19.2.20

दुर्गन्धों डूबी सुगंधियाँ















( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक नदी कोलाहल '' से लिया गया है )


दुर्गन्धों डूबी सुगंधियाँ 

शीश तगाड़ी ,
बिना दिहाड़ी ,
सम्मुख ऊँची खड़ी पहाड़ी !

पस्त हौसले ,
त्रस्त धौंस ले ,
बिखर रहे हैं 
बने घौंसले ;

किसको कोसें ,
किसको पोसें ,
अपनी मूंछें, अपनी दाढ़ी !

सबने चाहा ,
सागर थाहा ,
पर मंसूबा 
था अनब्याहा ;

जैसे इंजन 
छोड़ बढ़ गया ,
पीछे खड़ी रह गई गाड़ी !

मुकुट जरी के ,
माथे टीके ,
कुर्सी बैठे 
लाट - सरीखे ;

सुविधाएँ 
द्वारे दासी - सी ,
नंगे - भूखे - रुग्ण पिछाड़ी !
दुरभिसंधियाँ ,
कुहदबंदियाँ ,
दुर्गन्धों
डूबीं सुगंधियाँ ;

ये वहशी 
दरिन्दगी उफ़ - उफ़ ,
साधो कत्तल , मारो - फाड़ी !

        - श्रीकृष्ण शर्मा 

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  www.shrikrishnasharma.com

 संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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