12.6.20

कवि रामचन्दर '' आजाद '' की कविता - '' सृजन के महारथी ''












सृजन के महारथी


जग साक्षी है तुम  ही  तो  सच्चे  कर्तव्य  निभाये  हो  ।
हे सृजन के  महारथी !  तुम  क्यों  इतना  घबराए हो ।।

नगर   बनाये  सड़क  बनाये  शहर  बनाये  भी  तुमने  ।
भूमंडल  की   सुंदरता  में   प्राण   गंवाए   भी  तुमने  ।।
कौन विवशता है जिसको तुम अन्तरतर में छिपाए हो।।

धरा  से  लेकर  उच्च  गगन  तक गाते यशगाथा तेरी  ।
छिपी  है  फौलादी  सीने  में  अकह कहानी सब  तेरी  ।।
हे  भुजबल  के  विश्वासी !  तुम ही परचम लहराए हो ।।

श्रमदान  और  कर्मदान  की  तुम  ही  जीवित मूरत हो ।
प्रगति  पंथ  के  दर्पण  में  तुम घोर विवशता सूरत हो।।
शोषण के ठेकेदारों से तुम बहु  विधि  धोखे  खाये  हो ।।

हाथ   नहीं  फैलाये  तुमने  कभी  किसी  के  भी  आगे  ।
नवसृजन  में  तन  मन  देकर  डटे  रहे  सबसे  आगे  ।।
अपनी मेहनत के बल  पर  सबसे  लोहा  मनवाए  हो  ।।

रोजी रोटी   के  साधन   सब  छिने  जा   रहे  हैं  तुमसे  ।
चिंता और घबराहट के घन  घेर  रहे  हैं  चहुँ  दिश  से  ।।
आँसू सूख गए आंखों से तुम दिखते  कुछ  घबराए  हो  ।। **

- रामचन्दर '' आजाद ''

   टी. जी. टी. ( हिन्दी )
   जवाहर नवोदय विद्यालय 






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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  

( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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