14.6.20

कवि रामचन्दर की कविता - '' सोचने से दर्द घट सकता नहीं ''

( 'काव्य-सुमन 'से ) 






सोचने से दर्द घट सकता नहीं 


सोचने से दर्द घट सकता नहीं !
सोचने से दर्द जा सकता नहीं !
इसलिए तुम सोच के सागर में 
क्यों      डूबे      हुए       हो  ?

कब तलक पोंछोगे अपने आस्तीनों से ये आंसू ?
इस तरह से आंसुओं का वेग रुक सकता   नहीं |
सोचने      से      दर्द     घट     सकता     नहीं !

द्वार  तुमने  बंद  कर  रखें    हैं     मन     के  |
किस तरह से रोशनी   खुशियों   की    चमके  ?
द्वार   मन   के   तुम     ज़रा    से     खोलिए ,
फिर   तो   खुशियों     की      किरण        से  ,
मुस्कराहट में इजाफा कम  हो   सकता   नहीं |
सोचने    से    दर्द     घट      सकता      नहीं  !

जिंदगी के  शोरगुल  से  इस  तरह  न   ऊबिये  ,
उसको अपने मन के  दर्पण में सजाकर देखिये |
फिर अकेलापन  कभी पास  आ  सकता  नहीं  ?
सोचने     से     दर्द     घट     सकता      नहीं  !

आइये       कुछ        बैठकर       बातें      करें ,
कुछ   सुने    मेरी    व    कुछ    अपनी    कहें  |
इस तरह  जब   सिलसिला   बातों   का   होगा ,
फिर तो  सपनों    का    नया    संचार    होगा  |
वरना    दर्दे     धुंध     छंट     सकता     नहीं  |
सोचने     से     दर्द     घट     सकता     नहीं  !

इस     तरह      मायूसियत     अच्छी     नहीं ,
इससे   तो     गम    की    घटायें    चूं    पड़ेगी
और फिर  तो   सोच   के   सागर   में   तुमको ,
डूबने     से     कोई     रोक     सकता    नहीं  |
सोचने       से     दर्द     घट     सकता    नहीं ! **



  - रामचन्दर 








------------------------------------------------------



संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई
 माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

No comments:

Post a comment

आपको यह पढ़ कर कैसा लगा | कृपया अपने विचार नीचे दिए हुए Enter your Comment में लिख कर प्रोत्साहित करने की कृपा करें | धन्यवाद |