27.10.19

''अँधेरा बढ़ रहा है !''ज्योति गीत ( तीन )

( श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' अँधेरा बढ़ रहा है '' से लिया गया है - )














अँधेरा बढ़ रहा है !

अँधेरा बढ़ रहा है ,
बात क्या डर की ?
रखा है दीप आले में ,
जलाओ तो !
        अँधेरा बढ़ रहा है !

यही है दीप ,
जब सूरज नहीं रहता ,
उजाले की 
      यही तो बाँह गहता है ,
तिमिर के अन्ध सागर में 
सहज मन से 
     यही तो रोशनी की कथा कहता है ,
कि जब सब मस्त सोते 
नींद की बाँहों ,
अकेला 
     रात भर लड़ता ,
            अँधेरों  से ,

तनिक दे स्नेह ,
इसका मन बढ़ाओ तो ! 
        अँधेरा बढ़ रहा है !

बड़ा मुश्किल समय है ,
क्रूर ग्रह घिर कर 
        लगे हैं 
               जिन्दगी को स्याह करने में ,
ख़ुशी के एक पल को छीन 
हर पल में 
       हजारों 
              दहशतों का जहर भरने में ,
पिशाचों - सिरकटों का दौर ,
यह मावस ,
      संभल कर ,
      दीप से दीपक जलाओ तो ,
      बबंडर रोशनी का 
      तुम उठाओ तो !
              अँधेरा बढ़ रहा है !

- श्रीकृष्ण शर्मा

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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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