Followers

22.11.20

कवि श्रीकृष्ण शर्मा - अक्षरों के सेतु - " आत्म - कथ्य "

 इसे श्रीकृष्ण शर्मा की पुस्तक - " अक्षरों के सेतु " ( काव्य - संग्रह ) से लिया गया है -












                  आत्म – कथ्य

 

          जब मैं छः वर्ष का था और बहिन तीन की , चाचा ( पिताजी ) गुजर गये | घर में जो कुछ था , सब उनकी बिमारी में लग गया | अम्मा ने सूत काता , बोर घिसे , लेकिन बात नहीं बनी | फलस्वरूप बचपन में ही भूख , गरीबी , पीड़ा , अभाव , मुश्किलों और मजबूरियों से गहरी पहचान हो गयी | इससे जहाँ संघर्ष करने की क्षमता आयी , वहीँ दूसरों के दुखों और तकलीफों से भाव – प्रवण ह्रदय की द्रवणशीलता भी बढ़ी |

          आगे चलकर जब मैंने अपने आस – पास देखा , सुना और पढ़ा तो इस बाहरी हवा , पानी , खाद आदि के दबाव से भीतर संवेदनशीलता में पीके फूटे , जो भाषिक संस्कार ग्रहण कर ‘ गीत ’ बन गये | ... मैं मूलतः एक गीत – धर्मा रचनाकार हूँ | इसलिए 1964 से नयी कविता की ओर प्रवृत होने पर भी अभिव्यक्ति के स्तर पर मेरी कविताओं में छन्दसिकता अधिक मुखर है , जो रचना में एक लय और गूँज बनाये रखती है | यह भी स्पस्ट करना चाहूँगा कि सम्प्रेषणीयता की दृष्टि से मैंने शिल्प के बजाय कथ्य को प्रमुखता दी है |

          1964 से 1976 के बीच लिखी गयी इन कविताओं में वैयक्तिक सुख – दुःख , समाज और राष्ट्र से जुडी चिन्ताएँ और देखे – भोगे अनुभवों का स्पन्दन है | जिस और जैसे स्थिति ने भी मन को संवेदित किया , वही भाव कविता / गीत के रूप में मुखर हो उठता है | बढ़ती संवेदन – हीनता , जीवन – मूल्यों के क्षरण , भ्रष्ट शासन – तंत्र और स्वार्थी व हिंसक व्यवस्था के बीच अकेले पड़ते साधनहीन लाचार आदमी के दर्द और संघर्ष को वाणी देने का मैंने यत्किंचित प्रयास किया है , किन्तु इस ‘ यथार्थ ’ ( सत्य ) की अंगुली ‘ शिवम् ’ ( लोकमंगल ) के हाथों में है , जो सृजन की अनिवार्य शर्त है | कुछ कविताएँ प्रकृति और प्रेम को केंद्र में रखकर लिखी गयी हैं |

          सन 1947 – 48 से लेखन - कर्म से जुड़े रहने औए चाहने के बावजूद अर्थाभाव व अन्य कारणों के चलते मेरा एक भी गीत संग्रह नहीं छप सका | यद्यपि प्रिय भाई हरीश सक्सेना ने 1956 – 57 में बड़े आग्रहपूर्वक मेरा गीत – संकलन छापने की पूरी तैयारी कर ली थी ; किन्तु व्यवसायी तो वह थे नहीं | इसलिए छपने के बाद उसे बेचना , वह भी कविता – संग्रह को , एक बड़ी समस्या थी , जिसमें हानि की ही पूरी – पूरी सम्भावना थी अस्तु मैंने उन्हें गीत – संग्रह के बजाय कहानी – संग्रह या उपन्यास छापने की राय दी और बन्धुवर कामता प्रसाद साहू ‘ उदित ’ से मिलवाया | वे उस समय ‘ काकभुशुंडी पुराण ’ शीर्षकान्तर्गत लघु कथाएँ लिख रहे थे | बीस – बाईस लिखी थीं |इतनी ही और लिखकर पांडुलिपि दो – तीन महीने में देने का वादा किया उन्होंने , जो कभी पूरा नहीं हुआ | उनसे निराश होकर बाद में हरीश ने उपन्यास छापा राजेन्द्र जगोत्ता का ‘ शीशे की दीवार ’ | ( इसकी जानकारी बहुत बाद में हुई मुझे ) |हश्र – हरीश डूब गए , जगोत्ता बढ़ गये |

          इस प्रकार एक बार जो बात टली , सो फिर टलती ही चली गयी | जगत भैया और अभिन्न बन्धु देवेन्द्र जी व सोम जी का बड़ा आग्रह रहा कि किसी भी तरह मेरा कम – से – कम एक गीत – संग्रह छप जाये ; किन्तु कोई – न – कोई समस्या सदैव आड़े आती रही | मुझे प्रसन्नता और सन्तोष है कि विलम्ब से ही आकांक्षा पूर्ण हो रही है – अभिव्यक्ति का भी तो यही तकाजा है जो प्रकाशन के अभाव में निरर्थकहै | अब मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् द्वारा उदारता पूर्वक दिये गये आर्थिक सहयोग से 68 वर्ष की उम्र में मेरा यह पहला कविता – संग्रह – ‘ अक्षरों के सेतु ’ – ( जो पच्चीस – तीस वर्ष पूर्व ही पाठकों के समक्ष छपकर आ जाना था ) प्रकाशित हो रहा है | एतदर्थ मैं परिषद् और उसके अधिकारियों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ , विशेष रूप से श्री पूर्णचन्द्रजी रथ , जिन्होंने कुछ सुझाव भी दिये हैं |

          चि० पवन शर्मा को इसकी पांडुलिपि बनाने तथा तत्परतापूर्वक अन्य सम्बन्धित कार्य निपटाने हेतु आशीषयुक्त मंगलकामनाएँ ही दे सकता हूँ | इसके प्रकाशन के पीछे सुबन्धु देवेन्द्र जी का निरन्तर दबाव और प्रेरणा रही है | वे मेरे इतने अपने हैं कि उन्हें धन्यवाद देना प्रकारान्तर से स्वयं को ही धन्यवाद देना है | भाई डॉ0 श्याम ‘ निर्मम ’ जी ने सीमित समयावधि में इसके प्रकाशन का दायित्व निभाकर जो सहृदयता और सौजन्य प्रकट किया है , उसके लिए ह्रदय से आभारी हूँ और आश्चर्यान्वित भी हूँ कि उन्होंने अपना उपनाम ‘ निर्मम ’ क्या सोचकर रखा है ?

          इस कविता – संग्रह के सम्बन्ध में मेरा कोई विशिष्ट दावा नहीं है | इसलिए इसे सुधि पाठकों के हाथों में सौंपते हुए उनकी हर प्रतिक्रिया के स्वागत हेतु तत्पर हूँ |  **

 

      

     - श्रीकृष्ण शर्मा

 शारदी पूर्णिमा संवत 2059 वि0

( गुरूवार , 1 नवम्बर 2001 ई0 )

 

विद्या भवन , सुकरी चर्च के पास , जुन्नारदेव ,

जिला – छिन्दवाड़ा ( म० प्र० )  


------------------------------------------------------------------------


संकलन – सुनील कुमार शर्मा , जवाहर नवोदय विद्यालय , जाट बड़ोदा , जिला – सवाई माधोपुर ( राजस्थान ) , फोन नम्बर – 9414771867.                     

 


No comments:

Post a comment

आपको यह पढ़ कर कैसा लगा | कृपया अपने विचार नीचे दिए हुए Enter your Comment में लिख कर प्रोत्साहित करने की कृपा करें | धन्यवाद |