13.6.20

कवि रामचन्दर '' आजाद '' की कविता - '' वक्त - बेवक्त ''














वक़्त - बेवक़्त


बदल गया कुछ बदल रहा  है  अपना  हिंदुस्तान  रे ।
मंद पड़ गई गाँव की रौनक  शहर  हुआ  वीरान  रे ।।

जगह - जगह पर  पहरे  हैं  घर  में  रहने को मजबूर।
चुपके चुपके घर जाने  को  बेबस  हो  गए  मजदूर ।।
फिर से याद आ रहे उनको खेत  और  खलिहान  रे ।।

काम - धाम सब बंद हैं ऐसे , सांप  सूंघ  गया है जैसे।
सूखी रोटी भी नसीब से  भाग  रही  जिएँ  अब  कैसे ?
जिजीविषा के वशीभूत सब तज घर किया पयान रे।।

बीमारी लेकर  आई  संग  बेकारी,  भुखमरी का जाल ।
रोजी रोटी छिनी जा  रही  लाचारी  और  खस्ताहाल ।।
अस्त व्यस्त की पराकाष्ठा अब हरने लगी है प्रान रे।।

भारत भ्रमण फीका पड़ गया उनके  कदमों  के  आगे ।
लक्ष्य बनाकर निकल पड़े अब मौत देख उनको भागे।।
जीवन मरण से परे व्रत मन में लिया है उसने ठान रे।।

जिनके फौलादी  बाहों  ने  महल बनाये बढ़ - चढ़कर ।
आज निराश्रित वह पैदल निकल पड़ा है  अपने  घर ।।
ताजमहल और लालकिला भी चकित और हैरान  रे ।। **


            - रामचन्दर  '' आजाद ''












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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई 

माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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