26.4.20

गुणशेखर की कविता - '' तुम्हारे जाने के बाद ''









तुम्हारे जाने के बाद

'तुम उठाईगीरों के सरदार हो
अलग कर दूंगा तो ढीली हो जाएगी धोती।'
पिता जी कहते रहते थे मुसलसल

सच में अलग होने के बाद
कई -कई बार तुम्हारी ढीली काँच को
पिताजी को बांधते भी देखा था हमने
पिता से आँख बचाकर स्वयं मैंने भी बाँधी है
वही काँच कई-कई बार
पर तुम कभी एक में न लौटे
इस पर कहा करती थी माँ
' मरने और बँटवारे से बचा ही कौन है '
तुम अलग होने पर भी सुधरे कब
तुम्हारे पास नशा था झौवा भर का
और काम रत्ती भर भी नहीं
बीड़ी,गाँजा-भाँग,धतूरा,अफीम और
अफीम के मँहगी हो जाने पर डोडा का चूरा
घर फिर भी चलता था तख्तों पर ताश खेलते हुए
मजूरी पर फ़सल बोती-काटती रहीं गिलहरियाँ
और तुम चुपड़ी खाते रहे
कोई ज़िम्मेदारी भी समझी तुमने कभी ?
तुमसे पूछना है कहाँ से लाते थे इतना शुकूँ
इतनी मौज़ कि कभी शुष्क ही न हुई जीवन यात्रा
तुम्हारे लिए बहुत कुछ करना चाहता रहा
तुम्हारे धारोष्ण फेन वाले दूधिया वात्सल्य के बदले
जैसे बीबी-बच्चों की चोरी-चोरी मनीऑर्डर
और भी बहुत कुछ पर
तुम्हारे दिए कर्ज़ न कभी पिता चुका पाए न मैं
लड़ने का अन्दाज़ भी निराला था तुम्हारा
' भाई की धान खाके हो जाएँगे कोढ़ी '
तुम्हारे भाई यानी मेरे पिता
पता नहीं कहाँ से लाए थे वह धान्य
शायद कच्ची और पक्की से,गाँजे की चिलम से,
डोडे से,धतूरे से
तुम्हारे जाने के बाद कोई नहीं है माँगने वाला
वह हिस्सा जो तुमने कभी लिया ही नहीं
मुर्दा शांति पसरी रहती है पूरे घर में
खासकर तुम्हारे वाले हिस्से में मेरे पितृव्य! **

   

     - गुणशेखर 










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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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