20.2.20

नरक जगा आँखों














( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक नदी कोलाहल '' से लिया गया है )


नरक जगा आँखों 

सम्मुख चली है नदी नेह की ,
सम्मुख है अब सदी देह की |

करुणा है कीचड़ में लथपथ ,
संवेदन की टूटी है गत ,
है लंगड़ों के सम्मुख परबत ,
दीवारें गिर रही गेह की ,
हुई तेजाबी बूंद मेह  की |

भावुकता को लकवा मारा ,
अपनेपन पर चला दुधारा ,
चेतन अब जड़ता से हारा ,
मिटी उर्वरा शक्ति ' लेह ' की ,
माटी तक हो गयी रेह की |

छल - बल के हाथों विजय - ध्वज ,
लिखा खा रहा काला कगज ,
क्या पागलपन , क्या अब पद - रज ?
नरक जगा आँखों अदेह की ,
सम्मुख है अब सदी देह की |

- श्रीकृष्ण शर्मा 
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www.shrikrishnasharma.com


संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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