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23.11.19

ज़िन्दगी


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के गीत - संग्रह - '' फागुन के हस्ताक्षर '' से लिया गया ,1963 में रचित गीत )














ज़िन्दगी  ऐसी कि जैसे हो कोई मैला बिछौना ,
या कि चूल्हे पर चढ़ा जैसे कोई फूटा भगौना ;
या किसी ने भीड़ वाले और चलते रास्ते पर -
चाट कर जैसे दिया हो फैंक कोई व्यर्थ दौना |

जिन्दगी ऐसी कि जैसे डबडबाती आँख कोई ,
धूल से जैसे अँटी हो बन्द घर की ताख कोई ;
या किसी मजदूर- बस्ती के धुँए में झींकती - सी -
रोशनी को ज्यों दबोचे हो अँधेरा पाख कोई |

जिन्दगी ऐसी कि जैसे गाँव कोई पत्थरों का ,
या अजूबों के शहर में हो मोहल्ला सिरफिरों का ;
या कि आदमखोर जत्थों से निहत्था जूझता ये -
जंगलों से जा रहा जो काफ़िला कुछ अक्षरों का |

                          - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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