18.5.20

कवि संगीत कुमार वर्णबाल की कविता - '' जाने दो ''






















जाने दो

जाने दो, अब मुझे घर जाने दो । 
जीते रहें , तुझे जीलाते रहें ।। 
धूप में श्रम कर , तेरा घर बनाते रहें । 
अंधेरे में यूँ दिन बिताते रहें , कि तेरा घर जगमगाता रहे ।। 
जाने दो, अब मुझे घर जाने दो ।

ठीक रहा तो फिर लौटुंगा , तेरा शहर बसाने को । 
घर में बूढी माँ - बाप, जो नैन सजाये बैठे हैं ।। 
राह निहारते इधर - उधर जो अपने घर  बैठे हैं । 
जाने दो, अब मुझे घर जाने दो । 

मेरी मिट्टी मेरी माँ  जिसने मुझे किया है याद । 
उस मिट्टी का सुगंध मन मेरे जो छाया ।।
उस मिट्टी का  है कर्ज चुकाना , जिसने मुझे समर्थ बनाया । 
जाने दो, अब मुझे घर जाने दो। 

अपनी मिट्टी - संग फिर अच्छे हो जायेंगे । 
अपनों  के संग जो जीवन  बितायेंगे ।। 
सब हैं वहाँ अपने लोग , घर वहीं बसायेंगे ।
जाने दो, अब मुझे घर जाने दो।। 

तेरा क्या है , अच्छे में अच्छाई दिखाओगे । 
अब  क्या खाक मदद  कर पाओगे ।। 
अपने घर जो चल जायेंगे, गुजर - बसर हम कर पायेंगे । 
जाने दो अब मुझे घर जाने दो। **


                        - संगीत कुमार
                                                                    जबलपुर 

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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई 

माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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