23.2.20

पवन शर्मा की कहानी - '' दावानल '' - ( भाग - 1 )



( प्रस्तुत कहानी – पवन शर्मा की पुस्तक – ‘ ये शहर है , साहब ’ से ली गई है )


                                दावानल

सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि मैं समझ ही नहीं पाया |
          नियुक्ति - पत्र मिलते ही मैं तीसरे दिन शहर छोड़ छोटे - से गाँव में आ गया - मास्टरी के लिए | मित्रों ने सलाह दी , क्या करेगा गाँव में रह कर ... गाँव के लोग गाँव छोड़कर शहर की ओर भाग रहे हैं और तू है कि शहर छोड़ गाँव भाग रहा है , भविष्य चौपट हो जायेगा ... आदि - आदि |
          घर के लोगों में भी यही प्रतिक्रियाएँ थीं मेरे लिए | पर मैं अपनी जिद पर अड़ा रहा |
          शुरू - शुरू में मुझे गाँव का माहौल रास नहीं आया , किन्तु जैसे - जैसे गाँव के लोगों से परिचय का दायरा बढ़ा , वैसे - वैसे गाँव और गाँव के लोग मेरे मन में समाते गए | गाँव का कोई बच्चा हो या बुजुर्ग , सभी के लिए मैं  ' मास्साब '  हो गया ... एक अपनत्व भरा सम्बोधन |
          गाँव की बसाहट बहुत सरल थी |
          गाँव के बीच में एक नाला था , जो गाँव को सरपंची मोहल्ला और गोंडी मोहल्ला में बाँटता था |
          सरपंची मोहल्ले में केशव सरपंच का मकान था , इसलिए इस मोहल्ले का नाम सरपंची मोहल्ला पड़ा | इसी मोहल्ले में फॉरेस्ट रेंजर मिश्राजी , फारेस्टर काशीराम , फारेस्ट गार्ड भूपतसिंग अपने - अपने परिवार के साथ सरकारी क्वाटरों में रहते थे |गाँव के सरकारी अस्पताल का कम्पाउंडर तथा नर्स भी इसी मोहल्ले में रहते थे | इस तरफ से ही तहसील के लिए पक्की सड़क जाती थी | इसी तरफ दो - तीन होटल भी थे | इसी तरफ सप्ताह में एक दिन  '  हाट '  भी लगती थी |
          पहले , दिन में तीन सरकारी बसें चलती थीं | अब प्राइवेट टैक्सियाँ भी चलने लगी हैं |
          पहले हफ़्तों - हफ़्तों पुलिस का एक भी सिपाही नजर नहीं आता था , किन्तु अब रोज ही तहसील से आया एकाध सिपाही दिनभर मटरगश्ती करता या महुए की कच्ची दारु चढ़ाए जेब गर्म करने के लिए मुर्गा फँसता नजर आ जाता था |
          सरपंच के बाजूवाले कमरे में मैं रहता था |
          सरपंच ने अपने मकान के सामने वाले कमरे में किराने वाली दुकान डाल रखी थी | शहर से सामान लाता और गाँव के लोगों को ड्योढ़े - दूने दामों पर बेचता |
          दूसरी तरफ गोंडी मोहल्ला में निम्न तबके के लोग रहते हैं , जिसके कारण सरपंची मोहल्ले के लोग उसे गाँव का उपेक्षित भाग मानते हैं |
          इस मोहल्ले में घर जरा दूर - दूर कच्ची मिट्टी के बने थे | घरों की छाजन देशी खपरों की थी | हर घर के सामने परछी बनी होती | परछी के  सामने भुट्टे रखने का  'जैरा '  होता | ढोर - डंगरों का स्थान घर के पीछे होता और वहीँ उनके खाने - पीने के लिए लकड़ी का नाद - डोंगा होता | घरों के पीछे ही लोगों के खेत थे |   
          इस मोहल्ले की औरतें और लड़कियाँ अपनी सुन्दरता बढ़ाने के लिए माथे , कनपटी तथा बाँह पर गोदना गुद्वातीं  और हँसली , कर्णफूल , छन्नी , तोड़ा , उमेठा आदि विशेष पर्वों पर पहनतीं |
          इस मोहल्ले के दूसरी तरफ जंगल - ही - जंगल था | साल , सागौन , बीजा , महुआ , तेंदू आदि के पेड़ों से अटा जंगल | जंगल के और आगे ऊँची पहाड़ी |
          इसी गोड़ी मोहल्ले में मनोहर रहता |
          मनोहर मेरी कहानी का नायक है | अन्य गँवई युवकों की तरह नहीं है मेरी कहानी का नायक | वह अक्सर मुझसे मिलता रहता है | मेरे घर भी आता रहता है |
          '' मास्साब मुझे भी आपके जैसे बनना है ... बताओ , मुझे क्या करना पड़ेगा ? ''  एक दिन मनोहर ने कहा | मैं चौंक गया | 
          '' कम - से - कम बारहवीं पास होना जरुरी है , उसके बाद ही बन सकेगा | ''  मैं हँसा, फिर उलाहना दिया उसे , '' बारहवीं तो पास कर नहीं पाया | सपना देखता है मेरे जैसे बनने का | ''
          सुनकर वह चुप रह गया |
          '' फिर कैसे बनूँगा ? ''  थोड़ी देर चुप रहने के बाद उसने पूछा |
          '' खूब मेहनत करो ... पढ़ो - लिखो | ''  मैने उसे समझाया |
          वह फिर चुप रहा - जैसे कुछ सोच रहा है |
          '' मजदूरी करूँ या पढाई करूँ - ये बात समझ में नहीं आती | ''  उसने कहा |
          अबकी बार मैं चुप था |
          कुछ दिन बाद मुझे ख़बर लगी कि मनोहर ने फारेस्ट गार्ड भूपतसिंह तथा कम्पाउंडर को अपने दो - तीन साथियों के साथ मिलकर मारा है | दोनों को काफी चोंट आईं हैं | 
          '' तूने क्यों मारा उनको ? ''  जब वह मिला , तब मैनें  पूछा |
          वह चुप रहकर हाथों की उँगलियाँ चटकता रहा |
          '' बताता क्यों नहीं ? ''  मैं खीझ उठा |
          '' उन्होंने किसना की बहन को कुछ कहा था | '' वह बोला |
          '' क्या कहा था ? ''
          '' कहा ही नहीं , बल्कि हाथ भी पकड़ लिया था | ''  वह लम्बी - लम्बी साँस लेने लगा , '' वह हाथ छुड़ाकर नहीं भागती तो ... ''  मनोहर ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी और अपने दोनों हाथों की हथेलियाँ आपस में रगड़ने लगा |
          '' उन्होंने पुलिस में रिपोर्ट तो नहीं की ? '' मैंने पूछा |
          '' कैसे करेंगे ... गलती तो उन्हीं की थी | ''
          हम दोनों के बीच थोड़ी देर के लिए ख़ामोशी पसर गई |
          '' मैं महसूस कर रहा हूँ कि तेरे भीतर का गुस्सा बहुत तेज है | ''  मैनें पसरी हुई ख़ामोशी तोड़ी |
          '' तो क्या करूँ ? ''
          '' उस पर काबू रखना सीख | ''
          '' कैसे रखूँ | ''  वह बिफरने लगा , '' खून खौलता है मेरा , जब हमारे मोहल्ले के मजदूरों को  मजूरी बीस की जगह दस मिलती है | ''
          मैं सकते में आ गया |
          '' हमारे मोहल्ले के लोग न हों तो सालों का काम भी नहीं चल सकता | '' वह उठता हुआ बोला ,  '' अब आप ही बताओ , ये जुलुम है कि नहीं ? ''
          मैं निरुत्तर था |
          थोड़ी देर बाद वह चला गया |
          मैने महसूस किया कि मनोहर बेहद तुनकमिजाज , ठिठ , जिद्दी , जरा - जरा - सी बात पर भड़क उठनेवाला , बात - बात पर मरने - मारने पर उतारू हो जानेवाला है | यह उसके लिए अत्यन्त खतरनाक है |
          एक दिन वह सुबह - सुबह आ धमका | मैं स्कूल जाने की तैयारी कर रहा था |
          '' अरे ! कैसे आया ? '' मुझे आश्चर्य हुआ |
          '' आप कहते हैं कि गुस्से पर काबू रखना सीख , पर कैसे रखूँ ? ... बताओ ? ''   उसकी आवाज तेज थी |
          '' क्या हुआ ? ''
          '' होगा क्या ... वे लोग जंगल - के - जंगल काट रहे हैं | साल , सागौन , सब - कुछ | ''
          कौन लोग ? '' पूछते हुए मेरे माथे पर बल पड़ गए |
          '' वही साले भूपतसिंह , काशीनाथ और उसके आदमी | ''
          '' क्यों ? ''
          '' शहर ले जाकर बेचते हैं | '' वह हाँफने लगा |
          '' सचमुच , चिन्तावाली बात है | '' मैंने कहा |
          कुछ और जानते हैं इनके बारे में ? '' मनोहर ने मेरे  चेहरे पर अपनी नजरें जमा दीं |
          '' क्या ? ''  
                    ( आगे अगले भाग में )

                      - पवन शर्मा


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पवन शर्मा ( कवि , लघुकथाकार , कहानीकार )

पता
श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट  विद्यालय ,
जुन्नारदेव  , जिला - छिन्दवाड़ा ( म.प्र.) 480551
फो. नं. - 9425837079 .
ईमेल – pawansharma7079@gmail.com

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