17.4.20

दुष्काल : 1979


















( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक अक्षर और '' से लिया गया है )

दुष्काल : 1979

पता नहीं क्यों 
अब की 
रसमय जलधर नहीं झरे ?
          जीवित हुई न घास ,
          ताल मुँह फाड़े पड़े रहे ,
          लिए हुए आकाश 
          पेड़ धरती में गड़े रहे ,
लावारिस लाश की तरह से 
खेत पड़े हैं मरे |
पता नहीं क्यों ...
          जूड़ी  चढ़ी बयार ,
          धूल के भँवर ,
          भाप नदियाँ ,
          दृश्यों - प्यासी धरा ,
          उपासी निर्जल चौहदियाँ ,
फाँसी पाये कैदी - जैसी 
दहशत से सब भरे |
पता नहीं क्यों ...
          बाढ़ न आयी ,
          गिरी न बिजली ,
          पर डैन टूटे ,
          हँसी ख़ुशी से रचे बचे सब 
          पर गूँगे छुटे ,
बदहवास अब शमशानों में 
अपनों तक से डरें  | **

             - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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