1.5.20

रामप्रीत आनंद - ग़ज़ल ( 2 )










ग़ज़ल ( 2 )

नफ़रत के शहर में जहर उगलता है आदमी,
ग़फ़लत के शहर में कहर उगलता है आदमी।

अवसर की तलाश में रहता है वह  निरन्तर ,
हसरत के डगर में सदा फिसलता  है आदमी।

खुद की फ़ितरत से बाज आता नहीं है हरदम,
हज़रत के शहर में हाथ मसलता  है आदमी ।

गैर का पैगाम सुनकर नकार देता है दिल से, 
फ़जीहत के शहर में नजर बदलता है आदमी।

सिफ़ारिशें हद से गुजर जाती हैं  जब उसकी,
शिरकत के शहर में खूब उछलता है आदमी।

कुदरत की सीख से सुधरता नहीं है हर पल,
दहशत के शहर में बाहर निकलता है आदमी ।

बदलते वक़्त की मजबूरियाँ बन गई हैं बख्तर ,
 फ़ितरत के शहर में कब संभलता है आदमी ।

जानवरों की तरह रुख़सत होता है दुनियां से ,
मरकत के शहर में धन  निगलता है आदमी।

सारी दुनिया हिल गई है  महामारी से 'आनंद' 
संगदिल के शहर में कहाँ पिघलता है आदमी।

           - आर.पी.आनंद (एम.जे.)
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रामप्रीत आनंद
गजलकार 









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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई 

माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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