2.1.20

आकांक्षा


( 1965 में रचित कविता , कवि श्रीकृष्ण शर्मा के काव्य संग्रह - '' अक्षरों के सेतु '' से ली गई है )


आकांक्षा

मैंने 
कभी चाहा था 
कि चरणों पर धर सकूँ तुम्हारे 
हाथों से उतार कर 
- आकाश |

पर क्या कहूँ 
नियति के इस निष्ठुर व्यंग को ?

कि
जब थीं तुम ,
ख़ाली थे मेरे हाथ |

और आज 
जब सारा आकाश है हाथों में मेरे 
- तुम जा चुकी हो !

        - श्रीकृष्ण शर्मा 
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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867 

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