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11.12.20

कवि देवेन्द्र शर्मा ' इन्द्र ' - “ ते हि नो दिवसाः गताः ” और “ फागुन के हस्ताक्षर ” ( भाग - 4 )

 




“ ते हि नो दिवसाः गताः ”  और “ फागुन के हस्ताक्षर ”


लखनऊ स्थित छोटी विधवा बहन के पारिवारिक योग – क्षेम का 

वहन भी वे तत्पर भाव से करते हैं | जिला छिन्दवाड़ा के अन्तर्गत जुन्नारदेव कस्बे में उन्होंने अपनी स्थायी – आवास व्यवस्था भी कर ली है | इतना ही नहीं 


( भाग - 4 )


चिरंजीव पवन शर्मा , जो एक स्थापित लघुकथाकार और चर्चित कहानीकार भी हैं , के पिता होने का सौभाग्य भी उन्हें प्राप्त है ; किन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि श्रीकृष्ण शर्मा ने इन उपलब्धियों के शिखर तक पहुँचने के लिए कितने आत्म – क्षरण किया है | आधी शताब्दी काव्य – सर्जना की अविराम साधना करने के बाद उनका पहला – पहला कविता संग्रह तब आया था जब कि वे अपने जीवन के 68 वें वर्ष में चल रहे थे | श्रीकृष्ण का प्रथम कविता – संग्रह – ‘ अक्षरों के सेतु ’ , जिसमें प्रकाशित रचनाओं का कलेवर भले ही नई कविता से मिलता – जुलता हो , किन्तु उनकी आत्मा गीतधर्मी और सहज रूप से लय – प्रवाही है | स्वभाव से संकोची और आत्मनिष्ठ होने के कारण वे मध्यप्रदेश जैसे पुरस्कार – प्रवण और उत्सव परायण क्षेत्र में रहकर अचर्चित बने रहे ; भारत भवन में अनेक दशकों से चल रहे साहित्यिक वाजपेय यज्ञों में यदि वे प्राचेतस अध्वर्यु अथवा ऋत्विक या होता की भूमिका में रहे होते तो कहानी कुछ और ही रही होती |

          व्यक्तिगत परिस्थियों की विषमता , अस्वस्थता और दृष्टि – मान्ध के फलस्वरूप श्रीकृष्ण के लेखन में ऐसे दौर भी आते रहे , जब यह आशंका होने लगी कि उनका छन्द – शिल्पी अपने धर्म से परान्ग्मुख न हो गया हो | आशंका औए अवसाद के उन क्षणों में मैंने बार – बार उन्हें यही लिख – लिख कर प्रेरित किया कि वे लिखना बन्द न करें और अपनी पूर्व – लिखित रचनाओं को पत्र – पत्रिकाओं में छपने के लिए भेजतें रहें | मुझे प्रसन्नता है कि उन्होंने मेरे इस सुझाव / प्रस्ताव को हार्दिक रूप से मान्यता भी दी है | मैंने पिछले पाँच – छः वर्षों से ऐसी कोई भी पत्रिका नहीं देखी जिसमें उनकी कविताएँ , गीत अथवा दोहे न छपते रहे हों | मेरी तरह श्रीकृष्ण के दोहाकार का उदय भी बहुत बाद में हुआ | जिन दिनों मैं ‘ सप्तपदी ’ का सम्पादन कर रहा था , उन दिनों उन्होंने मुझे अपने पत्रों में कुछ दोहे लिखे थे , जो मझे कथ्य औए शिल्प के स्तर पर बड़े आधुनिक और संभावनाशील प्रतीत हुए थे | तब उन्हें प्रेरित करने की दृष्टि से मैंने उन्हें अपने लिखे 50 – 60 दोहे लिख भेजे थे एक पत्र के साथ | मेरा यह प्रयोग सफल हुआ और श्रीकृष्ण की रुकी – थकी लेखनी ने बहुत कम समय के भीतर लगभग डेढ़ – दो सौ दोहों की रचना कर डाली | उनके वे दोहे न केवल ‘ सप्तपदी – 5 ’ नामक खण्ड में अपितु ‘ दस्तावेज ’ के दोहा विशेषांक ’और श्री अशोक ‘ अंजुम ’ द्वारा सम्पादित ‘ दोहा दशक – 2 ’ और ‘ नई सदी के प्रतिनिधि दोहाकार ’ आदि समवेत दोहा – संग्रहों में प्रकाशित हुए | ऐसा कहते हुए , मैं यह रेखांकित करना चाहता हूँ कि श्रीकृष्ण शर्मा की सर्जनात्मक प्रतिभा ने ब्रजभाषा और खड़ीं बोली के गीतों के साथ – साथ नई कविता , नव गीत और नये दोहों की जमींन पर समान क्षमता और सफलता के साथ अपनी लेखनी चलायी है | यदि किसी व्यक्ति में नव नवोन्मेषशालिनी प्रतिभा के अंकुर होते हैं तो वे अनुकूल और उचित अवसर मिलने पर प्रस्फुटित और अंकुरित होते ही हैं | श्रीकृष्ण शर्मा की रचित पुष्कल काव्य – परिमाण इस तथ्य का ज्वलन्त प्रमाण है |

          अब कुछ चर्चा प्रस्तुत संग्रह ‘ फागुन के हस्ताक्षर ’ के गीतों पर भी की जाये तो अप्रासंगिक नहीं होगा | जैसा कि पूर्वतः संकेत दिया जा चुका है , मेरी शुरू से ही यह आकांक्षा रही है कि मेरे अपने गीत – संग्रहों के साथ – साथ मेरे उन आत्मीय गीतकार बन्धुओं के संकलन भी समय – समय पर निकलते रहें जिन्होनें विगत आधी शताब्दी में हिन्दी गीत को नये – से – नये आयाम प्रदान करते हुए गीत – रचना की परम्परा को समृद्ध किया है | ...**

( इससे आगे का भाग , भाग – 5 में पढें )   

                                                  - देवेन्द्र शर्मा ' इन्द्र '


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.


  


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