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कवि अयाज़ खान की कविता - '' महुआ का पेड़ ''













महुआ का पेड़ 

सावन में मन बादल हुआ
और तन महुआ का पेड़।
पत्तियाँ तोड़ने पेड़ पर चढ़ा हूँ
महुआ के रंग-सा हरा हूँ
मन बादल, तन महुआ
सावन की फुहार में भीगता हूँ
जैसे भीगता है पेड़ महुआ का।
सावन में महुआ के पेड़ पे चढ़ा हूँ
और पहुँच गया हूँ बादलों के बीच
ऐसा लग रहा है जैसे
मैं पिछले जन्म में पेड़ था महुआ का।
बिजली संग कौंधता है पेड़ महुआ का
तन-मन में, रोम-रोम में
महुआ के पेड़ को छूने का अहसास
किसी मूर्ति के आलिंगन जैसा था।
महुआ का पेड़ होता है क्यूँ इतना नशीला
अब समझ में आ गया।
धूप तपने से कोटर के पानी से
उठने लगा धुआँ
धुएँ के संग उड़ता हुआ मैं।
बारिश में खड़ा है ठूँठ महुआ का
ठूँठ किनारे की चट्टान जैसा हूँ। **


   - अयाज़ खान 
114 सग्गम
एमपी वार्ड 11
जुन्नारदेव 480551
ज़िला- छिन्दवाड़ा
मध्य प्रदेश







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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन 

नम्बर– 09414771867

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