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20.10.20

पवन शर्मा की कहानी - " सिगरेट के बुझे हुए टुकड़े " ( भाग - 1 )

यह कहानी पवन शर्मा की पुस्तक - " ये शहर है , साहब ! " से ली गई है -













              सिगरेट के बुझे हुए टुकड़े 

                                                                   ( भाग - 1 )

वो जुलाई की कोई एक रात थी – धीमी – धीमी बौछारों वाली |

          हम लोग टॉकीज से बाहर निकलकर सड़क पर पैदल ही चल पड़े | जब हम पिक्चर देख रहे थे , उस बीच तेज बारिश हो गई थी | अब बारिश बंद है , कितु वातावरण में ठण्डक है | लगभग साढ़े नौ का समय हो रहा है | बारिश की वजह से सड़क के दोनों ओर की दुकानें बन्द हो चुकी हैं | कुछ होटल और पान के ठेले खुले हुए हैं | वहीँ पर रिक्शेवाले अपने रिक्शों को सड़क के किनारे खड़ा करके भीगे हुए खड़े हैं | उनकी आँखें सवारियों को तलाश कर रही हैं |

          “ सिगरेट निकाल | ” साथ चलते नरेश ने मुझसे कहा |

          मैनें शर्ट की जेब से सिगरेट का पैकिट निकालकर नरेश को दे दिया | उसने पैकिट में से एक सिगरेट निकालकर सुलगाई और हलक से ढेर सारा कसैला धुआँ उगल दिया |

          “ तू नहीं लेगा | ”  नरेश ने सिगरेट का पैकिट मुझे लौटते हुए पूछा|

          “ नहीं “ गले में खराश होने लगती है | ”  मैं सिगरेट का पैकिट शर्ट की जेब में रखने के बाद बोला |

          पिक्चर छूटने की वजह से सड़क पर भीड़ है | वातावरण बारिश का था , इसलिए सब जल्दी – से जल्दी घर पहुँचना चाहते थे | हमें कोई जल्दी नहीं थी , अतः हम दोनों टहलते हुए गीली सड़क पर पैदल ही चल रहे थे |

          चौराहा आ गया | चौराहे पर भीड़ नहीं है | अधिकांश दुकानें बंद हैं , जो भी दुकानें खुली हुई हैं , उनमें इक्का – दुक्का लोग बैठे हुए आपस में बतिया रहे हैं | मैनें एक पान ठेले से सिगरेट का एक पैकिट लिया और दाईं ओर जाने वाली सड़क पर नरेश के साथ मुड़ गया | ये सड़क लगभग डेढ़ फर्लांग तक सीधी जाती है , फिर बाईं ओर मुड़ जाती है |  

          हम लोग जरा आगे निकले कि सड़क सूनसान थी | सड़क के किनारे बिजली के खम्भों पर लगे बल्ब जल रहे थे | हम जब किसी बिजली के खम्भे के निकट पहुँचने लगते , तब खम्भे पर जलते बल्ब के प्रकाश में हमारी परछाईयां पीछे की ओर लम्बी से छोटी होती जातीं और जब हम उसके पास से गुजर जाते , तब हमारी परछाईयां सामने की ओर छोटी से लम्बी होती जातीं |

          नरेश चुप है और सिगरेट के कश ले रहा है |

          “ तूने बताया नहीं कि तेरा आना कैसे हुआ ? ” मैंने नरेश से फिर पूछा |

          नरेश ने फिर कोई जवाब नहीं दिया | बस , उसने सिर घुमाकर मेरी ओर देखा |हम बिजली के दो खम्भों के बीच चल रहे थे , इसलिए अँधेरा होने की वजह स्व मैं ये अनुमान नहीं लगा पाया कि उसके चेहरे पर मेरे प्रश्न की क्या प्रतिक्रिया थी ? बावजूद इसके उसने कहा, “तुझसे बहुत दिनों बाद मुलाकात हुई|”

          “ सो तो है | तुझे अचानक सामने पाकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ था|” मैंने कहा |

          अभी हम चौराहे से आधा फर्लांग ही आये हैं | सड़क बारिश से भीगी हुई है | जिसकी वजह से सड़क दूर तक चमक रही है – बिजली के प्रकाश में | सामने से मारुति आ रही है , जिसकी हेड लाइट्स हमारी आँखें चौधियाने लगीं | थोड़ी देर बाद मारुति हमारे सामने से गुजर गई |

          नरेश ने कश लेकर सिगरेट फेंक दी और पैंट की जेब में अपने दोनों हाथ डाल लिए |

          कॉलेज में हम दोनों साथ ही पढ़ते थे | मैं उसके सामने पढ़ाई में हमेशा पीछे रहा | ग्रेजुएशन के बाद नरेश ने एम. एस. – सी. तथा मैंने एम.ए. किया था | फिर हमारी नौकरी के लिए भागदौड़ शुरू हुई | दो वर्ष तक हमें कहीं भी सफलता नहीं मिली | अपने पिताजी के आकस्मिक निधन के बाद मैं आदिवासी विकास विभाग में क्लर्क हो गया | ये बात लगभग चार वर्ष पहले की है | तब नरेश ने गाँव नहीं छोड़ा था | अब भी गाँव में ही है |

          किन्तु , आज चार वर्ष के बाद मेरी नरेश से मुलाकात हुई है | सुबह नरेश मेरे पास आया और आते ही बोला , “ पहचाना मुझे ? ” तब एकाएक पहचानने में मुझे दिक्कत हुई , पर थोड़ी देर बाद मैं उसे पहचान गया था |

          हम लोग सड़क पर चुपचाप चल रहे हैं | नरेश जब से आया है , तब से चुप – चुप है | पिक्चर हॉल में भी उसने चुप्पी साध रखी थी | उसकी चुप्पी मुझे असहनीय लग रही है |

          “ तू चुप क्यों है ? ” मैंने पूछा |

          “ क्या कहूँ | ” संक्षिप्त उत्तर दिया उसने |

          “ कॉलेज में तो तू बहुत बातूनी था | ”

          अबकी बार वह हो – हो करके हँस पड़ा , फिर बोला , “ तब की बात अलग थी | ”

          “ और अब ? ” मैं उसे बातों में उलझाये रखना चाहता था , ताकि रास्ता कट सके |

          “ अब परिस्थितयाँ बदल चुकी हैं | ” कहकर नरेश ने पैंट की जेब में से अपने दोनों हाथ बाहर निकाल लिए |

          हवा के साथ फिर से तिरछी बौछारें शुरू हो गईं | मकानों में जलती ट्यूब – लाइटों तथा बिजली के खम्भों में जलते बल्बों की रोशनी में ये बौछारें रुई के फाहों जैसे दिख रही हैं ... सफ़ेद झक्क ! ... उड़ते हुए बगुलों जैसी ! ... जैसे पानी को किसी महीन छलनी से छाना जा रहा हो ... बौछारों के पीछे हर आकृति धुँधली – धुँधली !

          हम लोग सड़क के किनारे एक टीन के शेड में जाकर खड़े हो गए | टीन के शेड के सहारे बिजली का खम्भा लगा हुआ था , जिस पर जलते बल्ब का उजाला हमारे आसपास था |

          “ तुझे याद है वो दिन , जिस दिन अपन दोनों क्लास छोड़कर छः वाला शो देखकर लौट रहे थे और तेज बारिश शुरू हो गई थी | ” मैंने कहा |

          “ और अपन लोग बारिश से बचने के लिए एक पेड़ के नीचे खड़े हो गए थे और ... ” नरेश बोला |

          “ लगभग एक घंटे तक खड़े रहे थे | बहुत तेज बारिश थी उस दिन | ”

          “ मेस में खाना भी नहीं मिला था | सारी रात भूख से बिस्तर पर करवटें बदलते रहे थे , हॉस्टल के कमरे में | ” कहकर मैं हँसा | नरेश भी थोड़ी देर तक हम हँसते रहे |

          ऊपर रुई के फाहे अभी भी उड़ रहे थे |

          “ उन दिनों हमारे मन में कितनी उमंगें भरी हुई थीं | ” नरेश की हँसी थमी , तब बोला |

          “ सुन्दर भविष्य की कल्पनाएँ और कुछ कर गुजरने की चाह भी | ” मैंने कहा |

          एकाएक नरेश की आँखों में चमक उभर आई | मुझे याद आया कि ऐसी ही चमक उसकी आँखों में उन दिनों अक्सर उभरती थीं |

          “ तुझे शुचि की याद है या भूल गया ? ” कहते हुए मैं होल से मुस्कराया | **

                          ( इससे आगे की कहानी भाग - 2 में पढ़ें )

 

                                      - पवन शर्मा

                                                                  श्री नंदलाल सूद शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय

                             जुन्नारदेव , जिला – छिंदवाड़ा ( मध्यप्रदेश )

                             फोन नम्बर –   9425837079

                                                    Email –    pawansharma7079@gmail.com   

 

 

संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.


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