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29.1.21

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का नवगीत - " होरी - सा बुझा हुआ बैठा "

 यह नवगीत , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " एक नदी कोलाहल  " ( नवगीत - संग्रह ) से लिया गया है -











होरी – सा बुझा हुआ बैठा

 

भीड़ में मिले थे हम दोनों ,

कह सके नहीं जो था कहना !

फिर एक बार जो बिछुड़े तो ,

खो गया कहीं मन का लहना !!

 

फिर दर्द लिये वह बिछुड़न का ,

आधी साँसों से राह चले !

आशाओं के बादल पिघले ,

वेदना – व्यथित अँधियार पले !!

 

रंगों ने चाहा बहलाना ,

रूपों ने चाहा उलझाना !

पर बाबर – जैसा रहा मुझे ,

फिर समरकन्द औ’ फरगाना !!

 

इच्छाएँ सारी ज़िबह हुई ,

सब सपने भुने काढ़ावों में !

होरी – सा बुझा हुआ बैठा ,

तुम बिना न आग अलावों में !! **


                      - श्रीकृष्ण शर्मा 


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.


2 comments:

  1. बहुत - बहुत आभारी हूँ ,कि आपको ये रचना बहुत पसंद आई आदरणीय शास्त्री जी | आपसे अनुरोध है कि आप यदि इस ब्लॉग में अपनी अनमोल रचनाएँ भेजें तो हम सभी को आपकी रचनाएँ पढ़ने का अवसर प्राप्त हो सकेगा |

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