4.1.20

चाँदनी की देह


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के गीत - संग्रह - '' फागुन के हस्ताक्षर '' से लिया गया है )














चाँदनी की देह

भोर का पीकर जहर अब चाँदनी की 
देह नीली पड़ रही है |

टल गया है वह मुहूरत , जबकि पड़तीं 
भाँवरें कुण्ठित सुखों की 
इसलिए ही चुप हुआ है झिल्लियों के घर 
पुरोहित मंत्र पढ़ता ;

क्या करे अभिनीत कोई और अभिनय 
जब किसी ने है गिरा दी ,
मधुर सपनों की सुघर रंगस्थली के 
सुखद दृश्यों पर यवनिका ;

घट गयी घटना यहाँ पर जो अचानक ,
है उसी की ओस साक्षी ,
और जिसकी याद करके साँस लम्बी 
अब लगीं चलने हवा की ;

रात के अपराध पर अब तारिकाएँ 
आत्महत्या कर रही हैं |

भोर का पीकर जहर अब चाँदनी की 
देह नीली पड़ रही है |

- श्रीकृष्ण शर्मा 
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 www.shrikrishnasharma.com

संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867





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