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29.4.21

डॉ 0 योगेन्द्र गोस्वामी - " आस्थाओं का हिमवान " ( भाग - 2 )

 इसे  , श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " मेरी छोटी आँजुरी " ( दोहा - सतसई ) से लिया गया है | यह पुस्तक की भूमिका है -


मेरी छोटी आँजुरी 


आस्थाओं का हिमवान 

( भूमिका )


भाग - 1 में आपने पढ़ा -

                    पता न किन – किन पूर्वजों , से हम हैं मौजूद |

                    बोलो फिर कैसे कहें , ईश्वर का न वजूद ||

                    ‘ मेरी छोटी आँजुरी ’ सम्मुख सिन्धु अपार |

                    ओ आकाशी देवता ! अर्ध्य करो स्वीकार || 

          इसी प्रकार द्वितीय भाग में प्रकरण 30 से अंत तक वर्तमान जीवन की विसंगतियों को रेखांकित किया गया है –

क्रमशः

भाग - 2 

इसी प्रकार द्वितीय भाग में प्रकरण 30 से अंत तक वर्तमान जीवन की विसंगतियों को रेखांकित किया गया है –

          जनता का क्या है यहाँ , नेताओं को राज |

          मांस गया ठठरी रही , जिसे नौंचते बाज ||

          गली मोहल्ले में रहे , जो कि कभी बदनाम |

          नैतिकता के वास्ते , उनको मिला इनाम ||

          सतसई के अंतिम प्रकरण में कवि ने अपनी कुल गोत्र सहित व्यक्तिगत परिचय कुछ दोहों में दिया है | आरम्भ में आधुनिक लेखन की लफ्फाजी और आलोचकों बदनीयती को ठेंगा दिखाते हुए कवि ने धड़ल्ले से मंगलाचरण किया है | इसमें अपने इष्टदेवता और माता शारदा की वन्दना कर वरदान चाहा है –

     पल – पल बढ़ते तिमिर में , हे मेरे सुखधाम |

     रागारुण अब तो करो , जीवन की ये शाम ||

     कल्मष हर हे माँ ! करो , शब्द अर्थ द्युतिमान |

     सत् – शिव – सुन्दर भाव नव , नव अभिव्यक्ति अम्लान ||

          आधुनिकता का दम्भ पालने वाले अनेक कवि इस परम्परा को रुढ़ि मानकर छोड़ गये | श्रीकृष्ण शर्मा अपने समय की नब्ज पर हाथ रखे हुए हैं , तो भी उन्होंने सच्चे ह्रदय से सूर और तुलसी जैसे महान कवियों में अपना आदर्श खोजा है और निर्भय होकर परम्परा से अपना जुड़ाव सूचित किया है | कुछ आलोचक भीरु कवि और लेखक अपने राष्ट्रीय सांस्कृतिक धर्म से विच्युत होते हैं , इससे शर्मा जी चिन्तित नहीं हैं | इसलिए आशंकित मन से वे कह उठते हैं –

          कविता सुरसरि सम बहे , पावन औ’ कल्याणि |

          अक्षर – अक्षर अमृत हो , हे माँ वीणापाणि ||

          आज हिन्दी का शिक्षित रचनाशील समाज आमतौर पर दो वर्गों में बँटा हुआ है | पहला वह जो सम्पूर्ण अतीत के चिन्तन और संस्कारों को निन्दनीय ठहराकर सिरे से ख़ारिज का दाता है अथवा पाश्चात्य चश्में से उसे परखता है | और दूसरी ओर पूरी निष्ठा के साथ उनका अनुसरण करता है | इस बावत मुझे हाल के ही एक प्रसंग का स्मरण हो आया है | मेरे आदरणीय मित्र प्रो. देवेन्द्र शर्मा ‘ इन्द्र ’ इसके साक्षी हैं | हमारे सूर्यनगर आवास की निकट ही एक मित्र के घर ‘ सांस्कृतिक जागरण मंच ’ की एक गोष्ठी में काव्य – पाठ का आयोजन था | आरम्भिक काव्य – पाठ के अवसर पर जैसा कि चलन है मैंने एक कवि मित्र से वाणी वन्दना करने का अनुरोध किया | तभी एक वरिष्ठ और जाने – माने लेखक महोदय तपाक से बोल उठे – “ बहुत हो गया पूजा – पाठ | आप तो सीधे कविता सुनाइये | ” यह सुनकर सभी लोग अचम्भित हुए | स्थिति की नाजुकता भाँप कर कविवर श्री ‘ इन्द्र ’ जी कहा – “ कोई जरुरी नहीं कि ‘ या ... कुन्देन्दुतुषार हार धवला ... ’ से ही प्रारम्भ हो | आप जो चाहें कविता पढ़ें , वाणी वन्दना हो जायेगी | ” सम्भवतः डॉ0 मिश्र को वाणी वन्दना का कोई छन्द याद न आने से सीधे काव्यपाठ हुआ | ‘ सर्वोत्तम ’ पत्रिका के सम्पादक की वरिष्ठता का लिहाज किया गया | कुछ बौद्धिकों की वाणी के प्रति अश्रद्धा व्यक्त करना उनके विद्याप्रेम पर प्रश्न जरुर खड़े करता है |

          ‘ मेरी छोटी आँजुरी ’ कविवर श्रीकृष्ण शर्मा की निज और अपने युग की व्यथा – कथा है | हिन्दी के जातीय छन्द दोहा में यह भरपूर समा गयी है | यों कहें कि यह अपने युग - सत्य का प्रतिबिम्ब है और यह कई अर्थों में आज के कविता – जगत में फैली आपाधापी और भेड़चाल से बहुत कुछ अलग और सौम्य है | कविवर शर्मा जी एक ऐसे युग में कविता की बाँह थामे हुए हैं जबकि कविता के हत्यारे अपने आतंक से उसे जीने न देने के लिए कृतसंकल्प हैं | आज कविता के तथाकथित पैरोकारों ने ऐसे – ऐसे फतवे दिये हैं , जिनसे कविता की मूलभूत मान्यताएँ गहरे तक आघातित हुई हैं , और यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि साहित्य का वातावरण दूषित हो गया है | **

                      ( आगे का , भाग – 3 में )   

 

                  - डॉ0 योगेन्द्र गोस्वामी


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संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.


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