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27.2.20

मन पठार हुए
















( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक नदी कोलाहल '' से लिया गया है )

मन पठार हुए

भीड़ है 
पर 
गीत एकाकी |

हैं खड़ी बहसें 
उठाये हाथ ,
तर्क घेरे हैं 
सभी फुटपाथ ;

मंच पर 
वक्तव्य बाक़ी |

मन पठार हुए 
न झरते आह ,
बुझी आँखें 
अब न छूती दाह ;

निरर्थक 
गंध काया की |

  - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867
  

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