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26.7.20

यों मत दौड़ो !


( कवि श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत - संग्रह - '' एक नदी कोलाहल '' से लिया गया है )














यों मत दौड़ो !

यों मत दौड़ो 
गिर जाओगे ,
गिरे अगर तो पीछे आते 
पावों - तले कुचले जाओगे |


कीचड़ में 
धरती लथपथ है ,
पता न फँसे
कहाँ पर रथ है ;


सँभले अगर न ,
कर्ण सरीखे 
समर - मध्य मारे जाओगे !


सडयंत्रों  में 
चक्रव्यूह है ,
कृत्या 
अभिशापिता रूह हैं ;


चेतो ,
इस महफूज तख़्त को 
' तख्ता ' तुम्हीं बना पाओगे !  **


  - श्रीकृष्ण शर्मा 









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संकलन - सुनील कुमार शर्मा, पी.जी.टी.(इतिहास),जवाहर नवोदय विद्यालय,जाट बड़ोदा,जिलासवाई माधोपुर  ( राजस्थान ),फोन नम्बर– 09414771867

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