8.1.20

दिन कुम्हलाया


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा द्वारा 1958 में लिखित गीत, गीत - संग्रह - '' फागुन के हस्ताक्षर '' से लिया गया है )















दिन कुम्हलाया 

धूप ढल रही , दिन कुम्हलाया ,
सूरज का चेहरा अँधराया |

धुंधलाती आँखों के आगे ,
उजियारे ने मुँह लटकाया |

ऐसा गिरा - गिरा - सा जी है ,
जैसे कोई पहाड़ उठाया |

चुप्पी बैठी है चौराहे ,
सड़कों सूनापन तिर आया |

रखा हुआ था जो कि ताख में ,
यादों ने वह दिया जलाया |

अँधियारा इस तरह बढ़ रहा ,
जैसे महंगाई की काया | 

दूर - दूर तक नजर ना आती ,
उम्मीदों की उजली छाया |

कितना कठिन समय आया है ,
अपनापन तक बना पराया |

भावों में तो गरमाहट है ,
पर मौसम कितना ठंडाया ?

ऐसे में मन किसे पुकारे ,
पास न जब अपना भी साया |

            - श्रीकृष्ण शर्मा
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867
  

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