10.4.20

आँसू




( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है )


आँसू 

आँसू तो आँसू हैं ,
निकल ही पड़ते हैं 

     वैसे ये 
     पानी हैं ,
     फिर भी ये मानी हैं ,
तुच्छ समझने पर ,
भीतर तक गड़ते हैं |
     आँसू तो आँसू हैं ,
     निकल ही पड़ते हैं |

     मोती हैं ,
     फूल हैं ,
     इन्द्रधनुष कहीं ,
     कहीं धूल हैं ,
दुखों को सहते हैं ,
सुख से झगड़ते हैं ,
     आँसू तो आँसू हैं ,
     निकल ही पड़ते हैं | **

     - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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