17.12.19

कहाँ है सूर्यमुखी ?


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के काव्य - संग्रह - '' अक्षरों के सेतु '' में लिखित 1966 की रचना )












कहाँ है सूर्यमुखी ?

हे प्रभु !
कहाँ है सूर्यमुखी 
मेरी आकांक्षाओं का 
वह प्रकाश - पिण्ड कहाँ है 
जिसके अभाव में 
अंधी हैं मेरी आँखें 
बहरे हो गये हैं मेरे कान 
जिससे बिछुड़ कर 
प्रताड़नाओं और अवमाननाओं के तीव्र स्वर में 
मेरी वाणी मूक हो गयी है 
लूले हो गयें हैं हाथ 
और पाँव लंगड़े 
विलगाव होते ही जिससे 

मेरे अदम्य उत्साह 
अपराजेय पौरुष 
और अनंत शक्ति का वह स्त्रोत / जो 
मेरी धमनियों और शिराओं में 
बहता था अजस्त्र गति से 
सूख गया है |

मेरे प्रयत्न 
पीड़ित हैं पक्षाघात से 
और भाग्य  क्षय से ग्रसित 

धूलि - धूसरित है 
रोली मेरे मस्तक की 
काट दिये गए हैं डैने मेरी उडान के 
और मैं 
बंदी हूँ ध्रुव प्रदेश में 
दीर्घकालीन रात्रि का 
दिन - रात के इस जीवन - व्यापी युद्ध में 
क्षत - विक्षत हो चुकी है मेरी जिजीविषा 
चारों ओर शत्रुओं से घिरी |

ज्ञात नहीं है मुझे 
मस्तिष्क है या नहीं 
ह्रदय है या नहीं मेरे पास 
सोच - समझ अनुभूति - संवेदन कहाँ हैं सब ?
शायद एक यंत्र - मात्र रह गया हूँ मैं 
जिसमें एक विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया होती है 
एक विशेष बटन दबाये जाने पर 
मुखापेक्षी हूँ मैं 
किसी साधन का 
पर शीश के ऊपर हैं सप्तर्षि 
जिन्हें नीचे नहीं उतार पा रहा मैं 
लाख सिर पटक कर भी |

ओझल है ध्रुवतारा 
और दिशा - ज्ञान भ्रम में है 
घूम रहे हैं तेजी से अनगिनत नक्षत्र - पिण्ड 
किसी आकर्षण की परिधि में 
पर छिटका हुआ 
गुरुत्वाकर्षण से मैं 
किस अबूझे चक्रवात 
किस अपरिचित धूमकेतु ने जकड़ लिया हूँ |

उठ खड़ी हुई है 
संघर्षों की ऐसी भीड़ 
जो रौंदती चली जायेगी
मेरे सम्पूर्ण व्यक्तित्व को 
और साँसें तोड़ता हुआ वर्तमान 
भविष्य के अंधकार में 
आँखें मींच लेगा |

             - श्रीकृष्ण शर्मा 
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 www.shrikrishnasharma.com
संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867
     

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