8.10.20

कवि श्रीकृष्ण शर्मा का नवगीत - " बादल तो आये "

 श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - " एक नदी कोलाहल " से लिया गया है -









बादल तो आये

 

बादल तो आये , पर बिन बरसे ही चले गए |

 

सात – सात दिन तक सावन में

मेघिल झर झरना ,

सच पूछो तो हुआ आज की

पीढ़ी को सपना ;

कत्लेआम वनों का कर , लगता हम छले गये |

बादल तो आये , पर बिन बरसे ही चले गये ||

 

बिगड़ा मौसम का मिजाज ,

गरमाये सूरज जी ,

हावी होती हरीतिमा पर ,

मरुथल की मरजी ,

जहर – बुझी है हवा , कान पेड़ों के मले गये |

बादल तो आये , पर बिन बरसे ही चले गये ||

 

कंकरीट के जंगल उगकर

होने लगे घने ,

अन्धे – तंग गली – कूँचे सब

गन्दे , कींच – सने ;

पाश धूप के तन में धुन्ध – धुएँ के डले गये |

बादल तो आये , पर बिन बरसे ही चले गये ||

 

देहरी को लीप कर सवेरे

रंगोली रचना ,

उत्सव पर मेंहदी व महावर

गीत – नाद – हँसना ;

भाषा – भूषा – संस्कृति के सब गौरव दल गये |

बादल तो आये , पर बिन बरसे ही चले गये ||

 

बाल बिखेरे धूल घुडचढ़ी

अम्बर में करती ,

शोकगीत लिखती हर तितली

तिल – तिल कर मरती ;

शोर बन गया जालिम इतना , सब पग तले गये |

बादल तो आये , पर बिन बरसे ही चले गये ||

 

आतंकित है आज प्रकृति

बढ़ रहे प्रदूषण से ,

पर्यावरण मिट रहा है

पगलाये दूषण से ;

नाश देखता , मनुज मरण – पथ में बढ़ भले गये |

बादल तो आये , पर बिन बरसे ही चले गये || **

                   
  

      - श्रीकृष्ण शर्मा 







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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.


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