Followers

6.12.20

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का नवगीत - " झील रात की "

 यह नवगीत , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " अँधेरा बढ़ रहा है "  ( नवगीत - संग्रह ) से लिया गया है -















झील रात की

 

साँझ – सुबह के मध्य अवस्थित झील रात की ,

भरी हुई है अँधियारे से |

 

नीली – नीली लहर नींद की उठती - गिरतीं ,

अवचेतन मन की कितनी ही नावें तिरतीं ,

कुण्ठाओं के कमल खिले हैं

सपनों जैसे |

      साँझ – सुबह के मध्य अवस्थित झील रात की ,

      भरी हुई है अँधियारे से |

 

इसी झील के तट पर पेड़ गगन है वट का ,

काला बादल चमगादड़ – सा उल्टा लटका ,

शंख – सीप नक्षत्र रेत में

हैं पारे – से |

      साँझ – सुबह के मध्य अवस्थित झील रात की ,

      भरी हुई है अँधियारे से |

 

नंगी नहा रहीं प्रकाश की लाख बेटियाँ ,

तट पर बैठी बाथरूम – गायिका झिल्लियाँ ,

खग चीखे –

वह डूब रहा है चाँद ,

बचा लो

गहरे में से |

      साँझ – सुबह के मध्य अवस्थित झील रात की ,

      भरी हुई है अँधियारे से |  **


                       - श्रीकृष्ण शर्मा 

    

----------------------------------------------------------------------------------------------------


संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.


6 comments:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा सोमवार ( 07-12-2020) को "वसुधा के अंचल पर" (चर्चा अंक- 3908) पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित है।

    "मीना भारद्वाज"

    ReplyDelete
  2. सर्वप्रथम आपने इस नवगीत को इसमें स्थान दिया , इसके लिए बहुत - बहुत धन्यवाद | मैं बिल्कुल इस चर्चा में शामिल होऊँगा |

    ReplyDelete
  3. बहुत - बहुत धन्यवाद , आलोक सिन्हा जी |

    ReplyDelete
  4. बहुत - बहुत धन्यवाद , शान्तनु सान्याल जी |

    ReplyDelete

आपको यह पढ़ कर कैसा लगा | कृपया अपने विचार नीचे दिए हुए Enter your Comment में लिख कर प्रोत्साहित करने की कृपा करें | धन्यवाद |