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13.1.20

अम्मा की याद में





















( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के गीत - संग्रह - '' फागुन के हस्ताक्षर '' से लिया गया है )

अम्मा की याद में 

चले गये सब चाचा के सँग ,
बचपन के चमकीले नव रंग |
पर अपनी किस्मत ले फूटी ,
अम्मा नहीं टूट कर टूटी |
हम भाई व बहिन की खातिर 
हर विपदा को करती झूठी ||

      न थीं चप्पलें , पाँव बिंवाई ,
      सूनी आँखें , मुख पर झाँई |
      चिन्ताओं से टूटी काया ,
      ढलती उम्र , थकान गहराई ||

धन - सम्पत्ति न कोई पूँजी ,
मेहनत छोड़ , न आशा दूजी |
भूखे - अधभूखे रह जाना ,
कतर - ब्यौंत कर खर्च चलाना |
दुःख अपने , अपने अभाव थे ,
तकलीफ़ों के क्या बनाव थे ?

      फिर भी अम्मा धीरज धर कर ,
      हमें जिलाये थी मर - मर कर |
      चिन्ताओं का छोर नहीं था ,
      ध्रुव - रातों का भोर नहीं था ||

रोज जठर की आग बुझाना ,
तन ढंकना , ओढ़ना - बिछाना |
घर - आयों की खातिर करना ,
सामाजिक व्यवहार निभाना |
मुझे पढ़ा कर योग्य बनाना ,
बिटिया का भी ब्याह रचाना ||

      बीमारी या आधी - व्याधी ,
      खर्चे लम्बे , चादर आधी |
      लेकिन हाथ नहीं फैलाया ,
      चुप - चुप सारा बोझ उठाया ||

अपनी अम्मा धुनी बहुत थी ,
पढ़ी न थी , पर गुनी बहुत थी |
घर - बाहर की जग - जहान की 
बातें देखी - सुनी बहुत थीं ||
अनुभव , दूरंदेश समझ थी ,
स्वाभिमानिनी , निडर , खरज थी ||

      मुश्किल से ना हारी खायी ,
      कामों में फुर्ती सुघरायी ;
      लीपा - पोती , चौका - बासन ,
      किस्से , गीत , ख़ुशी के प्राशन ||

समय पड़े पर आस - पास के ,
बुरे वक्त में साथ निभाना |
हारी बीमारी में सेवा ,
हिम्मत देना , धीर बँधाना |
अम्मा से सबको थी हिम्मत ,
हिम्मत से अम्मा को हिम्मत ||

      मैं छह का था , बहिन तीन की ,
      जब गुजरे थे चाचा अपने |
      सूत कातकर , बोर बनाकर ,
      अम्मा पाल रही थी सपने ||

पर इसमें गुजरान न होती ,
सोच - फिकर में रातें खोती |
आख़िर अपना मन पक्का कर ,
अम्मा निकली घर से बाहर |
सदगृहस्थ के घर में खाना ,
जाकर दोनों वक्त बनाना |
भले नौकरी , नहीं गिला था ,
आमद का नव स्रोत मिला था ||

      बड़े अँधेरे अम्मा उठती ,
      कामों को निबटाने जुटती |
      नहा और धो पानी भरती ,
      बहिना झाड़ू - पौंछा करती |

इसी बीच रोटियाँ बनाकर ,
खिला - पिला कर जाती अम्मा |
दुपहर एक - डेढ़ घंटे , फिर ,
आठ बजे तक आती अम्मा |
यों कडवे दिन बीत रहे थे ,
किसी तरह हम जीत रहे थे ||

      सन पचास जैसे ही आया ,
      सत्रह में दसवीं कर पाया |
      हाथ हुए बहिना के पीले ,
      घिर आये बादल करूनीले |
      बहिन गयी , ले गयी हँसी सब ,
      ममता लोहा बन पायी कब ?

गुजर रहे थे दिन ऐसे ही ,
पर खटती अम्मा वैसे ही |
अब मुझको अम्मा की चिन्ता ,
अम्मा को चिन्ता थी मेरी |
दुःख सहने में बज्जर छाती ,
पर गलती बर्फ़ीली ढेरी ||

      इसी बीच बारहवीं कर ली ,
      किन्तु नौकरी  ने न ख़बर ली |
      हाथ - पैर मारे बहुतेरे ,
      नहीं भाग्य ने पर दृग फेरे |
     औरों ने भी ज़ोर लगाया ,

पर न भँवर से बाहर आया |
उफ़ , ये कैसी लाचारी थी ,
कोशिश क़िस्मत से हारी थी ||
मैं उसका भावी सपना था ,
पर निकला सपना - सा झूठा |
समझी थी तम में उजियारा ,
पर मैं निकला तारा  टूटा ||

      हे विधवा , हर पग असफलता ,
      हर पल विक्षत होती क्षमता |
      यह सागर क्या पार न होगा ,
      निकट सुबह का द्वार न होगा ?

इसी हताशा ने सब तोड़ा ,
अम्मा ने सबसे मुँह मोड़ा |
सदी बीसवीं का बावन सन 
द्विबिस नवम्बर स्वर्गारोहण |
रहा देखता मैं विपिन्न मन ,
बिखर गया सब होकर कण - कण ||

      अम्मा ने समझा था आशा ,
      मुझे सहारा अच्छा - खासा |
      पर मैं दे न सका पलभर सुख ,
      देता रहा सिर्फ़ चिन्ता - दुःख ||

खटते - खटते बीत गया सब ,
भरते - भरते रीत गया सब |
पर ज्यों - का - त्यों था अँधियारा ,
सिमटा नहीं गर्दिशी पारा |
तप - तपकर हर साँस गुजारी ,
आँसू पर खारी - के खारी ||

      एक न इच्छा पूर्ण कर सका ,
      सच न कर सका सपना कोई |
      मैं वसंत बनकर न हँस सका ,
      जब मुझ पतझर पर तू रोयी ||

लगा कि मैं अयोग्य - अक्षम हूँ ,
हतचेतन अतिक्रमिक क़दम हूँ |
मेरा होना भी क्या होना ?
व्यर्थ निरर्थक लघुतम बौना ||

      आज न तू , पर सुख का क्षण है ,
      विगत समय ज्यों नीराजन है |
      तेरे आशीषों का फल , जो 
      मरुथल ही अब नन्दनवन है ||

           - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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