12.6.20

कवि रामचन्दर की कविता - '' लड़ते हैं भाई - भाई ''












लड़ते हैं भाई - भाई

उनके मिज़ाज हो गए हैं गैर  की  तरह  ।
आँखे जो रूबरू  हुई  तो  गैर की  तरह ।।

बंटकर भी बँटखरे से  रह रहे हैं सङ्ग में।
टकरा  रहे हैं  रोज- रोज, गैर की  तरह।।

कोई दिवालिया तो कोई  गबन कर रहे ।
सब लूट  रहे हैं वतन  को गैर की तरह।।

बेबस व  बेसहारा हुआ   आम  आदमी ।
अपने भी देखते हैं  उसे गैर की  तरह ।।

खुदगर्ज़ ज़माने से हम आजाद न  हुए ।
लड़ते हैं भाई भाई आज गैर की  तरह ।। **




      - रामचन्दर 










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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई

 माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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