहट होती है | मैं चौंक उठता हूँ | ...

  इसके आगे का अगले भाग में -   
                                  - पवन शर्मा 
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पवन शर्मा - कवि , कहानीकार , लघुकथाकार 

पता
श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट  विद्यालय ,
जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
फो. नं. - 9425837079 .
ईमेल – pawansharma7079@gmail.com



संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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