10.2.20

कुमार रवीन्द्र - ' एक नदी कोलाहल ' : भीतर भी - बाहर भी ( भाग - 1 )


       ( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक नदी कोलाहल '' से लिया गया है )

कुमार रवीन्द्र - ' एक नदी कोलाहल ' : भीतर भी - बाहर भी 


श्रीकृष्ण शर्मा नवगीत - प्रसंग में एक बहुश्रुत एवं प्रतिष्ठित नाम है | 1947 - 48 में शुरू हुई इस वरिष्ठ कृति की कविताई उनके नवगीत - संग्रह   ' एक नदी कोलाहल '  यानी प्रस्तुति संग्रह में अपने परिपाक को प्राप्त करती है , इसमें कोई संदेह नहीं है | कवि श्रीकृष्ण शर्मा की कविता - यात्रा दो स्पष्ट पड़ावों में विभाजित है - एक है 1952 से लेकर 1961 तक का कालखण्ड , जिसमें उनकी सर्जनात्मकता युवा अनुभवों एवं अनुभूतियों के चरम - बिन्दु को छूती है | बेतवा नदी के तट पर बसे सिलपुरी गाँव के आस - पास की सम्मोहक प्राकृतिक उठान के विस्तार की भूमिका बन ही रही थी कि अचानक एक अनचीता व्यवधान आ गया और यह युवा किन्तु परिपक्व चिन्तनशील कवि हिन्दी गीतिकविता के एक प्रखर धूमकेतु के समान एकाएक ही काव्य - अंतरिक्ष से तिरोहित हो गया | और फिर एक लम्बा मौन और विराम | तेईस वर्षों के अंतराल के बाद 1984 में एक प्रौढ़ हुआ अनुभव - परीपक्व मन लिए कवि की वापसी हुई , जिसमें व्यक्तिगत पीड़ा और समष्टिगत मोहभंग की संज्ञाएँ प्रखर हो गयीं थीं | यह वापसी धूमकेतु की तरह भी नहीं थीं , अपितु उस नक्षत्र के समान थी , जो अपनी जाग्रत जोत से ग्रहों - उपग्रहों को प्रकाशित करता है | इसके बाद भी सत्रह वर्षों के पत्र - पत्रिकाओं में स्फुट प्रकाशनोपरांत ही उनका पहला कविता - संग्रह   ' अक्षरों के सेतु '   सन 2001 में आ पाया , जिसका एक छोर बीसवीं सदी के मध्य में था , और दूसरा छोर इक्कीसवीं सदी के तुरन्त प्रारम्भ में | सन 2006 के प्रारम्भ में उनका दूसरा कविता - संग्रह  ' फागुन के हस्ताक्षर '  आया , जिसमें 1954 से 1965 तक के उनके लेखन - पड़ाव की चवालीस गीतिकविताएं और  ' अम्मा '  शीर्षक एक दीर्घ शोकान्तिका सम्मिलित हुई | और अब 1964 से 1995 के मध्य उपजी सैंतालिस नवगीतों की यह समृद्ध वीथिका , जिसका बीच से गुजरने , उनसे बतियाने और सम्मोहित होने का सुयोग मुझे प्राप्त हुआ है | निसंदेह नवगीत के विविध आयामों की सभी भंगिमाएँ इन रचनाओं में उपस्थित हैं |  ' फागुन के हस्ताक्षर '  में एक युवा कवि - मन की आतुर जिज्ञासाएँ थीं , जो  ' एक नदी कोलाहल '  में एक प्रौढ चोटिल भावानुभूति में बदल गयी हैं |  ' फागुन के हस्ताक्षर '  और  ' एक नदी कोलाहल '  का एक साथ आना , कवि श्रीकृष्ण शर्मा की काव्य - यात्रा के दो पड़ावों का एक - साथ होना - यह अपने - आप में एक विडम्बना तो है ही , एक दृष्टि से , यह एक उपलब्धि भी है | पूर्वापर अनुभूतियों का यह समागम दुर्लभ है और कवि की समग्र रचनाधर्मिता के अवलोकन - विवेचन की दृष्टि से सुविधाजनक और उपयोगी भी है |
          प्रसिद्ध दर्शनविद एवं कवि - चिन्तक डॉ. देवराज ने संसक्ति और प्रतिबद्धता को श्रेष्ठ कविता की दो प्रमुख वृत्तियाँ माना है | उन्हें परिभाषित करते हुए वे कहते हैं -
          '' संसक्ति से मैं समझता हूँ जीवन और उसके मूल्यों में गहरी जीवन्त अभिरुचि ; प्रतिबद्धता से मतलब है देखे हुए मूल्यों के प्रभावपूर्ण उल्लेख और उन्हें सामाजिकों अथवा सहधर्मियों के द्वारा ग्राह्य बनाने के लिए बेचैनी ... | '
          और - 
          जहाँ लेखक की संसक्ति उसके कृतित्व  को आतंरिक ऐक्य देती है , वहाँ प्रतिबद्धता का आवेग उसे अधिक सृजनशील बनाता है और उसकी रचना को अधिक शक्तिपूर्ण | ' 
                                       ( निवेदन , ' इतिहास पुरुष ' , पृष्ठ - 6 - 7 , प्रकाशन वर्ष - 1965 )
          श्रीयुत श्रीकृष्ण शर्मा के प्रस्तुत संकलन में दोनों वृत्तियाँ अपनी पूरी प्रखरता के साथ विद्यमान है | संग्रह के प्रारम्भ में अपने वक्तव्य में कवि ने स्वयं भी परोक्ष रूप से इन दोनों वृत्तियों की इन गीतों में उपस्थिति की ओर इशारा करते हुए कहा है -
          ' नवगीतकार अपने परिवेशगत और विश्व - पटल पर घटित घटनाओं से उत्पन्न मनोदशाओं को अनुभूति और संवेदना के स्तर पर अपने गीत की अन्तर्वस्तु बनाता है तथा उसे यथार्थ की भूमि पर प्रतिष्ठापित कर लोक - संवेदना , जातीय संस्कार , युगीन सन्दर्भ , सौन्दर्य - बोध , मूल्य - बोध , जीवन के प्रति आस्था और लोक - मंगल की भावना से जोड़ता है | उसका अनुभूतिजन्य चिन्तन एवं उसके आत्मिक रागात्मक भावों की आवेगमयी तीव्रता कल्पना से सहज सौन्दर्य - सम्पन्न हो कर छांदसिक कलेवर में ढलती और गीतों का स्वरुप ग्रहण करती है | उसके केन्द्र में जीवन का कोई राग या बोध होता है , जिसे वह अपने प्रगतिशील सोच और सतत अभ्यास द्वारा नयी अर्थवत्ता प्रदान करता है तथा ह्रदय और बुद्धि के संतुलन द्वारा प्रभावी बनाता है | ' 
          संग्रह की  ' पीठिका '  में नवगीत की यह व्याख्या कवि की अपनी सृजन - प्रक्रिया की व्याख्या भी हो सकती है | मेरी राय में , नवगीत की कवि - मन में उदभावना की इससे अच्छी व्याख्या हो भी नहीं सकती | इस दृष्टि से यह  ' पीठिका '  इस संग्रह की एक उपलब्धि है | इन सभी गीतों में ----

                                                                           ( क्रमशः अगले भाग में )

                    - कुमार रवीन्द्र 

----------------------------------------------------------------


संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिला

माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867


        

No comments:

Post a comment

आपको यह पढ़ कर कैसा लगा | कृपया अपने विचार नीचे दिए हुए Enter your Comment में लिख कर प्रोत्साहित करने की कृपा करें | धन्यवाद |