1.5.20

रामप्रीत आनंद - '' ग़ज़ल ( 3 )










ग़ज़ल ( 3 )

खुद महफ़ूज रहकर ख़ातिरदारी कीजिए ,
फिर ज़िन्दगी के लिए ज़मीरदारी कीजिए।

जान के साथ जहान को समझिए जरा,
हौसला जानकर ही तीमारदारी  कीजिए ।

मझधार में पड़ी है ज़िन्दगी हर किसी की,
थोड़ी मदद के साथ ईमानदारी कीजिए।

जिन रत्नों  ने आज दी है शहादत अपनी,
उनकी शहादत के लिए असरदारी कीजिए ।

मुश्किलें जान अश्क आते हैं निगाहों में ,
घमंड छोड़कर दिल में समझदारी कीजिए ।

ख़ुशनसीब हैं आप जो सलामत है ज़िन्दगी,
बेहतर सेहत के लिए खबरदारी कीजिए ।

इत्तेफाक से मुलाकात हो जाए गर कभी ,
बस पाक दामन के लिए रिश्तेदारी कीजिए।

हसरतों के साथ खड़ें हों दीन दुनिया में ,
भूख मिटाने के लिए हिस्सेदारी कीजिए।

सबक़ लेने की जरूरत है बीमारी से 'आनंद'
जहाँ की याद में थोड़ी हाजिरदारी कीजिए।**

 - आर. पी.आनंद(एम.जे.) गोरखपुर 
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रामप्रीत आनंद
गजलकार 









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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई 

माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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